तोते नहीं इन्हें बहुआयामी इंसान बनाओ -- जगदीश बाली

हाल ही में हिप्र शिक्षा बोर्ड व सीबीएसई के परीक्षा परिणाम आए हैं। मैरिट सूची में आए छात्रों के अंकों को देख कर ऐसा लगा जैसे छात्रों के अंक नहीं बल्कि किसी आदमी के बुखार को थर्मामीटर पर देख रहा हूं या तेंदुलकर, कोहली जैसे शतकवीरों के शतकों के आंकड़े टीवी स्क्रीन पर देख रहा हूं। हिप्र शिक्षा बोर्ड का बुखार सीबीएसई से मामूली सा कम चल रहा है। हर छात्र को अंकों के आधार पर मापने से छात्र की बहुआयामी प्रतिभा दब कर रह रही है और वह एक तोता बन रहा है जिसे 'राम राम' करना सिखा दिया है। छात्र एक ही रंग के तोते बन रहे हैं। वे 'राम राम' बोलते हैं और उन्हें नहीं मालूम कि राम को भगवान भी कहते हैं। जितना बढिया वो राम, राम बोलेगा मालिक उतना ही खुश होगा। बात अब यहां तक पहुंच गई है कि छात्र भाषा व साहित्य के विषयों में भी शत प्रतिशत अंक प्राप्त कर रहे हैं। अंग्रेज़ी, संस्कृत, हिंदी व समाज शास्त्र गणितीय विषय नहीं हैं, परन्तु इनमें शत-प्रतिशत अंक आना कई सवाल करता है। ये सवाल प्रश्नपत्र सैटिंग से ले कर मूल्यांकन तक की प्रणाली पर प्रशन्चिंह लगाते हैं। एक वो हमारा ज़माना था जब 75-80 प्रतिशत अंक ले कर मैरिट के पहले सौ में शुमार हो जाते थे। इससे कम आने पर भी मसती होती थी। एक आज का ज़माना है कि 75-80 प्रतिशत वाले की तो बात ही नहीं होती। इससे नीचे वालों की तो जैसे कोई हस्ती ही नहीं होती। 90-95 प्रतिशत वाले भी बुझे से रहते हैं क्योंकि वे इस दबाव में रहते हैं कि क्या किसी श्रेष्ठ संस्थान में दाखिला मिल पाएगा कि नहीं। उत्तर पुस्तिकाओं का मूलयांकन करने वाले अध्यापक भी वास्तव में कमाल कर जाते हैं जिन्हें अंग्रेज़ी, समाज शास्त्र, हिंदी व संस्कृत जैसे मानविकि विषयों में भी छात्रों के अंक काटने का मौका नहीं मिला। ये शतकवीर छात्र बधाई के पात्र हैं क्योंकि वे तो वैसा कर रहे हैं जैसी व्यवस्था उनके लिए बनी है। वो वैसा बन रहे हैं जैसे सांचे व ढांचे में उन्हें रखा जा रहा है। दांचा और सांचा उन्हें बढिया किस्म के तोते बना रहा है। अपने 20 वर्षीय अध्यापन का अनुभव बताता है कि अंग्रेज़ी जैसे विषयों में 90 से अधिक अंक लेने वाले छात्रों को भी इस विषय का आधारभूत ज्ञान नहीं है। बच्चों को अंकों की जो घुट्टी पिलाई जा रही है उससे वह हर विषय में शत प्रतिशत अंक लेना चाहता है। वह एक अंक कट जाने का अफ़सोस करता है। माता-पिता भी अपने बच्चों पर अंकों का दबाव बनाए रखते हैं क्योंकि अच्छे संस्थान में दाखिले के लिए अंक चाहिए। बातें सर्वांगींण विकास की होती हैं, परंतु आंख, कान, मन सब अंकों पर ही टिके रहते हैं। उंचे शिक्षण संस्थानों में दाखिला अंकों के अनुसार हो रहा है। उदाहरण एडिसन, आइन्सटीन, स्टीव जॉब्स व रौवलिंग जैसे लोगों के दिए जाते हैं, परंतु प्रीत अंकों से ही बनी है। अंक लेना बहुत बढिया