शिक्षा का अभिप्राय महज़ नौकरी पाना अथवा अच्छे अंक प्राप्त करके आसपास और समाचार पत्रों की सुर्खियों में छाए रहना नहीं है। शिक्षा का वास्तविक अर्थ एक बेहतर नागरिक जागरूक नागरिक बनना होता है। आज हम जिधर भी नज़र दौड़ाते हैं हर तरफ़ केवल मात्र अंको को पढ़ाई के लिए मापदंड रखा गया है। घर जाते ही की माता पिता पूछते हैं कि फलां विषय में कितने अंक मिले हैं और कितने पर्सेंट बन रहे हैं। एक अच्छे अंको को प्राप्त करने वाला छात्र अगर एक अच्छा इन्सान न बन सका तो क्या आप उस पढ़ाई को बेहतर तालीम कहेंगे? फेल होने वाला विद्यार्थी अगर समाज में कोई बेहतर काम करता है समाज और परिवार की बेहतरी के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहता है तो क्या वह शिक्षित नहीं है? आज हमने शिक्षा के वास्तविक स्वरूप को पीछे छोड़ दिया है और अंको की मारामारी की इस अंधी दौड़ में कहीँ न कहीँ नैतिकता, इन्सानियत और सामाजिकता को नज़र अंदाज़ किया है, जो भविष्य के लिए अच्छा संदेश नहीं है। आज अगर विद्यालयों में जाकर निरीक्षण किया जाए तो नबे प्रतिशत छात्र आपको ऐसे मिलेंगे जो कि सर्वशिक्षा अभियान के कारण अच्छे अंको को प्राप्त करने में असफल है। सर्वशि‍क्षा अभियान एक ऐसी बीमारी आई जिसके चलते विद्यार्थी बिना कुछ पढ़े ही अग्रिम कक्षा में बैठता गया और नौवीं कक्षा में पहुंच गया।इसके बाद उसको ऐसे ब्रेक लगती गयी जिसका उसको आभास भी न था।भाषायी ज्ञान तथा गणित विषय की मूलभूत जानकारी न होने के कारण बच्चा आगे नहीं बढ़ पाता।एक अध्यापक उस बच्चे के भविष्य की चिंता लिए भरसक प्रयास करता है लेकिन सफल न होने पर उसको एक अच्छा नागरिक बनाने का प्रयास करता है। क्या ऐसे विद्यार्थियों को जो पढ़ाई में  कमजोर है उनको एक बेहतर इंसान बनाकर उनकी जिंदगी को बेहतर बनाकर उसकोशिक्षित कहना गलत है ? जिन अध्यापकों ने उस बच्चे को अच्छी तालीम दी है जो विषय विशेष में तो अच्छे अंक प्राप्त न कर सका लेकिन उसके अंदर जो अन्य गुण थे उनको बाहर निकाल कर उसकी जिंदगी को आसान बनाया, भविष्य को सँवारा उन अध्यापकों की भी पास फेल के आधार पर ही सम्मान और आलोचना सही है।अच्छे अंक प्राप्त करके अभद्रता का व्यवहार करने वाला बेहतर है या फेल और कम अंको वाला एक सुसंस्कारित अच्छा व्यवहार करने वाला छात्र बेहतर है? इस तरह की बहुत सारी बातें ऐसी हैं जिसको हम हमारा परिवेश गलत नज़रिए से देखता है। 

राजेश सारस्वत 
ठियोग, शिमला

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