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आओ बच्चो, शतरंज खेलें -- जगदीश बाली

देखे होंगे तुमने कितने सिकंदर-ओ-वज़ीरों को जंग जीतते हुए, हमने तो बादशाहों को देखा है प्यादों से मात खाते हुए। मैं शह और मात के उस खेल की बात कर रहा हूं जिसमें मात खाने के बाद भी खिलाड़ी जीतने की तमन्ना नहीं छोड़ता। मैं शतरंज की बात कर रहा हूं। शतरंज, जिसे अंग्रेज़ी में चैस कहते हैं, दो शब्दों के मेल से बना है- शत और रंज। शत यानि सौ और रंज यानि नाराज़गी, निराशा, दुख या अवसाद। इस तरह शतरंज का मतलब हुआ सौ तरह के रंज से पार पाने वाला खेल। इसे पहले चतुरंग अर्थात सेना भी कहा जाता था। यह चौकोर बोर्ड पर चौंसट चौकोर खानों में छ: तरह के बत्तीस मोहरों के साथ खेला जाने वाला खेल है।
 बच्चे फ़ितरतन ही उछल-कूद करना व खेलना पसंद करते हैं। पर कोरोना काल के लॉकडाउन व शारीरिक दूरी के चलते वे बाहर निकल कर ऐसा नहीं कर पा रहे हैं। वे घर में बैठे ऑन लाइन पढ़ाई के साथ-साथ मोबाइल फ़ोन पर गेम खेल कर ही अपना शौक पूरा कर रहे हैं। परंतु इस समय अगर बच्चों का ध्यान शतरंज जैसे खेल की ओर मोड़ा जाए, तो खेल के साथ उनके बौद्धिक व व्यक्तित्व विकास को नई दिशा मिल सकती है। आज विश्व में लगभग 1500 ग्रैंडमास्टर हैं, जिनमें लगभग 38 ग्रैंडमास्टर 15 वर्ष से कम उम्र के हैं, जिन्हें चाइल्ड प्रॉडिजी कहा जाता है। इन्में 7 भारत के हैं। भारत के 12 वर्ष 7 महीने और 17 दिन के डी. गुकेश 12 वर्ष 7 महीने के सर्गे कर्जेकिन के बाद विश्व के दूसरे नंबर के चाइल्द प्रोडिजी है। ज़ाहिर है उपलब्धियां हासिल करने के लिए उम्र, कद-काठी नहीं, बल्कि संकल्प व निरंतर अभ्यास मायने रखते हैं। शतरंज यही सिखाता है।
नवंबर 2017 में जब भूटान नरेश ज़िग्मे वांगचुक भारत आए थे, तो हमारे देश के प्रधानमंत्री मोदी ने उनके देढ़ वर्षीय पुत्र को भेंट में एक चैस सैट दिया था। शतरंज की बात करते ही मैगनस कार्ल्सन, गैरी कास्परोव, अनातोली कारपोव, बॉबी फिशर जैसे चेहरे आंखों के सामने घूम जाते हैं। हमारे ज़हन में चश्मा पहने शतरंज खेलते हुए विश्व चैंपियन भारतीय ग्रैंडमास्टर विश्वनाथन आनंद का ख्याल आता है और हमारा सर गर्व से ऊंचा हो जाता है। आनंद का सपना है कि देश के प्रत्येक स्कूल में शतरंज खेला जाए। संयोग की बात है कि है कि हमारे देश के प्रधानमंत्री भी शतरंज के बारे में ऐसी ही राय रखते हैं। भारत में 64 ग्रैंड मास्टर हैं। लिहाजा शतरंज में भारत की स्थिति अच्छी मानी जा सकती है। क्या ही अच्छा हो कि हमारे प्रदेश से भी कोई ग्रैंड मास्टर बने। अत: प्राथमिक स्कूलॊं से लेकर स्कैंडरी स्कूलों तक शतरंज को बच्चों का पसंदीदा खेल बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। शिक्षा विभाग अब प्रदेश के बच्चों को खंड, जिला, राज्य व राष्ट्रीय स्तर तक आयोजित प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के लिए तैयार कर रहा है। इस दिशा में मंडी ज़िला शतरंज संघ महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है। हाल ही में संघ ने कोरोना सोलिडेरिटी फ़ंड के लिए कोरोना फ़ाईटर ऑनलाइन शतरंज प्रतियोगिता का आयोजन किया। वरिष्ठ राष्ट्रीय आरबिटर व गुरकोठा के राजकीय विद्यालय में तैनात इतिहास के प्रवक्ता राज कुमार शर्मा