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कविता हारी नहीं हूँ मैं --- संजना

बेशक हार हुई है मेरी,
पर अभी हारी नहीं हूँ मैं।
मुझको लाचार न समझो तुम,
बेचारी नहीं हूँ मैं।
रूकी हूँ, गिरी हूँ, 
जमीन पर पड़ी हूँ पर,
फिर उठूँगी ,बढूँगी ,
फलक तक चढूँगी।
उठना ,ढलना आदत है मेरी ,
मैं सूरज की तरह हूँ।
टूट के पल मे खो जाऊँ ,
वो तारा नहीं हूँ मैं।
बस एक ही सपना है मेरा, 
देश मे ऊँचा उठना है।
बस एक ही खाब है मेरा , 
एक बार जीत के दिखाउँगी।
बस हार ही हुई है मेरी ,
अभी हारी नहीं हूँ मैं।

संजना
 नौवीं कक्षा की छात्रा 
गवर्नमेंट हाई स्कूल ठाकुरद्वारा 
ब्लॉक कांगड़ा

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