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ऑनलाइन शिक्षा कितनी उपयोगी- प्रियम्बदा शर्मा

शिक्षा किसी भी राष्ट्र की उन्नति का मूलभूत आधार है। बिना शिक्षा के मनुष्य पशु तुल्य है। भारत देश पूर्व काल से ही विश्व गुरु के रूप में जाना जाता रहा है यहां धनधान्य की भी प्रचुरता रही है। परंतु अफसोस यह कि यह गुलामी की बेड़ियों में ही जकड़ा रहा।फिर भी यहां की सांस्कृतिक परंपरा यहां की शिक्षा को आक्रांता प्रयासों के बाद भी समाप्त नहीं कर पाए। भारत में, भारतीय भू धरा पर ईश्वर की अपार कृपा है। यदि हम अपने पौराणिक ग्रंथों को उठाकर देखें तो यही पाएंगे कि सब जगह भारत भू धरा को ही श्रेष्ठ बताया गया है। ऐसी श्रेष्ठ धरा पर जन्म लेना  किसी पुण्य का ही फल है उससे भी अधिक पुण्य है उस जन्म को सार्थक बनाए रखने के लिए प्रयास करना। 
आज जब संपूर्ण विश्व कोरोनावायरस की महामारी के संकट से त्राहि-त्राहि कर रहा है और भारत भी इससे अछूता नहीं है परंतु फिर भी यहां मृत्यु की दर अन्य देशों की अपेक्षा कम है। पूरी जनता प्रधानमंत्री महोदय के साथ मिलकर, डटकर इस बीमारी रूपी अदृश्य शत्रु से निपटने को तत्पर है। लॉक डाऊन का उल्लंघन करने वालों के लिए सजा का प्रावधान जैसी व्यवस्थाएं की गई है ताकि अनुशासन बना रहे जो अनिवार्य भी है। आमजन घरों में बैठने को मजबूर हैं और देश के रक्षक मेडिकल स्टाफ, पुलिसकर्मी व अन्य लोग अपनी सेवाएं दे रहे हैं। देश के नागरिकों को आत्मनिर्भर बनने का संदेश प्रधानमंत्री दे रहे हैं। यह सब बिना शिक्षा संभव ही नहीं यह हमें यह अनिवार्य रूप से समझना होगा। सरकार ने शिक्षा व्यवस्था को कायम रखने के लिए ऑनलाइन कक्षाएं चला दी है क्योंकि ऑनलाइन शिक्षा प्रणाली को अपनाना ही अब एक मात्र विकल्प रह गया जब ऐसा स्वाभिमानी शत्रु दरवाजे पर खड़ा है जो भीतर प्रवेश तभी करेगा जब आप उसे स्वयं लेने बाहर जाएंगे। अतः इस विकट परिस्थिति में राष्ट्रीय स्तर पर स्कूलों कॉलेजों और विश्वविद्यालयों ने जूम एप, गूगल क्लासरूम, और भी विभिन्न प्रकार के यूट्यूब, व्हाट्सएप आदि को ऑनलाइन शिक्षण के माध्यम के लिए वैकल्पिक रूप से अपना लिया है। जिसके लिए विभिन्न शिक्षाविद राष्ट्रीय स्तर पर अपने भाषणों संबोधनों और शिक्षण शिक्षण सामग्री के साथ शिक्षा के प्रचार-प्रसार में लगे हुए नजर आ रहे हैं। 
इसी संदर्भ में यदि हम हिमाचल प्रदेश को ही लें तो यहां भी सरकार शिक्षा व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए कटिबद्ध होकर अन्य राज्यों की तर्ज पर प्रयास करने का भरसक प्रयास कर रही है। वहीं शिक्षक भी अपनी पूर्ण क्षमता और दक्षता का परिचय देते हुए ऑनलाइन पढ़ाई करवाने में जुटे हैं। परंतु निसंकोच हमें कहना होगा कि यह प्रयास ऊंट के मुंह में जीरे जैसा ही है। ऐसा क्यों....? इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए हमें यहां ऑनलाइन शिक्षण के फायदे और नुकसान दोनों पर ही ध्यान केंद्रित करना होगा।  "हर घर पाठशाला" योजना के तहत हिमाचल सरकार ने सभी अध्यापकों और छात्रों को ऑनलाइन शिक्षा से जोड़ने का सराहनीय प्रयास किया। यह प्रयास कितने बच्चों को और किस प्रकार लाभान्वित कर पाया यह विचारणीय है। उदाहरण के तौर पर किसी कक्षा में कुल 70 विद्यार्थी हैं जिनमें से 30 विद्यार्थी व्हाट्सएप पर जुड़ पाए परंतु केवल मात्र 10 ही विद्यार्थी लाभान्वित हो सके कारण नेटवर्क समस्या, नेट पैक ना होना, एक ही फोन से घर के बहुत से बच्चों का पढ़ाई में संलग्न होना आदि।  इसके अतिरिक्त कई बच्चे ऐसे भी पाए गए जो इस माध्यम का दुरुपयोग करते हैं जैसे अध्यापकों के साथ व्हाट्सएप द्वारा अनावश्यक बातें करना मना करने पर अभद्र भाषा का प्रयोग जैसी स्थितियां भी देखने को मिली। बात यहीं तक सीमित रहती तो गनीमत थी परंतु जिन कारणों को ध्यान में रखकर जिस फोन को स्कूलों में प्रतिबंधित किया गया था वहीं जब शिक्षा का आधार बन कर सामने आया तो परिणाम यह भी देखने को मिले कि कम उम्र के बच्चों का शारीरिक और मानसिक पतन हुआ है। नैतिकता में भारी गिरावट आई है। छात्र स्कूलों में 6 घंटे का समय बिताते थे और बच्चे अध्यापकों के निरीक्षण में अनुशासन में रहने के लिए प्रतिबद्ध थे। घरों में रहकर कितने अविभावक  अपने बच्चों पर नियंत्रण रख पाते हैं यह स्थिति ऑनलाइन शिक्षा ने उजागर कर दी है। इतना ही नहीं मोबाइल के अत्यधिक प्रयोग ने बच्चों के स्वास्थ्य पर भी कुप्रभाव डालना शुरू कर दिया जैसे आंखें खराब होना, पाचन संबंधी समस्याएं, तनाव, चिड़चिड़ापन जैसी समस्याएं उत्पन्न हो गई जिस से निजात पाना भविष्य में आसान नहीं होगा। शिक्षकों के द्वारा ऑनलाइन पढ़ाई करवाते हुए उनके अभिभावकों व स्वयं छात्रों से मिली जानकारी के आधार पर यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि ऑनलाइन शिक्षा के माध्यम से 1% भी बच्चे लाभान्वित नहीं हो पाए हैं। हालांकि सरकार ने तो दूरदर्शन पर भी कार्यक्रम चलाकर बच्चों को शिक्षित करने का प्रयास किया  जो सराहनीय है। परंतु यह कितनों को लाभान्वित करने वाला है यह भी विचारणीय होना चाहिए। जिन लोगों के पास मोबाइल नहीं है, टेलीविजन या अन्य प्रकार की सुविधाएं नहीं हैं वे छात्र कुंठित हैं और जिनके पास हैं वे पूर्ण लाभ उठाने से वंचित हैं। वास्तव में शिक्षाविदों को कोई भी योजना चलाने से पहले उसके फायदे तो देखने चाहिए परंतु उससे होने वाले नुकसान का आकलन पहले अनिवार्य रूप से कर लेना चाहिए और इससे भी अधिक वहां का वातावरणीय स्थिति को ध्यान में रख कर, साथ ही साथ बच्चों की मनोवैज्ञानिकता को ध्यान में रखकर ही कार्य निर्देश जारी किए जाने चाहिए। अन्यथा आकाश से गिरे और खजूर पर अटके की स्थिति से निपटने के लिए तैयार होना पड़ता है। यदि केवल कागजी स्तर पर कार्यवाही की जाए और जमीनी स्तर पर समस्याओं का आकलन न किया जाए तो परिणाम और परिस्थितियां भयावह होते हैं। 