सूरत-ए-हाल । सूरत गुजरात आगजनी पर विशेष लेख । ---- राजेन्द्र पालमपुरी

हाल ही में घटी गुजरात के सूरत में आगजनी की घटना ने समूचे हिंदुस्तान को हिलाकर रख दिया है |  लेकिन ऐसे में हुए असमय हादसों पर दो चार दिनों तक एक दूजे पर छींटाकशी करने के बाद और बहस-ओ-मुबाहिसे होने पर हम चुपचाप आने वाले अगले हादसों का इंतजार करते हैं और फिर वही ढाक के तीन पात | 

रेडियो , टी०वी० पर भी यही और ऐसे ही लाईव शो सुने और देखते हैं हम सब | हमारा जमीर कितना और कब का मर चुका है यह हम सब जानते हैं कि जब लोगों की जान पर बनी होती है हम अपने कैमरों में उन घटनाओं को कैद करते देखे जाते हैं जिन पर हमें तुरंत कार्यवाही करने की जरूरत रहती है | जबकि अपने मोबाईल कैमरे हम तब तक नहीं छोड़ते जब तक दूसरे आदमी या जानवर की जान निकल तक नहीं जाती | धिक्कार है हम पर | सूरत में हुई तक्षशिला शिक्षा संस्थान की इस घटना ने भारत के उन युवा बच्चों को खोया है जिनपर अभिभावकों ने जाने कितनी उम्मीदें लगा रखी थीं या कितने ख्बाव सजा रखे थे उनके भविष्य को लेकर |

माना जा सकता है कि हम भारतीय अपने होनहार बच्चों के भविष्य को लेकर जागरूक होने के साथ ही चिंतित भी रहते हैं और आखिर हों भी क्यों न बह सब हमारे सपने जो होते हैं | यह हमारे बह सपने होते हैं जिन्हें हम अपने जीवन में तो पूरा नहीं कर पाते लेकिन उन्हीं खाबों को हम अपनी संतानों से पूरा करवाने के लिये एड़ी चोटी का जोर लगा देते हैं |

सूरत गुजरात के तक्षशिला कोचिंग केंद्र में अनेकों बच्चे अपनी शिक्षण कोचिंग क्लासेज लेने नियमित तौर पर जाते हैं | कक्षा कक्ष में पढ़ाई के साथ साथ हंसी ठिठोली , बहस तकरार और प्यार मुहब्बत की जो जो बातें और किस्से वहां परवान चढ़ते हैं उन सबसे हम सभी वाकिफ हैं | कहने की जरूरत नहीं समझता कि जो कुछ होता है बह हम सभी कर चुके हैं | लेकिन पढ़ाई करते हुए या फिर कहीं और कुछ सीखते समझते हुए हमने कभी यह भी सोचा कि अचानक हुए ऐसे हादसों में हम कितने और कैसे सुरक्षित हो या रह सकते हैं | क्या हमने अपने या अपने बच्चों के लिये बह प्रशिक्षण भी दिये या दिलवाए हैं या उन्हें दिलवाने की आवश्यक्ता भर समझी है जिन्हें सीखकर बह आत्म रक्षा कर सकें | नहीं शायद यह हमने कभी सोचने की जहमत ही नहीं उठाई | हम सबने तो बस अपने बच्चों को बड़ी से बड़ी और ऊंची से ऊंची शिक्षा दिलवानी है | चाहे फिर बाद में बह दुनियां में भौंदू बने हुए बेरोजगारी की ही राह में भटकते क्यों न फिरें |

खेद और ग्लानि के साथ कहना पड़ता है कि हमने अपने बच्चों को आत्म रक्षा , आत्म संयम और आत्म विश्वास जैसे गुणों और कौशलों को कभी सिखाया ही नहीं | मुझे बहुत अच्छे से याद  है , आज से बस चार पांच साल पहले घटी बह घटना जिसमें हैदराबाद के ईंजीनियरिंग कालेज के बच्चे हिमाचल प्रदेश में तफरीह या घूमने फिरने के इरादे से आए थे | लेकिन बह 24 छात्र छात्राएं अपनी ही गलती की बजह से हिमाचल प्रदेश के मंडी जिला के लारजी प्रोजैक्ट के पास ही अपनी तस्वीरें और मौज मस्ती करते हुए पानी के तेज बहाव में देखते ही देखते चीख-ओ-पुकार करते बह गए थे | जबकि अगर उनमें से कुछेक भी तैरना जानते तो शायद कुछ बच्चों को बचाया जा सकता था |

मैंने उस वक्त खुद उस जगह जाकर उन बच्चों के अभिभावकों का दिल को चीर देने वाला क्रंदन और विलाप देखा है | आम आदमी का कलेजा भी मुंह को आता है बह दहाड़े मारते हुए मां बाप का रोना - धोना सुन देखकर |

