शिक्षक दिवस --- सचिन ठाकुर

पेशे से शिक्षक हो जाने का अर्थ शिक्षक हो जाना ही नहीं है। मैंने अपने आप को बहुत कम मौक़ों पर शिक्षक पाया है। ज़ियादहतर को-लर्नर की ही भूमिका रही। तब भी पद में शिक्षक होने के नाते इस बात पर विशेष मेहनत करता हूँ कि मेरे विद्यार्थी अपने उन बुजुर्गों के प्रभाव से बचे रहें जिनका मस्तिष्क एक बने-बनाए सुविधापूर्ण तंत्र का अभ्यस्त हो चला है।

मेरा स्वप्न है कि मेरे विद्यार्थी जब बड़े हों तब इनकी चेतना बाह्य-प्रभावों से मुक्त हो और वे आत्मानुशासित हों। उनके उद्देश्य और इरादे सुदृढ़ हों, पर निर्णय लचीले हों। महान लोगों के आदर्श उनके सामने हों, पर उनकी ग़लतियाँ मौलिक हों। आगे बढ़ने का अर्थ उनके लिए किसी अन्य से आगे बढ़ना न हो, स्वयं से आगे बढ़ जाना हो। जीवन के विभिन्न पक्षों पर चालाक चुप्पियाँ न हों, लेकिन एक गहरे मौन की जगह हमेशा बनी रहे। नकारात्मक क़िस्म की ऊर्जा के बीच पञ्चम सुर में गीत गाने का कौशल विकसित करें। आलोचना का स्पष्टीकरण कभी न दें। कम-अज़-कम एक वाद्य-यंत्र को बजाने या सुनने में उनकी रूचि पैदा हो। सारे विद्यार्थियों में संगीत की  बुनियादी समझ का होना अनिवार्य हो। दूसरों के जीवन पर जजमेंटल अप्रोच से बचें। समाज में समानता के अवसरों के लिए संघर्ष करें। विविधता को स्वीकार करें। आत्मपीड़क-आत्महंता कलाकारों-लेखकों में नायकत्व न तलाशें।

दो-चार बार दिल टूट जाने पर प्रेम करने से भयभीत न हों। 
अकेलेपन से भयभीत होकर प्रेम न करें। 

हालाँकि इन बातों के लिए परीक्षा में कोई नम्बर नहीं हैं, पर जीवन की मार्कशीट ठीकठाक बनेगी, निजी अनुभव से इतना तो कहा ही जा सकता है।

और आख़िरी बात, एक सुंदर-शांतिपूर्ण जीवन जीने पर अपराध-बोध न महसूस करें।

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