आज देश की शिक्षा प्रणाली में व्यापक बदलाव की जरूरत है। -- राजेश वर्मा

आखिर कब तक हमारी शिक्षा प्रणाली पास-फेल  का ही पैमाना बनकर रहेगी 

शिक्षा एक सभ्य समाज का निर्माण ही नहीं करती है बल्कि उसे दिशा भी देती है। किसी भी देश की उन्नति के लिए वहां की शिक्षा प्रणाली एक अभिन्न अंग है, यह व्यक्ति विशेष को समाज से जोड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है तथा सामाजिक संस्कृति व सभ्यता की निरंतरता को बनाए रखती है। 
आज हमारा देश विश्व गुरु बनने के सपने तो देखता है लेकिन किसी भी सपने को मूर्त रूप देने के लिए जरूरी होता है समाज का शिक्षित होना। भले ही आजादी के बाद देश ने विकास के नए आयाम लिखे। बहुत सी चीजों में परिवर्तन भी हुआ लेकिन जिस चीज़ में यह परिवर्तन होना बेहद जरूरी था वह शायद आजदिन तक उस रंग व ढंग से नहीं हो पाया। आज भी बिना राष्ट्र हित को ध्यान में रखते हुए वही पुरानी शिक्षा प्रणाली हम अपनी भावी पीढ़ियों को हस्तांतरित कर रहे हैं। विश्व के अन्य देशों के मुकाबले शिक्षा क्षेत्र में हम अभी भी काफी पीछे हैं। हमारी शिक्षा प्रणाली आज भी बच्चों को भय के माहौल से बाहर नहीं निकाल पा रही और यह डर विद्यालय व शिक्षकों से नहीं बल्कि जो पाठ्यक्रम विद्यालयों में औपचारिक रूप से उन्हें पढ़ाया जा रहा है वह भय कहीं न कहीं उनके मानसिक विकास में बाधक बन रहा है। यही चीज देश के विकास में भी सबसे बड़ी बाधा बन रही है। हमारी शिक्षा प्रणाली में किसी के भी मुल्यांकन का सबसे बड़ा माध्यम आज भी औपचारिक शिक्षा को ही माना जाता है जबकि विश्व के साधन संपन्न देश अनौपचारिक शिक्षा पर भी बराबर बल देते हैं। इसी शिक्षा के बल पर उन्होंने अपने मानव संसाधनों का उचित दोहन कर देश को आगे बढ़ाने में मदद की। देश में अभी भी किसी की योग्यता को मापने का पैमाना बस परीक्षा में पास फेल होने को ही माना जाता है। जबकि यह जहां बच्चों के साथ अन्याय है वहीं यह देश की मानवीय पूंजी का भी ह्रास है। शिक्षा क्षेत्र में इस पैमाने को बदलने की जरूरत है। 
आज भी परीक्षा प्रणाली में बच्चों को जबानी याद करने के लिए मजबूर किया जाता है। मतलब जो रट्टू तोता बन गया उसे ही आगे की शिक्षा लेने के योग्य मान लेते हैं। एक उदाहरण रखना चाहूंगा मैंने शिक्षण संस्थानों में शिक्षण के दौरान देखा का हर बच्चा अपने आप में कुछ खास होता है जरूरी तो नहीं हर बच्चा  गणित व अंग्रेजी में अच्छा हो यदि वह इन विषयों में अच्छा नहीं तो हो सकता है वह अन्य विषयों में अन्य बच्चों से कहीं ज्यादा बेहतर हो। कुछेक बच्चे तो ऐसे भी हैं भले ही वह अन्य विषयों में औसत से भी कम हो लेकिन ड्राईंग व खेल कूद जैसे विषयों में सबसे आगे रहते हैं लेकिन हमारी मौजूदा परीक्षा प्रणाली के कारण उनकी योग्यता का पैमाना ड्राईंग व खेल कूद आदि विषय न होकर केवल गणित, अंग्रेजी, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान आदि जैसे विषयों को मान लिया जाता है। इसी आधार पर हमने ऐसे बच्चे को फेल कर उनसे उनकी योग्यता के विषय भी छीन लिए। हो सकता था यदि उन बच्चे को अपनी पसंद के विषय में आगे पढ़ने और बढ़ने दिया होता तो शायद वह एक दिन देश में किसी महान कलाकार या खिलाड़ी की जगह ले लेते।