और ठीक ऐसा ही सब देखने को मिला है सूरत की आगजनी में | तक्षशिला का बह वीडियो जो सोशयल मीडिया और देश के तमाम अखबारों की सुर्खियां बना है दिल दहला दहला देने को काफी है | आग लगने के बाद संस्थान से बच्चों ने बगैर कुछ सोचे समझे और अफरा तफरी में दूसरी मंजिल से छलांगें लगाते हुए जान बचाने की हालत में जो कौशिशें कीं बह सारे हिंदुस्तान ने देखी हैं | यह झुठलाया नहीं जा सकता कि हमारे बच्चों में आत्म संयम , आत्म विश्वास और आत्म रक्षा जैसे कौशलों और गुणों की कहीं न कहीं कमी तो अवश्य रही ही है |

जहां तक शिक्षण कोचिंग सैंटर के प्रबंधन और प्रशासन की बात की जाए तो स्पष्ट होता है कि ऐसे में हम सभी दोषी हैं | दूसरी या तीसरी मंजिल पर संस्था चलती है तो वहां पुख्ता सुरक्षा प्रबंधों का होना भी निश्चित तौर पर जरूरी समझा जाना चाहिये | समय पर अग्नि शमन सेवा , विशेष सुरक्षा दल और स्वंय सेवी संगठन भी ऐसे असमय हादसों पर अपनी सेवाएं देते हैं | बच्चों द्वारा अचानक नीचे जमीन की तरफ बिना कुछ सोचे समझे छलांगे लगाकर अपना जीवन गंवा देना कहां की बुद्धिमता है | यह दृष्य सचमुच ह्रदय विदारक होने के साथ ही दिल दहला देने वाले हैं |

यहां यह भी साफ तौर पर कहूंगा कि हमने बच्चों को शिक्षित तो करना ही है लेकिन उन्हें बह सब कौशल सिखाने का प्रयास भी करना होगा जिनसे बह अपनी रक्षा - सुरक्षा करने में सक्षम हो सकें | कुछ बरस पहले विदेश से मेरे बेटे द्वारा जब मुझे अपनी पोतियों की तस्वीरें जिनमें बह सिर्फ 3 और 8 साल की उम्र में घुड़सवारी और तैराकी करते हुए मिलीं तो मैं अचानक परेशान हो गया और हड़बड़ाकर फोन पर अपनी विदेशी बहु और बेटे पर दिल खोलकर गुस्सा हुआ | लेकिन जब मैं स्वंय विदेश गया और वहां देखा तो मैं अपने से खिन्न हुआ क्योंकि वहां बचपन से ही लगभग सभी बच्चों को ऐसी सभी साहसिक और रोमांचित करती खेलों का प्रशिक्षण दिया जाता है जिससे उनमें बचपन से ही आत्म संयम , आत्म रक्षा और आत्म विश्वास जैसे गुणों और कौशलों का पूर्ण रूप से विकास हो सके |

यहां यह कहना भी जरूरी हो जाता है कि हमारे अग्निशमन विभाग और प्रशासन के पास भी तो सभी जीवन रक्षा कवच यानि उपकरणों का ऐसे हादसों के वक्त आमजनमानस को उपलब्ध करवाना भी तो निहायत जरूरी होता है | जबकि कहा जा रहा है कि हादसे के समय आवश्यक्तानुसार घटना स्थल पर 20/25 फिट लंबी सीढ़ी तक नसीब नहीं हुई हादसे में हताहत हुए उन बदनसीब बच्चों को जो इस दुर्घटना के शिकार हुए हैं | जरा सोचिये समय पर यदि ऐसा कोई भी साधन होता जिससे बच्चों को फौरी तौर पर सहायता मिलती तो क्या आज पूरा भारत इस हादसे पर घड़ियाली आंसू बहा रहा होता ?

हमें ऐसे सभी हादसों से सीख लेने की जरूरत रहती है न कि टी०वी० पर लॉईव और लंबी चौड़ी बहसें करवाने की | मैं व्यक्तिगत रूप से यह भी कहना चाहूंगा कि हमें अपनी पाठशालाओं में भी आत्म रक्षा , आत्म विश्वास और आत्म संयम जैसे कौशलों को विकसित करने के लिये विशेष पाठयक्रम की आवश्यक्ता है | जिसे शीघ्र देश भर के स्कूलों में आरंभ किया जाना चाहिये ताकि अच्छी और बेहतर शिक्षा के साथ साथ हम अपने बच्चों में बह सभी कौशल और गुण पैदा कर सकें जिनसे हमारे , हम सबके बच्चे किसी भी आपात स्थिति में खुद को ढाल सकें और अपने और दूसरों के जीवन को बचाने में भी सक्षम हो सकें - जय हिन्द - जय भारत  |

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