बढता ताप घटता पानी कटते जंगल: कैसे होगा मानव मंगल --जगदीश बाली

जांबिया के लुसाका में स्थित चिड़िया घर के एक पिंजरे के बाहर नोटिस लगा है जिसमे लिखा है- दुनियां का सबसे ख़तरनाक जानवर। पिंजरे में कोई जानवर नहीं, बल्कि एक दर्पण है जिसमें आप अपना प्रतिबिंब देख सकते हैं। वास्तव में ये नोटिस मनुष्य द्वारा पृथ्वी और प्रकृति के साथ किए गए सलूक पर तीखा व्यंग्य है। खुदा ने जब इस सृष्टि की रचना की, तो इस पृथ्वी को बहुत खूबसूरत और दिलकश बनाया। तपता सूरज, ठंडक प्रदान करता चंदा मामा, टिमटिमाते सितारे, ये बादल, वो इंद्रधनुष, बर्फ़ का ताज पहने पहाड़, शानदार हरे-भरे मैदान, मनोरम घाटियां शानदार हरे भरे मैदान, मनोरम घाटियां, सपाट मरुस्थल, बिहड़ वन, पहाड़ी से गिरते संगीतमय झरने, सांपनुमा दरिया, अथाह सागर, मन को पुलकित करने वाली मुस्कुराते फूलों की ख़ुशबू, वन में विचरण करते खग-मृग, नीले आकाश में उड़ते-कूजते पंछी और हम मानव। सचमुच ईश्वर ने मनुष्य के लिए धरती को कितना सुंदर बनाया। परन्तु हमने अपने इस निवास स्थान को इस कदर बिगाड़ दिया है कि आज हमारी धरती एक मरीज़ की तरह लगती है। इस पृथ्वी को बीमार करने में मनुष्य का ही हाथ रहा है। अपनी धरती मा की देख-रेख में मनुष्य एक अकुशल प्रबंधक साबित हुआ है।
 घातांक तेज़ी से बढती हुई आबादी की मांग को पूरा करने के लिए और अपने स्वार्थ के लिए मनुष्य ने प्राकृतिक संसाधनों का बेतरतीबी से दोहन किया है। संसार की बढ़ती को देखते हुए मानव की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए एक धरती और चाहिए, परन्तु हमें नालूम है इसी धरती पर रह कर गुज़ारा करना होगा। जितनी तेज़ी से प्राकृतिक संसाधन समाप्त हो रहे हैं, उतनी तेज़ी से उनकी भरपाई नहीं की जा सकती। जल्दी ही ये संसाधन मानव के लिए कम पड़ जाएंगे। 
मतस्य पुराण में ऋषि मनीषा कहती हैं- दशपुत्रसमो द्रुमः अर्थात एक पेड़ दस पुत्रों के समान है। परन्तु हमने धरती मा के रक्षक कहे जाने वाले वनों का तीव्र गति से नाश किया है। अपने आवास के लिए, इंधन के लिए और चारागाहों के लिए वनों को काटा गया। इसके अलावा भी वनों का कटान किया जाता रहा। वनों को बचाने के लिए कानून का जंगल तो उग आया, परन्तु वृक्ष कहीं-कहीं दिखाई देते हैं। गौरतलब है कि एक पेड़ तीन व्यक्तियों के लिए जीवन प्रदायिनी ऑकसीज़न देता है। विडंबना है कि पहले मनुष्य पेड़ काटता है, उससे काग़ज़ बनाता है और उसी काग़ज़ से पोस्टर बना कर बड़े-बड़े और मोटे-मोटे अक्षरों में लुभावना नारा लिखता है- वनों को बचाना है। अंदाज़न एक टन नया कागज़ बनाने में 20 से अधिक बड़े पेड़ों को काटना पड़ता है। प्रतिवर्ष 18 मिलियन ऐकड़ वन नष्ट कर दिए जाते हैं जिस वजह से 12 से 18 प्रतिशत ग्रीन हॉउस गैस वातावरण में प्रवेश कर जाती हैं। वनों के कटाव से कई वन्य प्राणियों की प्रजातियां भी नष्ट हो रही हैं। भूमि कटाव और भूमंडलीय तापमान का खतरा भी बढ़ता जा रहा है।
