कश्मीर में फिर महकेगी अमन की फिजा। जगदीश बाली

 मैं उसी कश्मीर की बात कर रहा हूं,  जिसकी खूबसूरती का दीदार होते ही कभी शहंशाह जहांगीर ने कहा था - गर फ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मीं अस्त/ हमीं अस्त ओ हमीं अस्त ओ हमीं अस्त। मतलब अगर धरती पर स्वर्ग है तो वह यहीं है, यहीं है, यहीं है। इसी बात को 'आबरू' फ़िल्म में मोहम्मद रफ़ी साहब ने यूं गाया है- हर चेहरा यहां चांद है, हर जर्रा सितारा/ ये वादी-ए-कश्मीर है जन्नत का नजारा। ये वही कश्मीर है, जहां की हसीं वादियों में लहलहाते केसर के खेतों से आती महक हर किसी को मदहोश कर लेती है। ये वही कश्मीर है, जहां की खुशनुमा फ़िज़ा में अगर कोई बर्फ से लकदक सफेद चादर ओढ़े पहाड़ों व आमंत्रित करती मनमोहक झीलों को देख ले, तो उसका दिल बस यहीं बस जाने को कर जाए। मगर अफ़सोस! ये वही कश्मीर है जहां केसर की खुशबू हिंसा व दहशत के अंधेरे में गुम हो कर रह गयी। जहां की सर्द हवाओं में न जाने कितने मोहब्बत के गाने, तराने व कसमे-वादे घुले हैं, उसे अस्त्र बना कर जन्नत-ए-कश्मीर को पाकिस्तान की नापाक हरकतों ने दोज़क कर दिया।  
अकसर स्कूल, कॉलेज व विश्वविद्यालय में कई बार दोस्तों से धारा 370 और कश्मीर पर बहस या बातचीत होती थी।  हर बार ये सवाल हमेशा अनुतरित ही रहता कि कश्मीर अगर भारत का एक राज्य है तो धारा 370 क्यों? अगर धारा 370 है तो भारत का ये कैसा राज्य? अगर भारत देश एक है, तो विधान, संविधान और तिरंगा कश्मीर का अलग क्यों? ये सवाल तब से अब तक तक यूं ही मस्तिष्क के पटल पर उभरता रहा। जब भी धारा 370 का ख्याल आता, ये ऐसी टीस का आभास दे जाता जैसे कश्मीर हमारा प्रोस्थेटिक अंग है।  आखिर बाकि राज्यों की तुलना में तीन गुणा ज़्यादा आर्थिक पैकेज कश्मीर को देकर भारत को क्या हासिल हुआ? भारत को हासिल हुआ आतंकवाद। भारत को हासिल हुआ कदम कदम पर पड़ोसी का दगा व पीठ पर खंजर। भारत को मिले अलगाववादी पत्थरबाज़ जिन्होंने हमारे सैनिकों को अपनान करने में कोई कसर न छोड़ी। भारत को नसीब हुआ संसद पर हमला, ताज होटल में नरसंहार, पठानकोट हमला, पुलबामा विस्फोट। भारत को मिली गोलियों की चुभन, विस्फोटों की दहशत। संविधान के पंडित, कानूनवेता, सियासत के धुरंधर या राजनीति के सिकंदर तकनीकि रूप से इतिहास के पन्नों व शब्दों को जैसे भी पेश करे, परंतु एक आम हिंदोस्तानी के दिल से हमेशा ये सवाल उठता ही रहा कि आखिर धारा 370 क्यों? धारा 370 ने देश को कभी न मिटने वाले जख्म दिए। वो जख्म जो दिन प्रतिदिन नासूर बनते जा रहे थे। शायद संविधान रचयिता भीम राव अंबेदकर को इन्हीं बातों का डर था। इसीलिए उन्होंने धारा 370 ड्राफ़्ट करने से इन्कार कर दिया था। उनकी आत्मा ने उन्हें झकझोरा होगा। तभी उन्हें यह धारा देश के साथ धोखा लगी थी। कश्मीर को 370 के तहत खास राज्य का दर्ज़ा देने में तात्कालीन सियासी मज़बूरियां कुछ भी रही हो, परंतु आम हिंदोस्तानी इसे एक भूल या गलती ही मानता है। इस चंद लम्हों की भूल या गलती की वजह से हमारे देश ने सात दशकों की सजा झेली है। 
