कहीं हम शास्त्रीजी को भूल न जाएं--- जगदीश बाली

हर वर्ष 2 अक्तूबर आता है और गांधी जयंति को मनाने के लिए विभिन्न विभागों को सरकारी आदेश आते हैं कि इस दिन को कैसे मनाया जाना है। इस गहमा गहमी के बीच अपने ही देश के एक और महान आदमी को हम या तो भूल जाते हैं या वे हाशिए पर चले जाते हैं। जब से मैं कुछ जानने वाला हुआ तब से कोई ऐसी सरकारी चिट्ठी मेरी नज़रों से नहीं गुज़री जिसमें हमारे पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी के जन्मदिन को मनाने का कोई जिक्र हुआ हो, आदेश तो दूर की बात है। क्या हम देश के इस महान आदर्श को भूल तो नहीं रहे हैं? ठीक वैसे ही जैसे तेंदूलकर या सहवाग के शतकों के सामने राहुल द्रविड़ का शतक कहीं नजर अंदाज हो जाता था। परन्तु इसके मायने ये नहीं कि द्रविड़ का शतक कम महत्व रखता था। खैर वो क्रिकेट है , एक खेल है जिसमें ऐसा होना कोई बड़ी बात नहीं। परन्तु 2 अक्तूबर को लाल बहादुर शास्त्री को भूल जाना या भूलते भूलते याद करना या औपचारिक बोझ समझ कर श्रद्धांजलि मात्र देना उनके प्रति हमारी उदासीनता का बड़ा उदाहरण है। इस बात में संदेह नहीं कि गांधीजी विश्व इतिहास के पटल पर बड़ा नाम व स्थान रखते हैं, परंतु हम भारतीयों के लिए तो शास्त्री जी किसी बड़े या महान पुरुष से कम नहीं है। बेशक गांधी जी का दायरा बड़ा हो सकता है, परन्तु अपने भारतीय दायरे में शास्त्री जी का योगदान भी कम महत्वपूर्ण नहीं। यहां बात तुलना की नहीं बल्कि अपने आदर्श पुरुषों को सम्मान देने की है। दोनों महान पुरुषों ने अपने देश को बनाने में योगदान दिया है। शास्त्री जी भी देश के प्रधानमंत्री थे और ऐसे प्रधानमंत्री थे जिन्होंने अपनी सादगी, उच्चचरित्र व स्वार्थहीनता की अनोखी मिसाल पेश की। जहां महात्मा गांधी ने 'करो या मरो' का नारा दिया, वहीं भारत-पाक युद्ध के विषम समय में समय शास्त्री जी ने  'जय जवान व जय किसान का नारा' दे कर देश के जवानों का हौसला बढ़ाया व किसानों को प्रेरित किया। जहां गांधी जी के संघर्ष से हम वाकिफ हैं, वहीं शास्त्री जी के सुकर्मो की गूंज भी कम नहीं। पैदल लंबा सफर चलने के बाद नदी को तैर कर पार करके जिस विद्यार्थि ने शिक्षा ग्रहण की हो और आगे चल कर देश का प्रधानमंत्री बना हो, उस महान पुरुष के आदर्श व्यक्तित्व के बारे में अंदाज़ा लगाया जा सकता है। 
विभिन्न मंत्री पदों पर रहते हुए भी उनमें मंत्रीपद की कोई ठसक नहीं थी, कोई अहंकार नहीं था। बनारस में इंटर कॉलेज में हाईस्कूल की पढ़ाई के दौरान जिस चपरासी ने उन्हें बीकर तोड़ने पर  जोरदार थप्पड़ जड़ दिया, उसी चपड़ासी को रेल मंत्री बनने के बाद एक कार्यक्रम में शास्त्री जी ने पहचान लिया, उसे मंच पर बुलाया और गले लगा लिया। ये इस बात की बानगी है कि शास्त्री जी मानवीय गुणों से कितने सम्पन्न थे। जब वे रेलवे मंत्री थे तो मा कहीं किसी की सिफारिश करने न आ जाए इसलिए उन्होंने उन्हें बताया था कि वे रेलवे में काम करते हैं। नैतिक रूप से वे इतने सबल थे कि 1956 में महबूबनगर रेल हादसे में 112 लोगों की मौत होने पर उन्होंने इस्तीफा दे दिया था।
प्रधानमंत्री के पद पर होने के बावजूद इस पद का दुरुपयोग अपने और अपने परिवार के लिए कभी नहीं किया। जब आवश्यक हो गया, तो उन्होंने निजी तौर पर 5000 का लोन ले कर कार खरीदी। शास्त्रीजी की अकस्मात मृत्यु के बाद उनकी पत्नी ने इस लोन पेंशन से चुकता किया। मृत्यु के समय शास्त्री जी के पास कुछ एक धोती कुर्ते और कुछ किताबें थी। इसमें शास्त्री जी का क्या कसूर की वे उसी दिन पैदा हुए जिस दिन गांधी जी। सादगी, देशभक्ति और ईमानदारी की मूर्त आदर्श पुरुष व भारत रत्न लाल बहादुर शास्त्री को नमन। क्यों न उनके जन्मदिन को भी तवज्जो दी जाए व गांधी जयंति की तरह जोश से मनाया जाए।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें