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"पर्यावरण प्रदूषण वर्तमान विश्व की बड़ी चुनौती" -- हंसराज ठाकुर

इस वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस को जैव विविधता दिवस एवं सरंक्षण वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है I 
जैव विविधता पारिस्थितिक संतुलन को बनाये रखने में सहायक होती हैI विश्व में 1435662 प्रजातियों की ही अभी तक पहचान हो पाई है,जिनमे से कुछ परितंत्रों के क्षय के कारण विलुप्त भी हो रही है और कोरोना जैसे विषाणु इसी जलवायु परिवर्तन की उपज में से एक है,जिसकी उत्पत्ति का सही कारण व सही इलाज अभी खोजा जाना बाकि हैI कीट पतंग, पौधे, जन्तु, कवक, शैवाल, जीवाणु व् विषाणु ही मिलकर हमारी जैव विविधता को बनाते हैंI  22 मई को जैव विविधता दिवस व् 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता हैI प्रकृति में ही हमारी समस्याओं का हल है, इसी विषय के साथ इस बार जैव विविधता दिवस मनाया गया I  जैव विविधता हमारे पर्यावरण का ही कारक हैI
पर्यावरण मतलब पृथ्वी के चारों तरफ का आवरण-वायु, जल एवं स्थल की भौतिक, रासायनिक व जैविक विशेषताओं मे अवांछनीय परिवर्तन ही प्रदूषण है।विकास के वर्तमान परिप्रेक्ष्य मे विश्व विकास की एक तरफा दौड़ में शामिल हो गया है।इस दिशा में सामाजिक, वैश्विक जागरूकता लाने हेतु अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत से पुरुस्कार भी समय समय पर दिए जाते रहे हैं।पूरे विश्व समुदाय के बुद्धिजीवी व पर्यावरणविदों के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन भी समय समय पर होते हैं-मानक भी तय किए जाते हैं पर कहीं न कहीं जब इन नियमों के पालन की बात होती है तो सभी विकसित व विकासशील देश अपने विकास को तब्बजो देकर अपना पल्ला झाड़ते नजर आते हैं।यह मानव सभ्यता के लिए मंद विष के समान है।अतः पर्यावरण प्रदूषण के मानक निर्धारित करना व उनका अनुसरण करना आवश्यक ही नहीं अपितु अपरिहार्य है।पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाना वर्तमान के लिए ही नहीं अपितु सुरक्षित भविष्य के लिए भी आवश्यक है
पर्यावरण प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर पर्यावरण प्रदूषण के मानक निर्धारित किए गए हैं।यात्री वाहनों के यूरो मानक, जल प्रदूषण के मानक, ध्वनि प्रदूषण के मानक एवं अन्य प्रदूषकों के लिए मानक सीमा निर्धारित की गई है।प्रसिद्ध पारिस्थितिक वैज्ञानिक ई.पी.हृओम के अनुसार"वायु, जल या भूमि के भौतिक, रासायनिक या जैविक गुणों में होने वाले ऐसे अनचाहे परिवर्तन जो मनुष्य व अन्य जीव धारियों, उसकी जीवन परिस्थितियों, औद्योगिक प्रक्रियाओं एवं सांस्कृतिक उपलब्धियों के लिए हानिकारक हो, प्रदूषण कहलाता है"!
हमारे वायुमण्डल मे समुद्री सतह से 25-30 किलोमीटर की ऊंचाई मे(स्ट्रेटोस्फेयर)विविध मोटाई की ओजोन परत पाई जाती है जो सूर्य से आने वाली पराबैंगनी तरगों को अवशोषित करके मानव प्रजाति को त्वचा कैंसर जैसे जटिल रोगों से बचाती है।इस परत का क्षरण भी प्रदूषण का ही एक गम्भीर परिणाम है।घरों के रेफ्रिजरेटर मे इस्तेमाल होने वाली फ्रियोन गैस(क्लोरो फ्लोरो कार्बन)व अन्य प्लास्टिक उत्पादों के दहन से उत्पन्न एक क्लोरीन का अणू एक लाख ओजोन के अणुओं को आक्सीजन मे बदलकर लगातार इस परत का क्षरण कर रहा है।20वीं शताब्दी में कार्बन डाइऑक्साइड द्वारा उत्पन्न हरित गृह प्रभाव से हमारी पृथ्वी के औसतन तापमान(18*C)मे 0.5*Cकी वृद्धि हुई है जो 21वीं शताब्दी में बदस्तूर जारी है।ग्लोबल वार्मिंग की वजह से हिमखंडों का पिघलना व समुद्री जल स्तर मे बढोतरी की बजह से समुद्री तटों से सटे विश्व के कई देशों पर जलमग्न होने का खतरा धीमी गति से मंडरा रहा है।हरित गृह प्रभाव उत्पन्न करने वाली गैसों मे मुख्यतः कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, क्लोरो फ्लोरो कार्बन तथा नाइट्रस आक्साइड है।यूरो1(1992)से यूरो-6(2014)तक CO की मात्रा 2.72 से 0.50 व नाइट्रस आक्साइड की मात्रा 0.08 तक नियंत्रित करना प्रस्तावित था-मगर आज क्या यह वास्तविकता है?