 मुझे याद है बचपन में जब हम घर से बाहर इधर-उधर घूमने निकलते थे, तो जगह-जगह पानी के झरने, चश्में, तालाब व छोटी-छोटी झीलें अक्सर मिल जाया करते थे। परन्तु आज ऐसा नहीं रहा। मालूम नहीं ये जल स्रोत कहां गायब हो गए। तातपर्य यह कि पानी की मात्रा घटती जा रही है। नलों में पानी निर्धारित समय के लिए आता है और कई बार तो कई दिनों तक नल की ओर टकटकी लगाए देखना पड़ता है कि शायद आज पानी आएगा। कई बार तो आम नल से पानी भरने के लिए लोगों को झगड़ते हुए देखा जा सकता है। जल्द ही हमें पानी की राशनिंग करनी पड़ेगी है। ऐसा समय भी आएगा कि पानी के लिए युद्ध होगा। गोदावरी, कावेरी व नर्मदा नदी जल बंट्वारा जैसे जल विवाद तो हमारे देश में चल ही रहे हैं। पानी के स्रोतों का समाप्त होना बहुत गंभीर खतरा है क्योंकि पानी का कोई विकल्प नहीं और पानी नहीं तो कुछ भी नहीं। पीने के लिए पानी नहीं, तो जीवन खत्म और अन्न उगाने के लिए पानी नहीं, तो भी जीवन खत्म। पानी कम होने के साथ-साथ यह प्रदूषित भी होता जा रहा है। नदियों-नालों के आस-पास रहने वाले लोग कचरा और गंदगी इनमें बहा देते हैं, जिससे ये नदियां-नाले ज़हर के चलते-फिरते भंडार बनते जा रहे हैं। ये किसी से छिपा नहीं कि वो गंगा, जिस की पवित्रता की सौगंध हम खाते हैं, कितनी मैली हो गई है। फ़ैक्टरियों से निकलने वाला कूड़ा-कचरा भी इन नदियों के आगोश में समा जाता है। उस पानी को जो साफ समझ कर पीएगा, नहाएगा, वो बिमारियों का शिकार तो होगा ही।
वातावरण में कार्बन व ग्रीन हाउस गैस की मात्रा बढने से विश्व का तापमान बढ़ रहा है। पावर स्टेशनों व औद्योगिक इकाइयों, गाड़ियों, जीवाश्म इंधन, बायो गैस, प्लास्टिक व कचरे से निकलने वाला धुआं हमारे भविष्य को भी अंधेरा कर रहा है। पिछले 100 वर्षों में सहारा का तापमान 10 प्रतिशत बढ़ चुका है। वैज्ञानिकों के अनुसार 21वीं शताब्दी में पृथ्वी का तापमान 3 डिग्री से 8 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है। कई हिस्सों में बर्फ की चादरें पिघल जाएंगी, समुद्र का जल स्तर बढ़ने के साथ दुनिया के कई हिस्से डूब जाएँगे। भूमंडलीय तापमान से होने वाली तबाही किसी विश्वयुद्ध या क्षुद्र ग्रह के पृथ्वी से टकराने से होने वाली तबाही से भी ज़्यादा होगी। आने वाले दिनों में सूखे व बाढ़ की घट्नाएं बढ़ेगी और मौसम का मिज़ाज पूरी तरह बदला हुआ दिखेगा।
तो समझ लीजिए, मान लीजिए कि जहां हम रह रहे हैं वो जगह कितनी विस्फोटक है। हमें इस धरती को अपने बाल-बच्चों के लिए एक बेहतर जगह बनाना है। क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए एक झुलसी हुई मरीज़ धरती देना चाहते हैं या फिर हरी-भरी पुष्ट धरती। ऋग्वेद में भी कहा गया है- उप सर्प मातरं भूमिम् अर्थात भूमि की सेवा करो। इसका अंधाधुंध दोहन नहीं बल्कि इसका पोषण करो। इस धरती को हमें वन लगा कर हरा भरा बनाना होगा। जीवनामृत पानी को ज़ाया न जानें दें। प्राकृतिक संसाधनों का मितव्ययता से इस्तेमाल करना पड़ेगा। गाड़ियों का विवेकपूर्ण प्रयोग करना चाहिए। कूड़ा करकट फ़ेंकने वालों व वन काटुओं की को नज़र अंदाज़ करना भारी पड़ेगा। अथर्ववेद के भूमि सूक्त के मत्रांश में कहा गया है- माता भूमि: पुत्रो अहं पृथिव्या अर्थात धरती मा के समान है और मैं इसका पुत्र हूं। इस मत्रांश को जीवन में अपनाने की आवश्यकता है।

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