मलखान सिंह का दलित साहित्य --- डॉ राज कुमारी

मलखान सिंह दलित साहित्य ही नहीं सामाजिक परिवर्तन , अस्मिताओं के विमर्श का एक जाना माना नाम हैं ।जनवादी चेतना के वैचारिक कवि रहे हैं । अपने पहले काव्य संग्रह "सुनो ब्रह्मण "से चर्चित हुए इस कवि मल खान सिंह का जन्म 30सितम्बर 1948में उत्तर प्रदेश के हाथरस में हुआ उनका  देहत्याग अभी हाल ही में 9अगस्त 2019 में हुआ हैं । उनके द्वारा रचित दो ही काव्य संकलन उनको प्रतिष्ठित कवियों की श्रेणी में ले आते हैं । पौराणिक घिसी पिटी सभ्यता को धकेल नयी साहित्यिक परम्परा जो यथार्थवाद की समर्थक हैं , बहुजन समाज को चेताने का कार्य करती हैं ।सन 2012के हिन्दी साहित्य  सर्वेक्षणात्मक दलित  साहित्यकारों में अग्रणी माने जाते हैं । अपने काव्य संग्रह "सुनो ब्रह्मण "1996 में प्रकाशित होने के पश्चात ये चर्चित कवियों में आये और अपनी पृथक पहचान बना सके । उनका दूसरा बहुचर्चित काव्य संग्रह "ज्वालामुखी के मुहाने "2016में प्रकाशित हुआ । जिसमें मलखान सिंह जी के क्रांतिकारी , विद्रोही स्वर मुखरित होते हैं । इसी काव्य संग्रह की दो कविताओं की समीक्षा का प्रयास करने का प्रयास किया जा रहा हैं । पहली कविता "ज्वालामुखी के मुहाने " आतिशूद्रों के सामाजिक सीधेपन और ईश्वर के नाम पर बहकावे की पुष्टि करती हैं उसके पीछे शूद्रों एवं तमाम जातियों के लिए गढ़ दिये गये प्रपंचों को व्याख्यित करती हैं साथ ही एक जाति विशेष के एकाधिकारी होने का प्रमाण देती हैं । दलित वर्ग माने सभी वो लोग जो इस वर्णव्यवस्था के शिकार रहे बहुजन लोग जिनके माथे पर स्वर्ण जैसा टेग नहीं चिपका था । या ये कहूँ सभी बाहुबली भी इसी में आते हैं तो गलत ना होगा क्योँ कि ये रहस्यमयी चीज़े उनके लिए भी बंद किवडो के पीछे थी । खनखनाते अस्त्र -शस्त्र के दंभ ने कभी ईश्वरीय खोज या संवादो की विशेष शक्ति तक जाने नहीं दिया । जो भी परमात्मा ने फूंका एक ही जाति के कान में फूंका । भविष्यवाणी भी वहीं सुन पाये हालांकि कान सभी के थे। कितने भय मन की परतों में समाए थे कि कभी प्रश्न करने की जिज्ञासा हुई ही नहीं - 
   तुमने कहा -
मैं ईश्वर हूँ , 
हमारे सिर झुका दिये गये । अपनी सर्वोच्च होने के लिए कितने दुखों को उगा दिया तुमने । तुम्हारे कथन के अनुसार ब्रह्म सत्य , जगत मिथ्या सहज मान लिया हमने । बुत पूजाविधान की रूढ़ियों को ठोस रूप दे दिया हमने एवज़ में क्या दिया । जिसे पूजवाया उसके लिए भी शूद्र हो गये । उससे दूरी के फ़रमान हीन भावनाओं से ग्रस्त करने को देवालय से दूरी की हिदायतें जब कि पत्थर ही हैं इससे ज्यादा कुछ नहीं । तुम्हारा सच ही सच हैं क्योँ कि तस्वीर में तुम्हीं मुख से जन्मे हो ना । जबकि झूठ ही उगला तुमने , मूर्त पूजा , हमारे दास होने की कथाएँ । हमारी छाया से अशुद्ध होना , हमारी पैरों से पैदाइश सब फ़रेब लपेटे तुमने इस ब्रह्म की आड़ में और बना दिया समाज का गलित अंग । किस्सा ये भी कम नहीं कि गूंगा , बहरा , अंधा बना आधुनिकता में गटर में उतार दिया गया । हमारे हर कार्य का निर्धारण ऐसा किया कि हम सिर ऊँचा कर जी ना सके । अपवित्र कह कर रेखाएँ खींच दी गयी । ये जीतने भी षड़यंत्र रचे गये उनके पीछे एक ही मंशा का कर रही थी तुम्हारी पाखंडवाद की बेबुनियादी सत्ता के खुलासे ना हो जाये । इस कविता की अंतिम पंक्तियाँ -मदान्ध ब  र  ह म न 
            धरती को नरक बनाने से पहले 
            यह तो सोच ही लिया हॊता 
          कि ज्वालामुखी के मुहाने 
          कोई पाट सका हैं 
           जो तुम पाट पाते ! 
प्रस्तुत पंक्तियाँ साररूप में कह रही हैं कि ईश्वरीय रूप को आधार बना जो विद्रूपताये , असमानताएँ , व्यवस्था के नाम पर दुत्कार इन सभी का अंत कभी तो होगा । जिस प्रकार भू गर्भ में अत्याधिक गर्मी बढ़ जाने पर ज्वालामुखी फटते हैं ठीक उसी प्रकार इन यातनाओं की अति कभी तो विद्रोही स्वर के ज्वालामुखी रूप को प्राप्त होगी। उसे रोकना असम्भव हैं । अपनी आज़ादी वे हासिल करेंगे ही । तुम्हारे द्वारा संचालित दोगली सत्ता उन्हें अब स्वीकार नहीं हैं । ना ही अब उन्हें किसी ईश्वरीय शक्ति का झांसा दे वरगला सकते हो । ईश्वर के मर जाने की घोषणा करती बेबाकी से लिखी गई कविता "ईश्वर उसी दिन मर गया " इस कविता में दलितों के इतिहास की अनंत पीड़ाओं को उकेरा गया हैं उकेरा क्या जिया गया हैं । लेखक का स्वानुभूति पक्ष खूब मुखरित हो उठा हैं अपना आधिपत्य जमा लेने वाली जातियों के दंभ एवं सदियो से शोषित समाज के उत्पीड़न की दासता को मर्मज्ञता से स्वर दिया गया हैं । मनुष्य जो माँ के गर्भ से सहज जन्म लेते रहे हैं उसकी ब्रह्म के अंगो से अकल्पनीय उतपत्ति का धोखा अब समाप्त हो चुका हैं कविवर कहते हैं दोनों का जन्म समान रूप से हुआ एक ही मार्ग माँ की कोख किंतु देखिये तो सहोदर होते हुए भी एक साथ बचपन बीतने पर भी ज़मीन आसमान के अंतर पाट दिये गये हैं ईश्वर जो अदृश्य हैं , आसमानी , अप्रत्यक्षित हैं , चमत्कारी हैं , हिंसको को वशीकरण करता हैं जो एकदम में समुन्द्र नाप लेता , तमाम कलाबाजियों से परिपूर्ण ईश्वर हैं उसी विशेष की पीठ ठोंकता शाबाशी देते हुए हर गलत कार्य करने पर , आदम की ही पीठ सहलाता हैं अपने वजूद का एहसास कराता हैं । स्वप्न में भी उसी के आता , आशीर्वाद , दिलासा , दर्शन भी उसी विशेष को देता । आदि मानव खोजी प्रवृति लिए पत्थर के पेट से आग निकालता हैं गोलाई से पहिया बनाता हैं , धरती सीने से अन्न उगता , और जन्मता समुदायिक , प्रेम सौहार्द पूर्ण जीवन का रूप । डर जो रक्षा हेतु खोज लाया लकड़ी पत्थर के नुकीले घाव देने वाले हथियार भयभीत होने लगे सहज विचरते हिंसक जानवर खौफनाक महौल बनाया मानव ने अपने इर्द -गिर्द । मनुष्य की प्रत्येक खोज आदिकाल से अपनी ही रही ।प्राकृतिक आपदाओं का नियन्त्रण भी उसने खुद ही सीखा । ऐसे में जो चीज़ शूल बनी जिसका अफ़सोस कवि ने जताया कि आज भी खुद को उनका वंशज बताने वाले ईश्वर सत्ता को पुकार रहे । अस्तित्वहीन सत्ता को आदिमानव की खोजों का श्रेय दे रहे । ईश्वर के मृत होने की घोषणा करते हुए सिद्ध करते हैं कि ईश्वर उसी दिन मर गया था -"जिस दिन कि आदम ने 
                    यह जाना कि 
                सृष्टि का जनक , पालक , संहारक 
              ईश्वर नामधारी कोई 
             स्त्री पुरुष नहीं 
            धरती के गर्भ में छूपा 
      सतत परिवर्तन का नियम हैं 
        जो कार्य कारण की अटूट 
        शृंखला में गुंथी 
      अतुल्य ऊर्जा से संचालित हैं 
       यही सत्य हैं , 
       यही नित्य हैं 
      यही सार्वभौम हैं।  गंभीरतापूर्वक भावों , दर्द की खोह ,  संधर्ष की अनगिनत कथाएँ मिलती हैं ।  यथार्थ अभिव्यक्ति  के  पक्षधरों में अपनी अनूठी पहचान बनाने वाले सच्चे मायनों में साहित्य सेवी थे।  मलखान सिंह जी ने आधुनिक विमर्श के विषयों को जिनमें दलित , बहुजन विमर्श , स्त्री विमर्श ,  को अपनी कविताओं को कथानक बनाया । सहज शब्दयोजना , नये उपमान , पत्थरों के सीने , आग की पोटली , घुप्प अंधरे आदि रूपकों का गठन शिल्प को भिन्न पहचान देता हैं । 
डॉ .राजकुमारी

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