असम्भव है इन्क्लूसिव एजुकेशन --- सचिन ठाकुर

शिक्षक हूं साहब।परिस्थितियों को समझना ,उनका विश्लेषण करना ,स्वतंत्र चिंतन करना मेरे शिक्षक होने का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू है।
मैं हमेशा लिखता रहता हूं कि शिक्षण कोई व्यवसाय नहीं है,ये जुनून है, तप है और मानवता की सबसे महत्वपूर्ण सेवा है।इसलिए शिक्षण वायवस्था को पूरी तरह शिक्षा विदों के हवाले किया जाना चाहिए । शिक्षण व्यवस्था को बेहद अन प्रोफेशनल लोग चला रहे हैं जिनको जमीनी स्तर की कोई जानकारी नहीं है।
2008 में हाई कोर्ट के चाबुक से शिक्षा विभाग ने आनन फानन में पीपल विध डिसएबिलिटी एक्ट 1995 को लागू करने हेतु शिक्षकों को स्पेशल चिल्ड्रन को पढ़ाने हेतु सेंसेताइज़ करने के लिए एक हफ़्ते की विशेष कक्षाएं एस सी ई आर टी सोलन और जिला डाइट में आयोजित की । मैं इस कार्यक्रम का राष्ट्रीय स्त्रोत व्यक्ति था।मुझे इसके लिए सोलन और देहरादून में प्रशिक्षित किया गया था।दो साल चले इस कार्यक्रम में मैंने लगभग 36 हज़ार शिक्षकों को प्रशिक्षित किया।मैंने खुद इसके लिए प्रभाव शाली पॉवर प्वाइंट प्रेजेंटेशन बनाई और इंटरनेट से बेहद दिलचस्प डाटा और ज्ञान इक्कठ्ठा किया।
आप में से बहुत शिक्षक जो इस प्रशिक्षण का हिस्सा रहें है वो गवाही से सकते की वो कक्षाएं प्रभावी थी।
परन्तु इस प्रशिक्षण के 10 साल बाद मुझे आपको ये बताते हुए तनिक भी संकोच नहीं हो रहा कि जो कुछ मैं उस प्रशिक्षण में आपको बता रहा था,जो कुछ मुझे राष्ट्रीय कार्यशाला में समझाया गया था,जिन तरीकों से मुझे टेकनाईज किया गया था वो सब पूर्णतः बकवास और गैर सतही था।
आजकल धरमशाला बाल विद्यालय में कार्यरत हूं।मेरे स्कूल में स्पेशल चिल्ड्रन हेतु आई डी विंग का विद्यालय भी समाहित है।आजकल स्पेशल चिल्ड्रन हेतु विशेष प्रशिक्षण शिविर विद्यालय में चल रहा है। एस एस ए के माध्यम से चल रहे इस शिविर के इंचार्ज मेरे घनिष्ठ मित्र बी आर सी संजय निरूला जी हैं।उनके आमंत्रण पर मैं शिविर में विशेष बच्चों से मिलने गया। बच्चों के साथ बैठा।उनके जीवन के संघर्ष को बेहद नजदीक से देखने का मौका मिला।उनकी सीखने की कूवत,छोटी छोटी चीजों को सीख उसे कर दिखाने का उल्लास मेरी पलकों को गीला कर गया।उनकी विकलांगता मुझे अंदर तक हिला देने के लिए काफी थी।कुछ बच्चे बोलने में अक्षम थे,कुछ देखने में,कइयों के हाथ पांव टेढ़े तो कई  सलो लेर्नर।कोई मेंटली रेतार्डेड बच्चा तो कोई किसी व्याधि से ग्रस्त।
मैं निसंदेह नास्तिक हूं परन्तु किसी भी मानव को इस कदर बेसहारा और दयनीय स्थिति में देख भावुकता में मैं आसमान कि तरफ देख कर एक दो गाली जरूर दे देता हूं।ऐसा इस बार भी हुआ।मैंने बच्चों कि कुछ तस्वीरें ली,जो इस पोस्ट के साथ शेयर कर रहा हूं,उनको शाबाशी दी।मेरा स्नेह पाकर वो विभोर भी हुए।
परंतु मानवीय स्तर पर दयावश आप इन बच्चों को भाग्य के सहारे नहीं छोड़ सकते।मैंने महसूस किया कि आज से दस साल पहले मैंने जो कुछ प्रशिक्षण के दौरान सीखा था और हज़ारों शिक्षकों को सीखाया था वो एक दम बेईमानी था।आप इन बच्चों को आम बच्चों के साथ रख बेहद अमानवीय कार्य कर रहे हैं।एक्सक्लूसिव एजुकेशन की अवधारणा सही थी।विशेष बच्चों हेतु विशेष विद्यालय ही सही है।आम बच्चों के साथ बैठ वो ना तो उस रफ्तार से कुछ सीख सकते  ना ही आम अध्यापक विशेष बच्चों को कुछ सीखा सकता है।
ये असम्भव है।