हमें भ्रष्टाचार, गरीबी उन्मूलन, बेरोजगारी व आंतकवाद जैसी विकट समस्याओं के साथ साथ ग्लोबल वार्मिग, ओजोन छिद्र(लॉक डाउन के चलते प्रकृति ने इसमे प्राकृतिक रूप से सुधर भी किया), अम्लीय वर्षा व हरित गृह गैसों के नियंत्रण की तरफ भी प्रभावी ढंग से कदम उठाने होंगे।संपीडित प्राकृतिक गैस से चलने वाले व सौर ऊर्जा चालित(भूगोलिक परिस्थिति के अनुसार) वाहनों को और बढावा देने की जरूरत है और पर्यावरण मैत्री तकनीक को बढावा देकर वाहनों को यूरोपियन यूनियन एमिसन स्टैंडर्ड फार पैसेंजर्स कार के अनुरूप प्रचलन में रखा जाए।
हिमाचल प्रदेश नैसर्गिक सौंदर्य का भरपूर खजाना है।यहां की रमणीक वादियां व घाटियां पर्यटकों को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करती हैं।यहां का शुद्ध पानी किसी मिनीरल वाटर से कम नहीं, यहां की शुद्ध हवा प्राणदायिनी है मगर यदि प्रदूषण इसी रफ्तार से यहां भी बढता गया तो वो दिन दूर नहीं जब हमें शुद्ध हवा को लेने के भी पैसे देने पडेंगे यानी शुद्ध हवा टैक्स।परमाणु सम्पन्न राष्ट्रों को अपने शक्तिशाली होने के अहसास की बजाय, ज्यादा जिम्मेदार होने का अहसास होना चाहिए अन्यथा परमाणु विकीरण(रेडियो समस्थानिक से फैलने वाली किरणें)विश्व के किसी भी कोने में पहुंचकर रक्त कैंसर जैसी बिमारियां उत्पन्न कर सकती हैं।वायु प्रदूषण का प्रभाव तात्कालिक एवं बाध्यकारी होता है-भोपाल मिथाइल आइसोसाइनाइट गैस कांड को कोई कैसे भूल सकता है।
जल संसाधन से हमारी पृथ्वी समृद्ध है।पृथ्वी के तीन चौथाई भाग पर जल होने की वजह से इसे नीला ग्रह भी कहते हैं।समस्त जल का 2.09% जल ही मीठा व पीने योग्य जल है।जल की गुणवत्ता उसके pH मान ,गंदलापन, निलंबित कण, विद्युत चालकता, रासायनिक गुण, विभिन्न खनिजों की मात्रा, अम्लीयता, क्षारीयता, घुलित आक्सीजन, नाईट्रेट, फास्फेट आदि की मात्रा से निर्धारित की जाती है।आदर्श पेयजल का तापमान10*C से 15.6*C व pH 7.0 से 8.5 के बीच होना चाहिए।सरकार को जमीन में घटते जल स्तर को निंयत्रित करने हेतु आवश्यक कदम उठाने होंगे।
स्वर, संगीत, साधना मानव मे उमंग, उत्साह व आनंद का संचार करते हैं लेकिन आज 21वीं सदी में ध्वनि का औसत स्तर 20वीं सदी के मुकाबले लगभग40 गुणा अधिक हो गया है।हम 20 से 20,000 कम्पन्न प्रति सेकिंड तक की ध्वनि सून सकते है और उम्र के साथ इस सीमा का ह्रास होता है- 47 की उम्र तक यह13,000 कम्पंन प्रति सेकिंड रह जाती है।आवासीय क्षेत्रों में 45-55 डेसीबल,व्यापारिक क्षेत्रों में 55-65 डेसीबल व औद्योगिक क्षेत्रों में 70-75 डेसीबल तक की ध्वनि स्वीकार्य है।
प्रदूषण के मानक तो विश्व भर में निर्धारित हो गए लेकिन पर्यावरण प्रदूषण के लिए जिम्मेदार कौन है, इसका निर्धारण भी होना चाहिये।विकसित देश लगभग 66% ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करते हैं-अमेरिका 25-30%,रूस 15% गैसों का उत्सर्जन करता है।विकासशील देशों में चीन 12%और भारत 3% ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करता है।यह समस्या मानव निर्मित है।वेशक औद्योगिक विकास को रोका नहीं जा सकता लेकिन इसको मानव सभ्यता के विकास एवं हित में पर्यावरण प्रदूषण के मानक लागू करके नियंत्रित तो अवश्य किया जा सकता है, जिससे मानव युक्त ग्रह पृथ्वी पर मंडरा रहे पर्यावरण प्रदूषण से निर्मित गम्भीर खतरे को टाला जा सकता है अन्यथा विकास का कोई औचित्य नहीं रह जाएगा, जब हमारे जीवन के साथ अन्य जीवों का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जायेगा।आम जनमानस के सहयोग के साथ साथ देश व प्रदेश सरकार को इस दिशा में बडे पैमाने पर कदम उठाने होंगे व उनकी अनुपालना भी सुनिश्चित करवानी होगी।

लेखक: हंसराज ठाकुर प्रवक्ता भुतिक शास्त्र रा आ व् मा वि हट्गढ़ जिला मंडी (हि.प्र.)-175027
          

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