हिंदी दिवस --- राजेश वर्मा

मुगलई काल में अरबी-फारसी का बोलबाला था, अंग्रेजों ने राजकाज के लिए अंग्रेज़ी व उर्दू को चलाया लेकिन जिस देश को हिंदुस्तान के नाम से जाना जाता है उसकी भाषा हिन्दी न बन पाई। 14 सितंबर 1949 को देश के संविधान द्वारा हिन्दी को भारत की राजभाषा के रूप में मान्यता दी गई और धारा 343 से 352 तक राजभाषा व अन्य क्षेत्रीय भाषाओं की व्यवस्था की गयी। अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ की परिभाषा कहती है कि 'राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी, संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा। खंड (1) में किसी बात के होते हुए भी, इस संविधान के प्रारंभ से पंद्रह वर्ष की अवधि तक संघ के उन सभी शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाता रहेगा जिनके लिए उसका ऐसे प्रारंभ से ठीक पहले प्रयोग किया जा रहा था '
 
 
इस परिभाषा में यह तो व्याख्या है कि राजभाषा हिन्दी ही होगी और अंग्रेजी महज 15 वर्षों तक कामकाजी भाषा रहेगी अर्थात् संवैधानिक स्थिति अनुसार हिन्दी केवल प्रतीकात्मक तौर पर ही संघ की राजभाषा है जबकि अंग्रेज़ी सह भाषा लेकिन असलियत में अंग्रेज़ी ही आज भी राजभाषा है और हिन्दी केवल एक सह भाषा के रूप में अपना फर्ज निभा रही है। हिन्दी को प्रोत्साहित करने व इसके प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए गृह मंत्रालय द्वारा जून 1975 में स्वतंत्र विभाग के रूप में राजभाषा विभाग की स्थापना भी की गई। इसी तरह राजभाषा अधिनियम की धारा 4 के तहत 1976 में राजभाषा संसदीय समिति का गठन हुआ, राजभाषा नियम 1976 में लागू करने के साथ ही राजभाषा संसदीय सम‍िति की अनुशंसा पर राष्ट्रपति द्वारा 'राजभाषा नीति' बनाई गई, इस दिशा में और भी बहुत सी समितियां बनाई गई लेकिन सच कहें तो इन समितियों ने कागजों व बैठकों में तो राजभाषा के उत्थान के लिए बहुत कुछ किया परंतु ये सब आमजन तक न तो इस भाषा को सही मायनों में पहुंचा सके और न ही इसके महत्व को बताने में कामयाब हो सके। 
आज भी जो छाप मुंशी प्रेमचंद जी ने हिन्दी के माध्यम से करोड़ों दिलों में छोड़ रखी है कोई और साहित्यकार आज दिन तक वैसी जगह नहीं बना पाया है। हिन्दी के उत्थान के नाम पर संगोष्ठियां होती हैं महफ़िलें सजती हैं लेकिन क्या कभी इन सब कार्यक्रमों से एक आम इंसान हिन्दी को और बेहतर तरीके से समझ पाया? शायद नहीं! आम लोगों में राजभाषा के महत्व को लेकर कोई सकारात्मक संदेश नहीं गया, हां संगोष्ठियों व बैठकों में मौजूद बुद्धिजीवियां द्वारा एक दूसरे को सम्मानित करने व चाय-पान की व्यवस्था करवा कर हिन्दी का गुणगान बहुत होता आया। ऐसे आयोजनों का महत्व तो तब है जब इसके परिणाम स्वरूप गैर हिन्दी भाषी लोग भी हिन्दी की वकालत करते और हिन्दीभाषी हिन्दी को ही अपने जीवन का हिस्सा मानते न कि वह पलायन करते। चाहे संविधान की बात हो या इसमें किए गए अन्य प्रावधानों की आज तक राष्ट्रहित में भाषा को जोड़ने की बजाए बांटा ही गया राजभाषा अधिनियम 1963 द्वारा राजभाषा के शासकीय कार्यों, नियमन हेतु जो प्रावधान किए गए उनमें भाषा के आधार पर तीन भाषायी क्षेत्र बना दिए जिसके तहत 'क' क्षेत्र में- उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, हरियाणा, हिमाचल, उत्तरांचल, झारखंड, राजस्थान, दिल्ली एवं अंडमान द्वीप समूह, 'ख' क्षेत्र में गुजरात, महाराष्ट्र तथा उपरोक्त के अतिरिक्त अन्य सभी राज्य एवं संघों को' ग' क्षेत्र रखा गया। इस विभाजन के आधार पर हिन्दी कुछेक राज्यों की भाषा ही बन पायी न की राष्ट्र की ?
 
बात की जाए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी की स्थिति की तो विश्व के 60 से अधिक देशों के विभिन्न विश्वविद्यालयों और अन्य शैक्षणिक संस्थानों में हिन्दी पढ़ाई जा रही है। इसे हिन्दी भाषा के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते प्रभाव के तौर पर देखा जा सकता है। चीनी भाषा विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है तो हिन्दी इसके बाद 55 करोड़ लोगों द्वारा बोले जाने वाली दूसरी भाषा है और जिस अंग्रेजी के पीछे देश भाग रहा है उसका नंबर हिन्दी के बाद ही आता है। वैश्वीकरण के चलते कई देश हिन्दी की बढ़ते महत्व को स्वीकार कर रहे हैं। एक तरफ दक्षिण अफ्रीका, फीजी, सूरीनाम मॉरीशस, गुयाना, त्रिनिदाद, आदि जैसे देशों में हिन्दी की जड़ें निरन्तर गहरी होतीं जा रही हैं तो वहीं दूसरी तरफ अमेरिका, आस्ट्रेलिया, रूस, जापान, ब्रिटेन, जर्मनी, इटली, कोरिया, चीन, पौलेण्ड आदि जैसे प्रमुख देशों ने भूमण्डलीकरण के इस दौर में आर्थिक रूप से भारतीय बाजार में टिके रहने के लिए हिन्दी को ढाल बनाया है। 
 
भूमण्डलीकरण के इस दौर में उपभोक्ताओं तक अपने उत्पादों की सुगम पहुंच सुनिश्चित करने के लिए बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों ने आम आदमी से सम्पर्क स्थापित करने के लिए हिन्दी विज्ञापनों को ही खरीद-फरोख्त का माध्यम बनाया है। देश में बाहरी कंपनियों के उत्पाद तभी गांव-गांव तक पहुंच रहे हैं जब उनके लिए हिन्दी संपर्क सूत्र बनकर उभरी। पूरा विश्व हिन्दी को ढाल बनाकर अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में लगा हुआ है लेकिन यही हिन्दी हमारी बेरुखी का शिकार हो रही है। बात चाहे इलैक्ट्रोनिक मीडिया की हो प्रिन्ट मीडिया की हो या फिर सोशल मीडिया की सभी जगह हिन्दी का प्रभुत्व देखा जा सकता है। सोशल मीडिया पर भी आज सबसे ज्यादा वायरल होने वाला कंटेट हिन्दी भाषाई ही है। देश में सर्वाधिक समाचार पत्र एवं पाठक हिन्दी भाषाई ही हैं।
 
हाल ही के कुछेक वर्षों के दौरान भारत सरकार द्वारा जहां हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ में अधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने के लिए प्रयास किए जा रहे है वहीं दूसरी तरफ़ शशि थरूर जैसे नेता हिन्दी को आगे बढ़ाने पर सवाल खड़ा करते हुए सदन में कहते हैं "हिन्दी राष्ट्रीय भाषा नहीं हैं, यह अधिकारिक भाषा है, हिन्दी को आगे बढ़ाने पर एक महत्वपूर्ण प्रश्न उभरता है, हमें संयुक्त राष्ट्र में आधिकारिक भाषा की क्या जरूरत है? अरबी, हिन्दी से ज्यादा नहीं बोली जाती है, लेकिन यह 22 देशों में बोली जाती है, हिन्दी केवल एक देश की आधिकारिक भाषा के तौर पर प्रयोग की जाती है " इस तरह के विचार कभी भी राष्ट्रहित में नहीं हो सकते सरकारी प्रयासों के चलते ही संयुक्त राष्ट्र संघ ने हिंदी में न्यूज वेबसाइट लांच की इससे हिन्दी को एशिया की पहली गैर आधिकारिक भाषा बनने का सम्मान प्राप्त हुआ। पिछले साल संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी न्यूज बुलेटिन की शुरुआत आदि कार्यक्रम संयुक्त राष्ट्र संघ की सातवीं अधिकृत भाषा बनने की तरफ बढ़ते कदम हैं। भारत सरकार भी हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की अधिकृत भाषा बनाने की कोशिश में है और संयुक्त राष्ट्र संघ के इन कदमों से लग रहा है कि हिंदी जल्द ही संयुक्त राष्ट्र संघ की सातवीं अधिकृत भाषा बनेगी। हमे याद है 1945 में संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक तौर पर अंग्रेजी, रूसी, फ्रांसीसी और चीनी आदि केवल 4 अधिकृत भाषाएँ ही थी और ऐसा नहीं यह ज्यादा बोली जाने वाली भाषाएँ थी केवल शक्तिशाली देशों की भाषा होने के कारण ही इनको जगह मिली। हालांकि बाद में अरबी और स्पेनिश भी संयुक्त राष्ट्र की भाषाओं में शामिल हो गई। हमारी हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनने का सौभाग्य तभी मिल सकता है जब संयुक्त राष्ट्र संघ में एक प्रस्ताव के तहत मौजूदा 193 सदस्य देशों में से दो तिहाई यानि 129 देश इसके लिए अपनी सहमति जता सकें व इसकी प्रक्रिया के लिए वित्तीय लागत भी साझा करने पर राजी हों। खैर यह तो अंतरराष्ट्रीय स्तर की बातें व मसले हैं इससे पहले जरूरी यह है की हर भारतीय देश की संस्कृति व सभ्यता की पहचान बनी इस भाषा की अहमियत को समझे यह वह भाषा है जो दिलों को जोड़ने के साथ-साथ देशों को भी जोड़ने का काम कर रही है। हमे गर्व होना चाहिए की हम इस भाषा से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं। 

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