एक सप्ताह के प्रशिक्षण के बाद आम अध्यापक से आशा करना की को विशेष बच्चों को पढ़ाने लायक हो गया बिल्कुल वैसा है जैसे धरमशाला से अण्डमान निकोबार पैदल जाना।
इन्क्लूसिव एजुकेशन का मूल कारक डिसेबल चिल्ड्रन को आम बच्चों के साथ बीठा उनमें आत्मीयता पैदा करना था।आप हैरान होंगे कि मेरे विद्यालय की कक्षा सात में सभी बच्चे स्पेशल हैं।कोई भी आम बच्चा इस कक्षा में है ही नहीं।सामान्य बच्चों के अभिभावकों ने अपने बच्चे विद्यालय से हटा लिए।तो आत्मीयता पैदा हुई के नहीं इस पर शोधार्थियों को शोध कर सरकार और न्याय पालिका तक पहुंचाना चाहिए,परंतु एक पूरी कक्षा से सामान्य बच्चे गायब हो गए ये मैं बता देता हूं।सामान्य बच्चों के अभिभावक गलत नहीं है।सामान्य बच्चों के लिए प्रतियोगिता निर्बाध गति से दिन पर दिन कठिन होती जा रही।वो अपने बच्चों को विशेष बच्चों के साथ बिठा जोखिम नहीं ले सकते।शिक्षक भी कतई खुश नहीं हैं।अलबत्ता तो वो विशेष बच्चों  को सीखाने के योग्य है नहीं है दूसरा उनको अपना सिलेबस पूरा करना है और रिजल्ट के चाबुक से भी पार पाना है।ये दोनों काम आपकी कक्षा में स्पेशल चिल्ड्रन होते हुए संभव नहीं है।
इसलिए जरूरी है कि इन्क्लूसिव एजुकेशन पर नए सिरे से बहस हो।प्रकृति पहले ही इन मानव पुत्रों पर जुल्म ढा चुकी है,हम इन पर इतनी बेरहमी नहीं दिखा सकते।
कोई भी जो शिक्षण व्यवस्था के निर्णय लेने वाली संस्थाओं से जुड़ा हो इस लेख पर गौर फरमाए।कोई भी वकील मित्र कोर्ट में इस बारे पी आई एल दायर करे।मेरी नजर में ये मानवता की महान सेवा होगी। मैं विश्व विद्यालयों को भी इन्क्लूसिव एजुकेशन के विपरीत प्रभावों पर गहन शोध करने हेतु आमंत्रित करता हूं। पीपल विद्घ डिसएबिलिटी एक्ट 1995 के वास्तविक ध्येय और हासिल के अध्ययन हेतु में मानव संसाधन मंत्रालय और यू जी सी को भी आमंत्रित करता हूं।
मैंने स्पेशल एजुकेटर्स से भी बात की।उनमें से एक भी इन्क्लूसिव एजुकेशन के पक्ष में नहीं था।उनमें से हर किसी का मानना था कि सामान्य बच्चों के साथ स्पेशल चिल्ड्रन का उठना बैठना ,खेलना और खाना तक हो सकता,लेकिन सीखना नहीं।उनको एक ही कक्षा में बैठाना सनक है, अमानवीय है।स्पेशल स्कूल्स में   शायद ही उनको पता चले कि प्रकृति ने उनके साथ कठोर अन्याय किया है ,सामान्य स्कूल में तो हर सेकंड उनको महसूस होता की वो विकलांग है।उनकी हीन भावना घटती नहीं बल्कि कई गुना मल्टीप्लायी हो रही है।
स्पेशल बच्चों के साथ काम करना बेहद कठिन और जटिल है।आप दो मिनट में ही विचलित और फ्रस्टेट हो सकते।सोचिए स्पेशल एजुकेटर्स जो पूरा दिन इन बच्चों के साथ गुजारते हैं।वो उन बच्चों को सीखा रहे जिनके सीखने की अलबत्ता क्षमता है ही नहीं और अगर है भी तो बेहद धीमी।
मुझे लगा इतना सिर खपायू और विचलित करने वाला काम करने  वाले शिक्षकों को बेहद सम्मानजनक और आम शिक्षक से कोई 50 गुना ज्यादा वेतन मिलता होगा।
कोतुहल वश मैंने पूछ भी लिया।सामने बैठी स्पेशल एजुकेटर्स विकलांग बच्चों को सिखाते वक्त,एक ही चीज को बीस बीस बार रिपीट कर इतनी असेहज नहीं थी जितनी इस सवाल को सुन कर हुई।आंखों में नमी लिए एक महिला साथी स्पेशल एजुकेटर ने जवाब दिया," पीछले बीस सालों से सेवा ही के रहे सचिन सर।।9000 ₹ से शुरू किया था।ना रेगूलर हुए ना वेतन में वृद्धि हुई।अब भी नौ हज़ार रुपए ही देती है सरकार..... "
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता भौतिक शास्त्र,

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