परंतु आखिर 6 अगस्त, 2019 का सूरज देश व कश्मीर के लिए एक नई सुबह ले कर आया। भारत सरकार ने मोदी के नेतृत्व में संसद में एक ऐतिहासिक घोषणा की। साहस व राजनैतिक इच्छाशक्ति का उदाहरण पेश करते हुए सरकार ने कश्मीर को केंद्रशासित प्रदेश घोषित कर दिया। उधर लद्दाख को भी अलग केंद्रशासित प्रदेश बना दिया गया। घाटी में आतंकवाद की गुर्राहट के नीचे यह क्षेत्र हाशिए पर चला गया था और यहां की आवाम की आवाज़ दब कर रह गयी थी। 
कश्मीर और लद्दाख को केंद्रशासित प्रदेश बनाने की घोषणा सुनते ही हिंदोस्तान का आम नागरिक बाग बाग हो उठा। इस निर्णय का विरोध करने वाले राजनैतिक दलों की मालूम नहीं क्या सियासी मजबूरियां होगी, परंतु सच पूछो तो देश का हर आम नागरिक खुशी से झूम उठा। जहां कपिल सिब्बल, गुलाम नबी आज़ाद जैसे नेता इस निर्णय के विरोध में मुखर हुए, वहीं कांग्रेस के कई नेता भी इस निर्णय के पक्ष में उतर आए। शायद आत्मा की चुभन को महसूस किया होगा। वैसे देश में कई विपक्षी दल व नेता ऐसे हैं जिन्हें सिर्फ विरोध ही करना है। कुछ नेता तो इतने बुद्धिमान है कि भूसे के ढेर से भी सूई निकाल लेते हैं। खैर लोकतंत्र में उनके इस हुनर की दाद देना भी एक मज़बूरी है। ये बात भी किसी से छुपी नहीं कि कश्मीर के मुफ़्ती, अबदुल्ला व लोन जैसे कुछ नेता अलगाववासदियों व पत्थरबाजों से सहानुभूति रखते आए हैं।  भारत सरकार के इस फैसले से उनका सियासी खेल समाप्त हो गया। अतः उनका दर्द समझा जा सकता है। इधर ऐसे भी नेता हैं जो पाकिस्तान के सियासी आकाओं से भारत के प्रधानमंत्री मोदी को हटाने की गुहार भी लगा चुके हैं। उनसे उम्मीद ही क्या की जा सकती है। 
घर में बैठे पाक व आतंकियों के हिमायतियों के चलते कश्मीर में अमन की स्थापना निसंदेह मुश्किल हो रहा था। सरकार का ये फैसला गौरव, साहस व इच्छाशक्ति से भरा है। जैसे रोगी को बचाने के लिए डॉक्टर को पीड़ादायक ऑप्रेशन करना पड़ता है वैसे ही सरकार ने भी राष्ट्रहित में कश्मीर की सर्जरी की है। इस फैसले में जाहिर है कुछ लोग दोष निकालेंगे व निंदा करेंगे। परन्तु जिन्हें दोष ही निकालना है, वे तो प्यार व सम्मान से पिलाई गई चाय में भी दूध, चीनी व चायपत्ती का दोष निकाल ही लेते है।
परंतु कश्मीर को उसकी पुरानी आभा लौटाना सरकार का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए। घाटी में खोया अमन-ओ-चैन स्थापित करना चुनौतीपूर्ण होगा।  यदि सरकार इन उद्देश्यों में सफल नहीं होती, तो यह फैसला एक ऐतिहसिक भूल को दुरुस्त करने के लिए एक और ऐतिहसिक भूल साबित होगा। हर एक हिंदोस्तानी को आज उम्मीद है कि कश्मीर की फ़िज़ाओं में एक बार फिर केसर अमन की महक बिखेरेगी। हर हिंदोस्तानी उम्मीद लगाए है- फिर से गुल बनेगा, गुलशन बनेगा/ कश्मीर अमन का अब गुलफाम बनेगा।

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