बात है, पर अंकों का अत्यधिक दबाव होने से छात्र 'तोता राम' बन कर रह गए हैं जो छात्र के मानसिक विकास व व्यक्तित्व के लिए उचित नहीं। सनद रहे कि 2009 में भारत के दो राज्यों तमिलनाडू व हिमाचल प्रदेश ने पिसा के शैक्षणिक सर्वे में हिस्सा लिया था जिसमें 74 देशों में भारत 72वे स्थान पर रहा। सर्वे में अंक पर केंद्रित एकआयामी शिक्षा, गैर हुनरबंद अध्यापन व सामाजिक वातावरण जैसे पहलुओं को मुख्य कारण माना गया था। हैरतंगेज़ है कि उसके बाद भारत ने पिसा में हिस्सा लेने से इंकार कर दिया था। परंतु ऐसा करने से हमारी शिक्षा की गुणवत्ता को छुपाया नहीं जा सकता। खतरे को देख कर आंख बंद कर लेने से खतरा कम नहीं होता बल्कि बढ़ जाता है।  
 इस 'येन केन प्रकारेण' अंक प्राप्त करने वाली दौड़ में समाज भी अपना हिस्सा बाकायदा निभा रहा है। नाते-रिश्ते वालों के तो क्या कहने। उन्हें अपने भतीज़े, भांजों व अन्य नाते रिश्ते में परिणामों की चिंता रहती है। परिणाम आते ही उनकी कुदृष्टि अंकों पर ज़रूर पड़ती है। अंकों का विश्लेषण करने में वे बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। कम अंक वाले छात्र बड़ी मुश्किल से इस समय को गुज़ारते हैं। अच्छे शिक्षण संस्थान के अलावा, मा-बाप इसे समाज में अपनी नाक का विषय भी बना लेते हैं। उधर हर अध्यापक चाहता है कि उसका छात्र अच्छे अंक लें और ऐसा प्रयास उसे करना भी चाहिए। परंतु कई अध्यापकों के लिए भी अंक प्रतिष्ठा व विश्वस्नीयता का सवाल होता है। अत: वे छात्रों को बढ़िया तोता बनाने का पूरा प्रयास करते हैं। परीक्षा भवनों में भी मौका पाते ही ये गुरु गोविंद अपना हुनर दिखाते हैं। कैमरे जाए तेल बेचने। अपने विषय में डिस्टिंकशन आने पर उन्हें भी अपनी अंक तालिका कई जगह घुमाने का मिल जाता है। क्यों न घुमाए, सरकार को भी आंकड़ा देना है। जी नहीं! मेरा मतलब ये नहीं कि बेहतर अंक आना खराब बात है, पर ज़्यादा महत्वपूर्ण यह है कि अंक कैसे-कैसे करके आए हैं। अंकों की इस भागम भाग में हमारी वो खेल प्रतिभाएं कहीं दब कर रह जाती हैं, जो सत्र भर टूर्नामैंटों में ट्रॉफ़ियां जीत कर स्कूल का नाम रौशन करते हैं। उनके लिए सिर्फ़ कुछ पलों की तालियों के सिवाय कोई अंक नहीं। कहीं कोई गायक, कोई धावक, कोई नर्तक, कोई संगीतज्ञ, कोई लेखक अपने हुनर को आवाज नहीं दे पाता क्योंकि उसके अंक अंकतालिका में कहां आते हैं और जो अंक तालिका में नहीं आते वो फ़िर कहां आ पाते हैं। मालूम नहीं ऐसे कितने हुनरमंद सितारे अंकों के पर्दे के पीछे छुप जाते हैं और चांद की चमक का माद्दा रखने वाले टूटे हुए सितारे बन जाते हैं। निसंदेह मेहनत कर सबके बेहतर अंक आने चाहिए, पर हमें बहुआयामी शिक्षा चाहिए। केवल अंक वाले 'राम राम' करते तोते नहीं, बल्कि ज़िंदगी से लोहा लेने वाले विधाओं के धनी इंसान चाहिए।

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