शिक्षक होना आसान नहीं --- राजेश सारस्वत

शिक्षक होना आसान नहीं है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम और अविभावकों ने शिक्षा और शिक्षक की हालत खराब कर दी है। एक तरफ़ अपने पारिवारिक जीवन के हर पहलू को सुलझाता हुआ शिक्षक दूसरी तरफ अपने राष्ट्र निर्माण के कर्तव्यों को पूरा करने में इतना उलझ गया है कि रातों की नींद और दिन का चैन मानो छिन्न सा गया हो। आज एक तरफ निजी विद्यालय की ओर जाते हुए बच्चों के बढ़ते रुझान का सामना और बच्चों के अंक प्रतिशत को 90% से पार करने के प्रयास में शिक्षक के चहरे पर झुर्रियां बना दी है। इसी मध्य विद्यार्थियों को मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं से परिचित करवाना पीछे छूट रहा है। अगर छात्र द्वारा की गई गलती पर उसको टोका जाए अथवा दण्डित किया जाए तो मानो अपने पैरों पर स्वयं कुल्हाड़ी मार दी गई है। पिछले दिनों सोशल मीडिया में एक शिक्षक के खिलाफ हो रही अविभावकों की नारेबाजी को देखकर यह साफ़ साफ़ झलक रहा था कि आज अविभावक बच्चों को बिना किसी रुकावट के एक अच्छा इन्सान और पढ़ाई में अवल छात्र बनाने के लिए शिक्षक से ऐसी उम्मीद कर रहे हैं कि अध्यापक कोई घोल बनाए और बच्चों को पिलाएं जिससे आज के छात्रों का सर्वांगीण विकास हो सके। आचार्य चाणक्य ने पुत्र और शिष्य के प्रति अपना रवैया एक मित्र जैसा होने के साथ गलती पर ताड़ने वाला कहा है।

लालनात् बहवो दोषाःताडनात् बहवो गुणाः 
तस्मात् पुत्रं च शिष्यं च ताडयेत् न तु लालयेत् ।।
लालन और अधिक प्रेम से शिष्य और पुत्र में अवगुण उत्पन्न हो जाते हैं और ताड़ने पर गुण। परंतु आज की स्थिति कुछ विपरीत हो गई है जिसमें एक शिक्षक अपनी व्यथा दूसरे शिक्षक के साथ ही सांझा कर सकता है। अध्यापक का पहल काम और पहली इच्छा बच्चों को एक बेहतर इन्सान बनाने की होती है। फिर वह चाहता है कि उनका छात्र अच्छे नम्बरों के साथ परीक्षा में अवल रहे और अभिभावक के साथ शिक्षक और विद्यालय का नाम भी रौशन करें । उदण्डित छात्रों को सही राह पर लाने के लिए अध्यापक को कई तरकीबें अपनानी पड़ती है जिसमें ज्यादातर आज अपराध की सूची में शामिल किया गया है। कुछ कमजोर छात्र जिनका ध्यान पढ़ाई के विपरीत अन्य गतिविधियों में ज्यादा रहता है उनको प्रेरणादायक विषयों से अवगत करवाने के साथ साम दाम दंड भेद की नीति अपनाकर बेहतर इन्सान बनाने की चाह रखने वाले शिक्षकों की अब खेर नहीं है। अब अधिनियम और अविभावक बेरोक टोक अध्यापक को भानुमति का  पिटारा समझकर शिक्षक से छात्र का सर्वांगीण विकास, 99 प्रतिशत अंक और मानवीय मूल्यों से युक्त चाहते है जो बिना अभिभावकों की सहायता से कदापि संभव नहीं हो सकता है।

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