इंसाफ -- राजेश सारस्वत

इन्साफ 

बाद दोपहर उसको बताया गया कि घर में उसके पिता की हालत ठीक नहीं है। ये खबर भी कॉलेज के प्राचार्य ने उसको दी। अब उसका मन किताबों में नहीं लग रहा था आखिर घर को चलाने वाले पिता अब बिमारी के चंगुल में फंस गए थे। जैसे-कैसे भी बबली ने कॉलेज में दिन का समय निकाल लिया, परेशान हो कर अपने कमरे की ओर निकल गई। हॉस्टल में सभी लड़कियों के साथ बबली का बर्ताव बहुत अच्छा था। वह साधारण पहनावे में और कम लीपापोथी करने वाली लड़की थी जिसमें वह दिखने में बहुत ही सुन्दर लगती थी। कॉलेज के शुरुआत के दिनों में कुछ लड़को ने उसको थोड़ा परेशान भी किया लेकिन धीरे-धीरे उसके सहज स्वभाव और व्यवहार को देखकर सभी लड़कों के दिलों में बबली के प्रति सम्मान की भावना जागृत हो गई। समाजसेवा में बबली हमेशा अपना हाथ बंटाती थी। पढ़ाई में अव्वल रहने वाली बबली को आज हॉस्टल में परेशान देखकर सभी लड़कियाँ भी दुखी मन वाली हो गई। अब बबली को सुबह घर जाना था जिसके लिए प्रधानाचार्य ने उसकी छुट्टी भी स्वीकार कर ली थी। शाम को हमेशा की तरह सभी लड़कियाँ बबली के साथ खाना खाने निकली लेकिन कुछ परेशानी की वजह से भरपेट खाना न खाने की वजह से बबली बाकी लड़कियों से पहले ही उठकर अपने कमरे को निकल गई। दरवाजा बंद करके बबली अपने बिस्तर पर लेट गई। आज हॉस्टल में ऎसा लग रहा था मानो कोई मातम छाया हो। सब अपने-अपने कमरे में चले गए। सुबह जल्दी उठकर बबली को 7 बजे वाली बस में सफर करके अगले स्टेशन में जाना था जहाँ से बबली को 3 घंटे का सफ़र पैदल करना पड़ता था। सरकार और वहाँ के लोगों की नाकामी की वजह से आज भी वह गाँव सम्पर्कमार्ग से कटा हुआ था जिसका खामियाजा बबली जैसी होनहार बिटिया को भुगतना पड़ रहा था। थकी हारी परेशान मन वाली बबली समय रहते अपने स्टेशन पर पहुँच गई। और बिना कुछ खाए अपने रस्ते चलने लगी।  बबली तीन घंटे के पैदल सफ़र में चल रही थी न जाने वो कौन सी काली बेला उसकी जिंदगी में आ गई कि उस शाम बबली अपने घर न पहुँच सकी। घर में उसके बिमार पिता और उसकी माँ उसका रास्ता निहारते थक गए। उसके पिता ने अपने गाँव के सभी लोगों को कहा कि आज बबली ने घर आना था जो सुबह अपने कॉलेज से घर आ गई है लेकिन अभी तक घर नहीं पहुँची। किसी राहगीर ने भी खबर दे दी कि बिटिया समय पर बस से उतर कर अपने गाँव के रास्ते पर पैदल चल रही थी, तब गाँव के सभी लोग उस रात रास्ते पर बबली को आवाज़ देते और इधर - उधर  ढूंढने लगे लेकिन बबली न जाने कहाँ निकल गई। घर में भी माहोल बदल गया, अब न जाने बिटिया कहाँ चली गई। पिता रोते बिलखिलाते खुद को दोष देते आखिर बिटिया को कॉलेज से घर आने को क्यों कह दिया। दूसरी सुबह स्थानीय पुलिस को भी खबर दे दी गई और स्थानीय लोगों के साथ पुलिस भी बबली को ढूंढने लग गई। एक सुनसान सी जगह पर बबली के कपड़े एक गाँव के चचेरे भाई को नज़र आए और वह झट से चिल्लाया कि यहाँ पर कोई है उसको कपड़े दिखाई दे रहे हैं। जब सभी उस जगह पर गए तो बबली वहाँ पर दरिंदगी का शिकार हो  मृत पड़ी हुई थी जिसके साथ ऐसी हैवानियत हुई थी कि मंज़र को देखकर हर आदमी अचंभित हो गया। वो थी काली रात जिसने बबली और उसके माता पिता की जिन्दगी पर अपना ऐसा कहर बरपाया कि अब संभलने की हिम्मत न थी। हैवनियत के पुजारी जिन्होनें इस घटना को अंजाम दिया को ढूंढने पुलिस प्रशासन और सरकार ने जिम्मेदारी ली लेकिन हाथ कुछ भी न लगा। धीरे - धीरे उस बिटिया के साथ हुई दरिंदगी को पुलिस और सरकार भूल गई और बिटिया की रूह आज तक न्याय के इंतजार में भटक रही है। आखिर कब तक इंतजार किया जाए। इंतजार में माँ बाप की आँखे आँखे इतनी कमजोर हो गयी कि आखिर में बंद हो गई। एक पूरा परिवार इस हैवनियत की वजह से मिट गया और आज भी बिटिया इन्साफ के लिए तड़फ़ रही है। इस पर सतीश शर्मा ने बहुत मार्मिक लिखी है कि-:

कुछ  लोगों में आज भी  वहशत जारी है,
कहां जाए शहर में अब हवस के पुजारी है।।

तू अपनी कोख़ में समा ले सीता की तरह,
यहां हर मोड़ पर हर शख़्स बलात्कारी है।।

प्रतिबंध है सोच पर,चाल पर, आवाज़ पर,
कितने ख़ौफ में जी रही आज भी नारी है।।

है वजूद मुझसे तेरा,ख़ुद पे यूं नाजिश न कर,
गर मैं ही न होऊं तो क्या औकात तुम्हारी है??

*सतीश शर्मा*                                                            

                       राजेश सारस्वत

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