ने इस ऑनलाइन प्रतियोगिता को सफ़लतापूर्वक करवाया। शतरंज को बढ़ावा देने के लिए ऑनलाइन प्रतियोगिता अब भी जारी है। उल्लेखनीय है कि हमारे प्रदेश के लिए गर्व का क्षण तब अया जब प्रारंभिक शिक्षा निदेशालय में संयुक्त निदेशक के पद पर तैनात हितेश आज़ाद ने राजकीय आदर्श विद्यालय हटगढ़ के भौतिक विज्ञान के प्रवक्ता हंस राज ठाकुर के साथ पिछले वर्ष मंडी शतरंज संघ द्वारा मतदाता जागरुकता हेतु आयोजित शतरंज मैराथन में 53 घंटे 17 मिनट व 49 सैकिंड शतरंज खेल कर लगातार सबसे लंबे समय तक शतरंज खेलने कर विश्व रिकॉर्ड बनाया और दोनों ने वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्ड में जगह बनाय़ी। स्वयं चैस के बेहतरीन खिलाड़ी होने के साथ अब वे और उनकी टीम चैस को लोकप्रिय खेल बनाने में जुटी हुई है। 
 वैज्ञानिक ब्लेज़ पास्कल ने कहा है कि शतरंज मनुष्य के दिमाग की व्यायामशाला है। शतरंज बच्चों के बौद्धिक विकास में अहम भूमिका निभा सकता है। शतरंज खेलते समय मानव मस्तिष्क का दांयां और बांया दोनों पक्ष एक साथ काम करते हैं। पहली चाल चलने से पहले तो चैस बोर्ड पर मोहरे सुव्यवस्थित लगते हैं। परंतु प्रत्येक चाल के बाद वैकल्पिक चालों की संख्या बढ़ती चली जाती है। एक अनुमान के अनुसार तीन चालों के बाद लगभग 9 मीलियन, चार चालों के बाद 288 बीलियन और पूरी बाज़ी में औसतन ब्रह्मांड में उपलब्ध इलैक्ट्रॉन से अधिक संभावित विकल्प होते हैं। जैसे इस खेल में मोहरे आड़ी तिरछी चालें चलते हैं, मस्तिष्क भी उन चालों की तरह विभिन्न संभावनाओं को तेज़ी से तलाशने लगता है। इससे मस्तिष्क की प्रोसैसिंग तीव्र हो जाती है। शतरंज में तरह तरह की परिस्थियों से गुजरते व जूझते हुए खिलाड़ी का इंटैलिजैंस कोशैंट बढ़ता जाता है। उसकी तार्किक व वैचारिक शक्ति भी अपेक्षाकृत कहीं अधिक होती है। यह खेल मानव कल्पना, स्रूजनात्मकता व दूरदर्शिता को मज़बूत करता है। स्मरण शक्ति तेज़ बनी रहती है। यह तर्क, विचार, संभावनाओं व समन्वय की गणना का खेल है। लिहाजा यह गणित के विद्यार्थियों के लिए बहुत उपयोगि है। आज के तनाव व अवसाद से भरे जीवन में तो शतरंज और भी महत्वपूर्ण है। इस तरह शतरंज जीवन में हार कर भी हौंसला न छोड़ने की भावना भर देता है। शतरंज गलतियों के विरुद्ध एक संघर्ष है। हर नई बाज़ी में वह अपनी गलती को सुधारता जाता है।   
 शतरंज से बच्चों को नकारातमक कार्य में समय नष्ट करने से बचाया जा सकता है। आज हमारे बच्चे नशे के गर्त की ओर जा रहे हैं। उन्हें इस खेल को खेलने के लिए प्रेरित किया जाए, तो वे काफ़ी हद तक नशे से दूर हो जाएंगे। गैरी कास्परोव के रूस में 256 ग्रैंडमास्टर हैं क्योंकि वहां शतरंज संस्कृति का अंग है। वहां शादी में दुल्हन को गिफ़्ट में चैसबोर्ड दिया जाता है। हमारे प्रदेश में भी शतरंज एक संस्कृति बने, इसके लिए ज़रूरी है हर स्कूल का हर बच्चा शतरंज खेले। यह कोई मुश्किल काम नहीं क्योंकि इस खेल के लिए न मैदान की आवश्यकता है और न ही बहुत बड़ी धन राशी की। 300 से 400 रू में एक चैस सैट आ जाता है। कमरा तो स्कूलों में होता ही है। लॉकडाउन व शारीरिक दूरी के इस काल में ऑन्लाइन चैस का विकल्प तो और भी उपयोगि है। तो फ़िर आओ बच्चो, शतरंज खेलें।

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