भीड़ -- जगदीश बाली

पकड़ो...पकड़ो...मारो...मारो...मारो... ये डरावनी आवाजें हैं। ये वो आवाज़ें हैं जिन्हें सुनते ही दिल कांप उठता है। ये आवाज़ें जब कानों में गूंजती हैं तो खौफनाक मंज़र आंखों के सामने उभर आता है। ये उन्मादी भीड़ की आवाज़ें हैं जो इस देश में थम नहीं रही। अगर थमती हैं तो फिर अचानक किसी रोज़ उभर आती हैं। ये वो आवाज़ें हैं जिनके शोर-गुल में बाकि सारी आवाज़ें दब कर रह जाती हैं। ये वो शोर है जिसमें इन शब्दों के अलावा कुछ और सुनाई नहीं देता। ये भीड़ का शोर है, उस भीड़ का शोर है जिसके अपने ही सवाल है, अपने ही जवाब हैं और अपने ही तर्क हैं या यूं कहिए कि तर्क हैं ही नहीं। ये वो भीड़ है जो जिस ओर चल पड़ी तो बस चल पड़ी। पकड़ो, पीटो, मारो के ऐसे ही शोर में ऐसी ही एक भीड़ ने महाराष्ट्र के पालघर ज़िले के गणचिंचले गांव में गत 16 अप्रेल को जूना अखाड़े के दो साधुओं कल्पवृक्ष गिरि सुशील गिरी व चालक नीतीश तेलगनी को बेरहमी से पीट-पीट कर मार डाला। गुनाह कोई नहीं। बस उन पर गुनाह का शक मात्र था। शक था कि वे बच्चों के चोर हैं। गांव में बच्चे के चोर की अफ़वाह फ़ैली थी और फ़िर क्या था। न सच जानने की कोई जहमत न कानून की कोई परवाह। भीड़ ने सारी तहकीकात, कायदे-कानून, मुकद्दमा, सब अपने हाथ में ले लिया। तुरंत वहीं फैसला कर डाला और सज़ा-ए-मौत सुना डाली और मौत दे भी डाली। उधर कानून के प्रहरी या तो तमाशबीन बने रहे या उन्होंने खुद को भीड से बचाने में ही गनीमत समझी। इस तरह मानवीय मर्यादाओं की पृष्ठभूमि वाले महान भारत देश के इतिहास के पन्ने में एक बार फ़िर इंसानियत के कत्ल का एक और मामला दर्ज़ हो गया। 
सचमुच भीड़ अंधी होती है और गलत और सही देखने की इसमें कोई सुध नहीं होती। भीड़ अक्सर विवेकहीन होती है और उन्माद में इसे होश ही नहीं होता कि ये किधर जा रही है। इसे न अपने रास्ते का इल्म होता है, न मंजिल का कोई अता-पता और न ही यह अंजाम का विचार कर पाती है। ये तो बस जिस ओर चल पड़ी तो बस चल पड़ी। कई बार चालाक व सोच-समझ वाले लोग कोई नैरेटिव तैयार कर आम लोगों को एक नसमझ व उन्मादी भीड में बदल देते हैं। फ़िर इस भीड को जिधर ले चलो उधर चल पड़ती है। इस भीड़ को जिधर ठेल दो, ये उधर ही बढ़ जाती है। ये किसी की भी जान लेने को आतुर हो उठती है। और कई बार महिलाएं, बच्चे, बूढ़े भी इस भीड में शामिल कर लिए जाते हैं। जब ये भीड़ किसी पर टूट पड़्ती है, तो सभी तर्क धरे के धरे रह जाते हैं। उस वक्त मानवता अस्तित्वहीन हो जाती है। वीडियो बनाए जाते हैं और इंसानियत के सब तकाज़े और कायदे कहीं पानी भरने चले जाते हैं। कानून असहाय जान पड़ता है या फ़िर किसी तमाशबीन की तरह तमाशा देखता है। बाद में कुछ लकीरें खींच कर उन्हें पीटा ज़रूर जाता है। न्याय-अन्याय का तराज़ू कभी इस पासे, कभी उस पासे डोलता रहता है और भीड़ से गुनाहगारों को ढूंढता फिरता है। पर भीड़ तो भीड़ है, इसकी भला क्या पहचान। ये पूरी बेगुनाह या फिर पूरी गुनाहगार। 
