हि‍मशिक्षा शैक्षिक समाचारों/ सूचनाओं और विचार विमर्श का स्‍वैच्छिक, गैर सरकारी और अव्‍यवसायिक मंच। आप शैक्षिक लेख शिक्षा से जुड़ी जानकारी और अपनी पाठशाला की गतिविधियों की जानकारी इस मंच पर सांझा कर सकते है। हिमशिक्षा के लिए शैक्षिक गतिविधियों को प्रेषित करें। आप भी इस मंच को सहयोग दे सकते है आप सम्‍पर्क करें हिमशिक्षा की जानकारी आप मेल से अपने मित्रों को दें सकते है आपका ये कदम हमें प्रोत्‍साहित करेगा Email this page

मीडिया व न्यूज़ एंकरों की सीमा रेखा-- जगदीश बाली

आजकल मीडिया व सियासी गलियारों में पाल घर में हुई संतों की हत्या और रिपब्लिक टीवी न्यूज़ चैनल के सह संस्थापक व मुख्य मालिक अर्नब गोस्वामी से हुइ घंटों की पूछताछ व उन पर हुए हमले को ले कर तू-तू, मैं-मैं का बहसी तूफ़ान अपने उफ़ान पर है। एक बार फ़िर सवाल वही खड़ा है कि मीडिया की कितना स्व्तंत्रता का क्या पैमाना है व विभिन्न चैनलों पर बहस को चला रहे एंकरों के लिए मर्यादाओं की क्या सीमा हैं।  
 कहा जा सकता है कि जो ताकत तोप के गोलों व तलवारों में नहीं, लोकतंत्र में वो ताकत मीडिया में होती है। मीडिया हमारे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। यह एक सजग प्रहरी की तरह देश-प्रदेश की सरकारों, शासकों और प्रशासकों के कार्य पर कड़ी नज़र रखे। मीडिया किसी अमूक विषय, घटना व परिस्थितयों को केवल उजागर और प्रतिपादित ही नहीं करता, बल्कि उनके प्रति आम लोगों की सोच को प्रभावित करता है। इस तरह यह आम राय तैयार करने में अहम भूमिका निभाता है। सजग और जिम्मेदार मीडिया न सरकार की चाटुकारिता करता है न ही अनावश्यक विरोध में खड़ा होता है। आलोचनात्मक मूल्यांकन करना सजग मीडिया और पत्रकारिता की सिद्धांत है। सवाल करना इसका हक भी है और धर्म भी। अगर सवाल नहीं उठाए जाएंगे, तो सुधार, विकास और तरक्की कैसे होगी। अगर मीडिया की ज़ुबान पर ताला लग जाएगा, तो कैसा लोकतंत्र? लोकतंत्र में आवाम की सोच व राय का उतना ही महत्व है जितना मतदान का। आवाम की सोच से राय बनती है और इसी राय के इज़हार से सरकार के फ़ैसले बनते बिगड़ते हैं, सरकारें सत्तारूढ़ होती हैं और सता से उतार भी दी जाती हैं। इस सब में मीडिया की अहम भूमिका होती है।
आज जिस तरह से विभिन्न न्यूज चैनल पर कोई महत्वपूर्ण खबरों व घटनाओं को प्रतिपादित किया जाता है उससे पता चलता है कि पत्रकारिता के मूल्यों का क्षरण हो रहा है। एक ज़माना था जब मीडिया में नैतिक सिद्दातों व समाज के प्रति इसकी जिम्मेदारी को बहुत अहमियत दी जाती थी। कहते हैं एक बार किसी राज्य के मुख्यमंत्री ने महान पत्रकार राम नाथ गोयनका से उनके एक पत्रकार की तारीफ़ करते हुए कहा कि वह पत्रकार बहुत अच्छी रिपोर्टिंग कर रहा है। गोयनका समझ गए और उन्होंने उस पत्रकार को बर्खास्त कर दिया था। यह स्वतंत्र, निष्पक्ष व साहसी पत्रकार के सिद्दांत और सोच को दर्शाता है। आज न्यूज़ चैनलों पर डिबेटस देखें जाएं, तो सभी ऐसे चिल्ला रहे होते हैं कि यही पता नहीं चलता कौन क्या कह रहा है, क्यों कह रहा है, किसे सुना रहा है और कौन सुन रहा है। एंकर भी कहीं पीछे नहीं रहता। वह एंकर कम और बहस में हिस्सा लेने वाला ज़्यादा लगता है। एंकर का काम अनावश्यक अपनी बात थोंपना व बहस में किसी पक्ष को ले कर कूदना नहीं है। उसका कार्य बहस चलाना है और आवश्यकता पड़ने पर शालीनता से अपने सवाल उठाना है। परंतु न्यूज़ चैनलों पर कोई एंकर सरकार की शान में राग दरबारी करता हुआ दिखता है तो कोई सरकार के कामों को काला कर दिखाने में जुटा रहता है। इस सारी प्रक्रिया में दर्शक असमंजस में पड़ जाता है और कई बार वह भ्रमित भी हो जाता है। कोरोना को ले कर तबलीगियों का रवैया, कोरोना योद्धाओं पर हमला, पाल घर में संतों की हत्या, पुलवामा में आतंकवादी हमला, बालाकोट में भारत का एयर स्ट्राइक जैसे मामलों के संबंध में विभिन्न चैनलों पर जिस तरह से एंकरों ने वाद-विवाद, उससे न केवल मीडिया की नकारात्मक छवि सामने आयी बल्कि देश की जनता भी भ्रमित ही हुई है। एंकर कई बार इतने स्व्तंत्र हो जाते हैं कि हद हो जाती है। लिहाज़ा सवाल उठ रहे हैं कि आखिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मायने क्या है और इसकी हदें क्या हैं। एंकरों और रिपोर्टरों को क्या कुछ भी कहने या प्रसारण करने का अनहद अधिकार है? क्या उन्हें पारदर्शिता के नाम पर देश की सुरक्षा को ताक पर रखा जा सकता है या क्या उन्हें किसी का अपमान करने का अधिकार है? अगर कोई हदों को पार करता है तो क्या उसे लताड़ लगनी चाहिए या उस पर कोई प्रतिबंध लगना चाहिए?
 निश्चित रूप से नहीं। क्योंकि अभिव्यक्ति की आज़ादी किसी भी लोकतंत्र की आत्मा होती है। यदि मीडिया सरकार की उचित आलोचना नहीं करेगा, तो ऐसी सरकार तो तानाशाह बन कर बैठ जाएगी। हम जर्मनी के उस नाज़िबाद में नहीं रहते है जिसमें हर वो अखबार, पत्रिकाएं, किताब, कलाकृतियां, संगीत, फ़िल्म, रेडियो प्रतिबंधित कर दिये गए थे जो नाज़ियों को नपसंद थे। इन किताबों में अल्बर्ट आइन्स्टीन, साइमन फ़्रूड, अर्नेस्ट हेमिंग्वे और हैलन कैलर जैसे लेखकों की पुस्तकें भी शामिल है। भारत में 1975-77 के 21 महीने के आपात काल को भी काला युग कहा जाता है। ये सारे उदाहरण इतिहास के वो काले पन्ने हैं जो अभिव्यक्ति की घुटन को दर्शाते हैं।
 मीडिया को स्वतंत्र तो होना ही चाहिए और उसे सवाल करने का पूरा हक है। मैं यहां केवल मीडिया या एंकर द्वारा उठाए जाने वाले सवालों की बात कर रह हूं। घ्यान रहे उसके द्वारा किसी का मान मर्दन आपतिजनक है, दंडनीय हो सकता है और ये अलग विषय है। एंकरों द्वारा उठाए गए सवालों को सरकार या प्रशासन द्वारा दबाने का प्रयास उचित नहीं। यदि आज एक अर्नब के सवालों को दवाया जाएगा, कल ओम कश्यप के, परसों सरदाना के, चौथ देवगन के और कभी हो सकता है रवीश के सवालों को भी दबा दिया जाए। तथापि मीडिया व एंकरों को स्वयं समझना है कि उसकी आज़ादी की सीमाएं भी है और देश व समाज के प्रति कर्तब्य भी। अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब आलोचना हो सकता है, गाली नहीं। स्टूडियो मैं बैठकर कोई भी एंकर या रिपोर्टर होने की ठसक में अभिवयक्ति की आज़ादी का गलत इस्तेमाल नहीं कर सकता। न ही सता के गलियारो में कुर्सियों की हेकड़ी में कोई सत्ताधीश या हकूमत इस आज़ादी को रौंद सकते हैं। चौथा स्तंभ मीडिया देश का सजग प्रहरी है, परन्तु इसे स्वत: ही अपनी सीमाओं और जिम्मेदारियों का आभास होना चाहिए।

JAGDISH BALI

LECTURER ENGLISH

9418009808

0 comments:

टिप्पणी पोस्ट करें