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बच्चों का सर्वांगीण विकास -- राजेश सारस्वत

अभिभावकों के योगदान के बिना बच्चों का सर्वांगीण विकास होना असंभव है। एक तरफ देश में बच्चों की शिक्षा-दिक्षा के साथ-साथ उसके सर्वांगीण विकास के लिए शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत प्रत्येक विद्यालय में स्कूल प्रबंधन समिति के गठन का प्रावधान और नियम के अनुपालन, अनुश्रवण व संस्तुति को अनिवार्य किया गया है वहीं पर अभिभावक अपने बच्चों को भार समझ कर विद्यालय में अध्यापक के हवाले कर के अपने आप को ऐसे हल्का महसूस करते हैं जैसे कोई मुसीबत अपने सिर से टाल कर भविष्य में सुख शांति का कोई प्रावधान कर दिया हो। 
      पाठशाला में होने वाली बैठकों में अभिभावकों की बमुश्किल बीस प्रतिशत उपस्थिति दर्ज की जाती है जिसके चलते न तो अध्यापक बच्चों के विषय में अभिभावकों से विचार विमर्श कर सकते हैं और न ही अभिभावकों द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में कुछ जरूरी बदलाव के लिए कोई सलाह मश्विरा मिल पाता है। अभिभावकों की अपने बच्चों के प्रति इस दिशा में बेरुख़ी होना जहाँ पर उसकी पढ़ाई को बाधित करता है साथ में बच्चों के अन्दर अन्य गुणों के ऊपर भी आवरण लगा लेता है। अगर अभिभावकों और अध्यापकों के बीच सही सामंजस्य बैठ जाए और सयम समय पर बच्चों की कमियाँ और उसके अन्दर छिपे गणों को सही दिशा सही मंच मिल जाए तो बेहतरीन परीणाम देखने को मिल सकते हैं। आवश्यक है कि स्कूल प्रबंधन समिति की बैठक अभिभावकों की हाजिरी सुनिश्चित की जाए और वहाँ की कमियों का निराकरण कर सर्वांगीण विकास में अपनी भूमिका निभाई जाए। 

राजेश सारस्वत

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