23 मार्च से बंद शिक्षण संस्थान 31 मई तक बंद किए गए और आगे भी कब तक बंद रहेंगे यह सुनिश्चित नहीं है। ऐसी अनिश्चितता की स्थिति सरकार के लिए और शिक्षाविदों के लिए परीक्षा का समय है। क्योंकि यह प्रश्न और समय देश के भावी पीढ़ी को बचाने का है वास्तविकता यदि देखी जाए तो देव भूमि हिमाचल प्राकृतिक संपदा से भरा हुआ प्रदेश है यहां के लोग जुझारू हैं तथा प्रकृति के वाशिंदे हैं। जिनमें रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है यही कारण है कि कोरोना जैसी महामारी यहां पैर पसारने में असफल रही है। परंतु अब यहां भी जो पॉजिटिव लोग आने लगे हैं उनका कारण केवल और केवल बाहरी राज्यों से आए संक्रमित व्यक्ति हैं यदि प्रदेश सरकार इस तरफ सख्ती से ध्यान दें बाहर से आने वाले लोगों को सीमाओं पर पर ही क्वॉरेंटाइन करके रखें। भलीभांति जांच परख कर ही प्रदेश में प्रवेश की अनुमति दे और प्रदेश के भीतर अपनी अर्थव्यवस्था और अन्य गतिविधियों को चलाएं रखें तो स्थिति पर निश्चित रूप से नियंत्रण किया जा सकता है। इसके साथ ही ऐसे न्यूज़ चैनलों पर भी नियंत्रण होना चाहिए जो सही खबरें भी दहशत के साथ लोगों तक पहुंचाते हैं जिसके कारण ऐसा प्रतीत होता है कि लोग कोरोना महामारी से मरे ना मरे, दहशत से जरूर मर जाएंगे। हिमाचल प्रदेश सरकार को विशेष रूप से यह स्वीकारना चाहिए कि यहां की जनता उनके बनाए नियमों की पालना के लिए कटिबद्ध है। अतः सरकार को सख्ती के साथ प्रदेश हित में निर्णय लेने चाहिए, छात्र हितों के लिए आवश्यक रूप से सोचना चाहिए। 
शिक्षा, शिक्षक और छात्र यह मिलकर एक त्रिकोण का निर्माण करते हैं देश की सेवा में इस समय जो लोग सबसे आगे खड़े हैं फ्रंट वारियर्स बने सैनिक अन्य कर्मचारी भी शिक्षित होकर ही यह कार्य करने में समर्थ हैं। वास्तव में शिक्षा और शिक्षक नींव हैं, मूल आधार हैं। इनकी अवहेलना नहीं की जानी चाहिए। जहां शिक्षकों का सम्मान नहीं होता वह राष्ट्र विनाश को प्राप्त हो जाता है इतिहास इसका गवाह है। 
कोई भी विपत्ति या आपदा हमेशा नहीं रहती परंतु विपत्ति के समय लिए गए निर्णय अवश्य ही स्थाई प्रभाव छोड़ते हैं सरकार ने पैरा, पैट, अनुबंध, एसएमसी आदि कई वर्गों के शिक्षकों की सेवाओं पर मंडरा रहे संकट को संकटकालीन स्थिति में तत्काल बहाल कर अपने तारणहार होने का परिचय दिया साथ ही छात्रों को भी तुरंत अगली कक्षाओं में प्रमोट करके अपनी करुणा दिखाई। परंतु ऐसे शिक्षक जिन्हें योग्यता होते हुए भी उनका उचित पद नाम नहीं दिया गया या ऐसे छात्र जो योग्य होते हुए भी गधे घोड़े बराबर कर दिए गए क्या वे सरकार से न्याय की गुहार नहीं करेंगें..? 
कहा गया है कि - 
"सहसा विदधीत न क्रिया 
मविवेकः परमापदां पदम्।। 
अर्थात् बडी़ आपत्ति आने पर भी जल्दबाजी में कोई काम न करें। 
इस उक्ति को ध्यान में रख कर लिए गए निर्णय दूरगामी प्रभाव छोडते हैं। 
बहरहाल सरकार को बाहरी राज्यों से या अन्यत्र स्थानों से आने वाले लोगों को सीमाओं पर ही क्वारनटाइन करके रखना चाहिए, और प्रदेश हित को ध्यान में रखते हुए तुरंत परिवहन सेवाएं प्रदेश में चलाकर शिक्षण संस्थाओं को खोलने की व्यवस्थाएं बनाने की योजना पर कार्य करना चाहिए। जनता तो सरकार के साथ पूर्णतया खड़ी है जिसका सरकार को लाभ ही मिलना है।
प्रियंवदा
सुंदरनगर जिला मण्डी 
हिमाचल प्रदेश

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