शिक्षक दिवस की हार्दिक बधाई " वो पुरस्कार ही कैसे जो मांगना पड़े- राजेश वर्मा

शिक्षक दिवस उन गुरुओं के सम्मान में देश भर में मनाया जाता है जो अपने शिष्यों का भविष्य संवारने के लिए अपना सबकुछ अर्पित कर देते हैं। आजाद भारत के पहले उपराष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्‍णनन ने अपने स्टूडेंट्स से अपना जन्मदिन मनाने की बजाए इसे शिक्षक दिवस के रूप में मनाने का आग्रह सभी शिक्षकों को सम्मानित करने के उद्देश्य से किया था। बदलते दौर में शिक्षक दिवस तो वही रहा लेकिन सम्मानित होने का पैमाना बदल गया, अब शिक्षक दिवस पर कुछेक शिक्षकों को राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत किया जाता है और इन पुरस्कृत शिक्षकों को ही सभी शिक्षकों का सम्मान समझ लिया जाता है। प्रदेश व देश में हर वर्ष 5 सितंबर को कुछेक शिक्षकों को पुरस्कृत करने की प्रथा पिछले कई वर्षों से चली आ रही है। लेकिन इन पुरस्कारों के पैमाने को लेकर हर बार सवाल खड़ा होता है? सवाल यह भी है कि क्या यह पुरस्कार व पुरस्कृत होने वाले इस सम्मान से न्याय कर पाते हैं? डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्‍णनन ने भी कभी नहीं सोचा होगा की शिक्षक दिवस पर पुरस्कार से सम्मानित करने के लिए एक तरह की प्रतियोगिता आयोजित होगी। क्या अजीब सा नहीं लगता की,  जब किसी शिक्षक को कोई कहे की आपको पुरस्कार दिया जाएगा परंतु इसके लिए आपको अपनी तारीफ और आपके द्वारा किए गए अच्छे कार्यों के सर्टीफिकेट लाने होंगे भले ही वह फ्राड क्यों न हो? 
सर्वप्रथम तो हैरानी इस बात पर होती है की इन पुरस्कारों के लिए शिक्षक को खुद का नामांकन खुद ही करना पड़ता है अर्थात मेरे व मेरे कार्य के बारे में मैं ही मुल्यांकन करके विभाग को बताऊं की मैं बहुत अच्छा शिक्षक हूं मैंने फलां-फलां काम किए हैं । कोई भी स्वाभिमानी इंसान यह कभी नहीं चाहेगा  कि कोई पुरस्कार पाने के लिए उसे प्रचार प्रसार व सिफारिश जैसे हथकंडे अपनाने पड़ें। इन पुरस्कारों के लिए जून 2017 में बनाई गई पालिसी के अनुसार शिक्षकों के पास नामांकन करने के लिए कम से कम 15 वर्ष का शैक्षणिक अनुभव होना चाहिए । क्या 15 वर्ष का अध्यापन करने बाद ही कोई शिक्षक पुरस्कार के योग्य समझा जाएगा ? हो सकता है कुछेक शिक्षकों का कार्य एक वर्ष बाद भी इतना प्रशंसनीय रहा हो जितना 15 वर्ष का अनुभव रखने वालों का न हो। 
परिणाम का पैमाना भी इसमें एक नियम है यह अच्छी बात है की अच्छा परिणाम देने वाले शिक्षकों को सम्मानित किया जाए लेकिन परीक्षा परिणाम तो बहुत से शिक्षकों का अच्छा रहता है। इसके अतिरिक्त स्कूल प्रबंधन समिति या अन्य स्थानीय संस्थाओं द्वारा प्रशंसा व पुरस्कृत होना, एसीआर अर्थात वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट का आधार,  अन्य गतिविधियों जैसी एनसीसी, एनएसएस, स्काउट गाइड, विज्ञान मेला, आपदा प्रबंधन, लेखन, आदि जैसी अन्य सामजिक गतिविधियों में सहभागिता के लिए भी अतिरिक्त अंक हैं। यह सब कार्य केवल पुरस्कार के लिए नामांकन करने वाले शिक्षकों द्वारा ही नहीं किए जाते सैकड़ों शिक्षक हैं जो यह सब कार्य करते हैं बस फर्क इतना है वह न तो पुरस्कार की फाईल बना पाते हैं, न ही इसे आगे बढ़ा पाते हैं। हर वर्ष जब भी पुरस्कारों की घोषणा होती है तो बहुत सी आवाज़ें इन पुरस्कारों को लेकर भी उठती हैं, कोई कहता है कि राजनीतिक पहुंच वाले शिक्षक पुरस्कृत हो गए तो किसी पर शिक्षण के अलावा चौधर-चारी करने के आरोप लगते रहे हैं। यह आरोप यूं ही नहीं लगते इसके पीछे भी बहुत सी वजहें हैं वैसे भी 'जो दिखता है वह बिकता है' की धारणा को बहुत से शिक्षकों ने अपनाया है। ऐसे बहुत से शिक्षकों को देखा जा सकता है जो शिक्षण की बजाए अन्य गतिविधियों में लिप्त रहते हैं कुछेक को अखबारों की सुर्खियों में बने रहने के लिए कुछेक बच्चें के साथ गतिविधियां करते देखा जा सकता है लेकिन सभी बच्चों के साथ क्यों नहीं? पुरस्कार मिलने के बाद एक बार उन स्कूलों में जाकर देखा जाना चाहिए कि क्या अब भी वह अपने कार्य को उसी तन्मयता से कर रहे हैं जैसा कि पुरस्कार मिलने से पहले कर रहे थे? क्या अब भी वहां के बच्चों का लर्निंग लेवल वही है जो पहले था? क्या पुरस्कार के बाद भी उस विद्यालय में एनरोलमेंट बढ़ा? आदि प्रश्न भी तो जांच का विषय हैं। 
सरकार व विभाग को शिक्षक पुरस्कार के लिए शिक्षकों से खुद नामांकन भेजने की बजाए एक ऐसी पारदर्शी नीति बनानी चाहिए जिससे इन पुरस्कारों की गरिमा व सभी शिक्षकों का सम्मान बना रहे। एक शिक्षक के कार्य का निष्पक्ष विश्लेषण उसके विद्यार्थियों के सिवा कोई और नहीं कर सकता लेकिन वर्तमान में अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने वाले शिक्षक को ही पुरस्कृत किया जा रहा है। शिक्षक का व्यवहार, उसका चरित्र, उसकी सोच व अन्य गुण भी उसके शिक्षार्थियों पर प्रभाव डालते हैं। पढ़ने लिखने के अलावा एक बेहतर नागरिक व इंसान बनाने के पीछे भी शिक्षक की ही अहम भूमिका रहती है। कोई बच्चा भले ही किसी कक्षा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण न हो पाए लेकिन यदि वह ऐसा नागरिक बनता है जिससे देश व समाज लाभान्वित हो तो वह शिक्षा परीक्षा परिणामों से भी कहीं बेहतर है। 