ये भीड़ बाढ़ की तरह ही होती है जिसका मक्सद सिर्फ़ तबाही होता है और यह सब कुछ खत्म करके ही छोड़ती है। इस भीड़ के हाथ में जो लगता है वो मौत का हथियार बन जाता है। कभी इसके हाथ में पत्थर आ जाते हैं, कभी ईंटें, कभी लाठियां, कभी लोहे की छड़ें और न जाने क्या क्या। ये भीड़ बुज़ुर्ग साधु-संतो को भी नहीं छोड़ती। ऐसी ही एक भीड़ ये थी जिसने दो साधुओं समेत तीन लोगों की पीट-पीटकर हत्या कर दी। ऐसी ही एक भीड़ ने नवंबर 2019 में सरकाघाट के एक गांव समाहल में राजदेई नामक वृद्ध महिला के मुंह पर कालिख पोती और उसके गले में जूते लटका कर घसीटा था। ये ऐसी ही भीड़ है जो कोरोना से जूझ रहे डॉक्टरों और स्वास्थय कर्मियों पर हमला करती है। इसी तरह की भीड़ ने सितंबर 2015 में उत्तर प्रदेश के दादरी में मोहम्मद इखलाक पर हमला बोला और उसे मौत के घाट उतार दिया था, अप्रेल 2017 में राजस्थान के अल्वर में 55 वर्षीय पहलू खां को भीड ने मौत के घाट उतार डाला। ऐसी ही एक भीड़ ने जून 2017 में शबे कद्र के मौके पर श्रीनगर की एक जामा मस्जिद के पास तैनात पुलिस अधिकारी अयूब पंडित की पीट-पीट कर हत्या कर डाली। इस देश में भीड़ का शिकार हुए लोगों की फेहरिस्त लंबी और दास्तां खौफनाक व अंतहीन है।
भीड-चाल और भेड़-चाल जैसी होती है, परंतु भेड़-चाल निकसानदेह नहीं होती। भेड-चाल की तरह चल कर भीड़ बहुत बहुत खतरनाक हो जाती है। ये भीड कहीं भी और कभी भी उग्र हो कर उमड़ पड़ती है। अक्सर भीड़ के हाथ में अपने पत्थर नहीं होते। इनके तो सिर्फ़ हाथ होते हैं और पत्थर कोई और इनके हाथों में थमा जाते हैं। ये भीड़ कभी शक व अफ़वाह से उमड़ती है, कभी धर्म की अंधता से उमड़ती है, कभी अंधविश्वास से, और कभी जहालत से उमड़्ती है। और जब इस भीड़ में राजनीतिक रंग मिलता है तो ये और भी तबाहकुन हो जाती है। भीड़ किसी भी रंग से उपजी हो, परंतु इसका परिणाम केवल लाल रंग ही होता है अर्थात परिणाम हिंसा पर जा कर ही खत्म होता है। इस उन्मादी भीड़ की चपेट में अक्सर बेगुनाह लोग आ जाते हैं। इस भीड़ को चाहे राजनीतिक रंग दो या धांर्मिक, शिकार इंसान ही होते हैं और कत्ल इंसानियत का ही होता है।
हम सभ्य समाज समाज में रहते हैं। सभ्य समाज में कायदे-कानून होते हैं। इंसानियत के तकाज़े और मर्यादाएं होती हैं। यदि, सड़कों पर भीड़ फैसला करने लग जाए तो कानून क्यों। यदि भीड ही कानून है, तो कानून के रखवाले क्यों? अगर भीड़ के सामने कानून असहाय व तमाशबीन हैं, तो देश में कानून क्यों? आखिर ये अदालते क्यों? भीड़ मत बनाइए, न ही भीड़ बनिए अन्यथा ये भीड़ किसी को भी लील सकती है, आपको भी।

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें