तो बन्द करो ना परीक्षा का बेहूदा ड्रामा ... सचिन ठाकुर

ना,ना,ना प्रचंड गरमी और लू मेरे सर पर नहीं चडी है।ना मैंने पी है,,इस जन्म में तो चखी भी नहीं।
बस ऐसे ही ,दो महीने के भीतर बदलते समीकरणों को निहार रहा हूं।
मार्च में परीक्षाएं थी।क्या सख्ती,क्या कैमरे की तिरछी नजर,क्या धांसू सुप्रीटेंडेंट ,क्या खूंखार उड़नदस्तों का अमला।
अखबारों की करतनो में नकलचियों को पकड़ने का शोर, मामूली गलती होने पर भी प्रधानाचार्य समेत बाकी शिक्षकों के सस्पेंड होने का गला फाड़ भोंपू।हर पेपर की वीडियो रिकार्डिंग ना होने पर पूरे सेंटर को तम्बू समेत उखाड़ फेंकने की शिक्षा बोर्ड के अधिकारियों की हुंकार।
भई वाह!! मजा आ गया।
रिज़ल्ट भी आ लिया।कैमरे लगे थे ।जिनमें पहली बार लगे थे वो उनसे पार पाने के नुस्खे सीखने में लगे थे ,जिनमें पहले के लगे हुए थे ,वो पिछले साल सीखे नुस्खों को आजमा गए।किसी स्कूल में कम रिज़ल्ट का हाहाकार तो किसी स्कूल में कैमरे लगने के बावजूद शत प्रतिशत रिज़ल्ट देने के नगाड़े।किसी अध्यापक पर कम रिज़ल्ट के इंक्रीमेंट बन्द करने का सरकारी चाबुक तो किसी को स्थानांतरण का काला पानी।
अब दो महीने बाद फिर से परीक्षाएं चल रही। एस ओ एस के नाम से।भाई वाह।जो अमला मार्च में मुट्ठियां भींचे ,भृकुटियां ताने युद्धभूमि का योद्धा दिखता था ,वही आजकल ग्राम सेवक के अवतार में है।नकल दबा के हो रही।सुप्रीटेंडेंट जो मार्च में महर्षि दुर्वासा समान थे दो महीने बाद धृतराष्ट्र में परिवर्तित हो लिए हैं।कई गांधारी के चरित्र में डुबकी लगा लिए हैं।
देखना ,दो महीने पहले जो एक दो अंक लिए फेल हुए थे ,दो महीने बाद 90-95 अंक ले के अध्यापकों को गाली देते हुए अपने असाधारण होने का लोहा पीटते नजर आएंगे।
जो बेचारे यहां भी कुछ नहीं कर पाए वो निराश ना हों।अभी शिक्षा का असल जनांजा निकालने वाली एन आई ओ एस की महा भ्रष्ट परीक्षाएं है ना।
बस परीक्षा केंद्र के लिए चड़ती तैयार रखिए।हर पेपर का दाम है।चुका दिया तो फिर पेपर किसी और से ही दिला लीजिए।पेपर आपके होटल के कमरे में ही आ जाएगा।
कुछ भी चड़ति चडा डालिए।मुद्रा,सोम रस,कोई मंहगा उपहार  या फिर गरीब लाचार महिला हो तोआपका शरीर भी चलेगा।
बस उफ्फ मत कीजियेगा।शरीर,चेतना,चरित्र और आत्मा , सब पर कागज का एक टुकड़ा ,जिसपे आपके हासिल किए अंक लिखे हैं,भारी है।
साहब,
बन्द करिए ना ये परीक्षाओं का ड्रामा।जब 11 महीने मुज्जरा  हो रहा तो नजराना मार्च  महीने का ही क्यूं ?
बेडा तो गरक पहले ही हो लिया है आपकी आठवीं तक फेल ना करने की अनोखी जिद से। नविं में मुख्याध्यापक फेल नहीं करने देते।तो दसवीं में अध्यापक का ,छात्र का, माता पिता का ,यहां तक कि सारे समाज का भोंपू काहे ब्जवा रहे।
वैसे भी सरकारी स्कूल के सुदामायों और निजी स्कूल के अंबनियों को काहे एक ही रेस में उतारते हो।जिनके परिवेश में ही सात समन्दर गहरा भेद है उनको एक ही आरम्भिक बिंदु पर पटकने में किसका भला है।
ओ साहब,
मेरी बात सुन लो ना।बन्द करो ना ये ड्रामा।कुछ और करते हैं। बच्चों को कुछ और सिखाते हैं।ऐसा कुछ जो उनको पैरो पर खड़ा होने की वज़ह और जरूरत दोनों समझाए।अग्नि परीक्षा रावन की लंका में रही  सीता ही क्यूं दे।राजा राम भी तो जंगल में अकेले भटके थे।
वो बात है ना साहब ,के व्यवस्था बुरी है अगर ये मन को कचोटती है।व्यवस्था अपराधी है अगर वो बुद्धि पर डाका डालती है और व्यवस्था घृणित है अगर ये चरित्र पर चोट करती है।
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता भौतिक विज्ञान,
राजकीय आदर्श वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला ,सरकाघाट ,मंडी
हिमाचल प्रदेश की फेसबुक वाल से साभार।

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