एक जैसा परिधान यानि ड्रेस कोड -- सचिन ठाकुर

कई लोग अपने कपड़ों से पहचाने जाते हैं। जैसे पुलिस, वर्दी में होते हैं तो आम जनता इनके पास संरक्षण, शिकायत या मदद के लिए जा सकती है। (मिलगी कितनी भले ही ये सोचनीय है) वर्दी पर अपराधी हमला नही कर सकते। सेना, इनके लिए वर्दी सुरक्षा व सुविधा है। दमकल कर्मी अग्नि व ऊष्मा से बचाव के लिए उपयोगी कपड़े पहनते हैं। पोस्टमैन अपने कपड़ों से पहचाना जाता है। 
     इस तरह के पेशों में संगठन , अनुशासन और एकरूपता की कदाचित जरूरत है। इन कामों के प्रकृति में स्वयतत्ता के लिए जगह ही नही है। 
        स्कूल जैसी किसी चीज का ताल्लुक बच्चों और शिक्षकों से होता है। यहाँ बात दर्शन, स्वतंत्र चिंतन, स्वायत्तता औऱ सृजनात्मकता की होती है। शिक्षक बच्चों के मस्तिष्कों को एक जैसे सांचे में ढालने के लिए नहीं बल्कि इन साँचों को तोड़ने के लिए होते हैं। शिक्षक स्वयं उन साँचों में नहीं आ सकते। यहां जरूरत स्वतंत्र चिंतन की होती है । अब एक से कपड़े पहनने से ये कैसे प्रभावित हो जाएगी? सवाल स्वाभाविक और जायज है। हिंदी और फीजिक्स का टीचर एक से रंग और बनावट के कपड़े पहने तो उनके शिक्षण में क्या अंतर आ जायेगा? तो भाई जब कपड़ों से कोई अंतर नही आता तो काहे ड्रेस पहनाने पर तुले हो? विविध रूप, रंग, बनावट, पहनावे को विद्यालय ही नही पचा सकेंगे तो समाज कैसे स्वीकार करेगा? सारे शिक्षक सिकन्दर के एक जैसे सिपाहियों की फौज है क्या, दाएँ मुड़ेगा दायें मुड़ कहा , मुड़ गए, बैठ जा, उठ जा, ..... सा विद्या या विमुक्तये।  विद्या जकड़ती नहीं जकड़ने तोड़ती है। उसे इस लायक बनाना और बनाये रखना सरकार का काम है। शिक्षा में बदलाव के लिए कुछ भी नया करते जाना सुधार नहीं होता। बदहाल शिक्षा के लिए कुछ करते हुए दिखना  एक ढोंग है। स्कूलों को भवन, पुस्तकालय, पुस्तकें, लैब, लैब उपकरण और शिक्षक चाहिए ड्रेस नहीं। रविन्द्र नाथ ठाकुर ने एक स्कूल की नौकरी इसलिए स्वीकार नही की कि वहाँ ड्रेस पहननी थी। आजाद खयालातों के दम घोटू माहौल में स्कूल नहीं चलते। 
        ड्रेस समर्थक ये भी तर्क लाते हैं कि बच्चों के लिये क्यों ड्रेस तय करते हो? सवाल ये है कि किस शिक्षाविद ने कहा कि बच्चों की ड्रेस तय करो। दुनियां के तमाम सफल स्कूलों में से किसमें ड्रेस थी? तोतोचान के टोमोये में तो बाकायदा कहा जाता था कि बच्चों को नए कपड़े पहनाकर मत भेजिए ताकि वे कपड़ों की चिंता किये बिना आजादी से अपने काम कर सकें। भारत के तमाम शिक्षाविदों ने अपने सफल स्कूल बिना ड्रेस के चलाये हैं। यही स्कूलों की स्वायत्तता है। बोलने, पहनने, खाने, सोचने पर पहरे लगाने वाले कौन हो सकते हैं, सोचनीय है। 
      बच्चों की ड्रेस के पक्ष में एक और तर्क जीभ की नोक पर विराजमान रहता है। अमीर और गरीब एक जैसे कपड़े पहन के आएगे तो गरीब कुंठित नही होगा। अब्बल तो इन दोनों वर्गो के स्कूल एक हैं ही नहीं। हैं भी तो अमीरी गरीबी को जबरन एक जैसे कपड़े पहना कर ढकने के बजाय इस असमानता को मिटाने की जरूरत है। यह भी एक तर्क है कि एक जैसे पहनावे से भेदभाव नहीं होगा। इसके लिए जाति और धर्म के कठोर विभाजन को खत्म करना होगा। सांस्कृतिक पहचान की इस विविधता को स्वीकारना ओर सम्मान करना स्कूलों में सिखाना होगा।
          खैर, बात शिक्षकों को एक जैसे खोल में डालने की हो रही है। माध्यमिक शिक्षा आयोग की एक टिप्पणी है- 'कोई भी समाज अपने शिक्षकों से बेहतर नही हो सकता।' शिक्षक एक प्रबुद्घ वर्ग होता है उसे जितना दयनीय बनाओगे समाज उतना ही अवनति की ओर जाएगा। स्वायत्तता दो, सम्मान दो, सुविधा दो, जिम्मेदारी दो। एक देश, एक संस्क्रति, एक धर्म , एक भाषा, एक टेक्स के आगे सबको एक जैसी शिक्षा और स्वास्थ्य भी तो बोलो।
         पहनना, खाना, सोचना, बोलना , आदमी की निजता है। आदम समाज की बोल व सोच पर काम करने वालों को भी जकड़ना किन इरादों की अभिव्यक्ति है , इसे   समझना होगा।
       शिक्षक संगठनों ने विरोध को कुछ मांगों की शर्त के साथ जोड़कर एक किस्म से ड्रेस को कुबूल कर लिया है। शिक्षक दिवस तक सरकार एकाध मांगे मान ले तो शिक्षक स्वायत्तता घेंघे के सींग की तरह ड्रेस के खोल में छुप जाएगी। ड्रेस के पक्षधर इससे पहले कुछ सवालों के जवाब जरूर ढूंढें, दुनियां में कहाँ-कहाँ शिक्षक ड्रेस पहनते हैं? किन शिक्षाविदों ने इसकी सिफारिश की है? इससे क्या लाभ हुए हैं? हिमाचल के शिक्षक ड्रेस पहनेंगे तो इससे शिक्षा में किस प्रकार सुधार होंगे? 
      कसम वर्दी की सवाल ही समाज को आगे ले जाते हैं। शिक्षक पूछेंगे तो बच्चे भी पूछना सीखेंगे।
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता भौतिक शास्त्र ,
राजकीय आदर्श विद्यालय सरकाघाट 
ज़िला मंडी हिमाचल प्रदेश 

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