क्यों नहीं ऐसी व्यवस्था बनाई जाती जिसमें विभाग द्वारा प्रत्येक विद्यालय में किसी सामजिक संस्था के माध्यम से एक प्रश्नोत्तरी भेजी जाए जो विद्यालय के प्रत्येक छात्र को आवंटित की जाए जिसमें बच्चों के बौद्धिक स्तर का आकलन करने की चीजें शामिल हों, शिक्षक के व्यवहार से जुड़े प्रश्न हो, उसके शिक्षण से जुड़े प्रश्न हो अर्थात विद्यार्थियों को शिक्षक के पढ़ाने के तौर-तरीके कैसे लगते हैं , इसके अलावा शिक्षक विद्यालय में सामाजिक सहभागिता के कार्यों को क्रियान्वित करता है या नहीं? यह भी देखा जाए की कक्षा में पढ़ने वाले ज्यादातर बच्चों की राय एक जैसी है या कुछेक की ही? वह कौन-कौन से विद्यालय से संबंधित कार्यों का निर्वहन कर रहा है। इन बिंदुओं पर जांच निष्पक्ष तरीके से किसी अन्य ऐजसीं से हो न कि शिक्षक द्वारा खुद ही। आज भी ऐसे सैकड़ों शिक्षक है जिन्होंने अपने शिक्षण से विद्यार्थियों के मन में ऐसी जगह बनाई है जिसे वह जीवन भर एक पूंजी की तरह संचित करके रखते हैं और जीवन के हर मुकाम पर उन शिक्षकों को याद करना नहीं भूलते लेकिन दुर्भाग्य है वह शिक्षक कभी भी न तो किसी पुरस्कार के लिए चयनित होते हैं न ही वह आगे बढ़कर खुद आवेदन कर पाते हैं। लेकिन राज्य स्तरीय पुरस्कार से सम्मानित होने वाले शिक्षक का एक ही ध्येय रह जाता है की अब उसे जैसे तैसे राष्ट्रीय पुरस्कार मिल जाए चाहिए, फिर इसके लिए चाहे कोई भी प्रोपगंडा क्यों न करना पड़े। एक इमानदार शिक्षक कभी ढिंढोरा नहीं पीटता की वह इमानदार है। शिक्षक दिवस पर शिक्षक को पुरस्कृत करने की नीति बननी चाहिए न कि अपनी ब्रांडिंग करने का माध्यम। 

राजेश वर्मा (मंडी)

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