दुनिया में कई देशों की शिक्षा व्यवस्था बहुत अच्छी मानी जाती है।दक्षिण -पूर्वी एशियाई देश जैसे -साउथ कोरिया, जापान ,सिंगापुर , हांगकांग ,चीन की शिक्षा प्रणाली हमारे देश से कहीं बेहतर। इसी तरह यूरोपियन देशों में फिनलैंड ,बेल्जियम, आयरलैंड आदि देशों की शिक्षा व्यवस्था भी विश्व के अन्य देशों से बेहतर है। जापान आज अपनी शिक्षा प्रणाली के कारण ही विश्व में शिक्षा का गुरु कहलाता है। वहां की शिक्षा प्रणाली 6-3-3-4 पर आधारित है, 6 साल प्राथमिक शिक्षा, 3 साल जूनियर हाईस्कूल, 3 साल सीनियर हाईस्कूल और 4 साल यूनिवर्सिटी। वहां की शिक्षा के दो पहलू हैं - नैतिकता और तकनीकी। जापान में इन दोनों पर ही शिक्षा में जोर दिया जाता है। जबकि हमारे देश में आज नैतिक शिक्षा केवल कागजों तक ही सीमित है व्यवहारिकता से कोसों दूर हो गई है किसी समय में भारतीय गुरुकुल शिक्षा जो नैतिक शिक्षा व मूल्यों के लिए विश्व प्रसिद्ध थी आज हमने उस धरोहर को खुद ही खत्म कर दिया है । जापान में प्राथमिक शिक्षा के बाद से ही तकनीकी को शिक्षा का हिस्सा बनाया गया है जबकि हम उच्च शिक्षा के बाद इस पर ध्यान देने लगते हैं।
जापान में बच्चे के 10 वर्ष की आयु (कक्ष चार तक) का होने तक कोई परीक्षा नहीं ली जाती है जबकि हमारे देश में नर्सरी कक्षा से ही हम नन्हें बच्चों से  पास फेल की उम्मीदें पाल लेते हैं। जापान के स्कूलों में पहले 3 साल तक यह नहीं देखा जाता कि बच्चा क्या जानता है या उसने क्या सीखा है। वह अपने बच्चों के लिए सबसे ज्यादा जरूरी चीज अच्छे तौर-तरीकों व नैतिकता को मानते हैं इसी से उनका चारित्रिक विकास होता है। वहां विद्यार्थियों को स्वयं अपना काम करने की शिक्षा दी जाती है। बच्चे ही अपने कक्षा रूम , बाथरूम , कैंटीन आदि को साफ रखते हैं वह जीवन की छोटी लेकिन महत्वपूर्ण व्यवहारिक चीजों को बचपन से ही सीख लेते हैं। हमारी शिक्षा प्रणाली ऐसी बना दी गई है की यदि कोई बच्चा ऐसा कार्य करता दिखता है तो पूरे शिक्षक समाज को ही दोषी करार दे दिया जाता है। जापानी विद्यार्थी कभी भी कक्षाओं को छोड़ते या बंक नहीं मारते जबकि भारतीय स्कूलों में बहुत से बच्चे तो गृह-कार्य न कर पाने के डर से ही स्कूल नहीं आ पाते। वहां का  शिक्षा मंत्रालय हर कक्षा के पाठ्यक्रम, पाठ्यपुस्तकों और कक्षाओं पर कड़ी निगरानी रखता है। यह निगरानी भय का माहौल बनाने के लिए नहीं बल्कि बच्चों को शिक्षण के दौरान क्या-क्या कमियां महसूस होती है उसको दूर करने के लिए यह सब किया जाता है। 
इसी तरह सिंगापुर की प्राइमरी शिक्षा भी विश्वभर में बेहतरीन है। वहां बच्चे को रटाने की बजाए सिखाने पर जोर दिया जाता है यहाँ बच्चे खुद से सिखते हैं और अगर उन्हें कोई समस्या हल करने में दिक्कत होती है,जो शिक्षक उनकी मदद करता है। शिक्षक वहां एक सहायक के रूप में है न कि खलनायक के रूप में। बहुत सी अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट में फिनलैंड विश्व भर की शिक्षा प्रणाली में अग्रणी बना हुआ है और इसकी वजह है वहां की इनोवेटिव शिक्षा प्रणाली। ये परिणामों से ज्यादा आविष्कारों में यकीन करते हैं। फिनलैंड में विद्यार्थी प्राइमरी और सैंकंडरी शिक्षा में सिर्फ एक टेस्ट देते है,जिससे वो अपने भविष्य की दिशा तय करते हैं। व्यर्थ का ऐतिहासिक शिक्षण जैसे मुगल शासकों का इतिहास कौन सा शासक  कब हुआ, कब मरा आदि इस इतिहास पर समय नष्ट करने की बजाए  विश्लेषणात्मक शिक्षण पर बल दिया जाए की हमारी किन कमियों के कारण हम गुलाम रहे व बाहरी ताकतों ने देश में लूटपाट की। जिससे बच्चे खुद खोजी बनकर वैसी परिस्थितियों से निपटने के लिए मानसिक रूप से तैयार हों।
इसी तरह ज्योमेट्री की हर आदमी को आवश्यकता नहीं पड़ती। जिस बच्चे ने इंजीनियर बनना है उसके लिए तो जरूरी है की वह यह विषय जरूर पढ़े लेकिन हर बच्चे के लिए यह जरूरी नहीं। जिस बच्चे को पेंटिग में या अन्य विषयों में रुचि है वह ज्योमेट्री क्यों पढ़े? उसके लिए तो रोजमर्रा की जिंदगी के लिए होने वाला हिसाब किताब जिसमें पैसे का जमा घटाव आवश्यक है वह ही काफी होगा। हमारी शिक्षा प्रणाली ऐसी हो जिसमें जीवन में काम आने वाली शिक्षा को सभी के लिए अनिवार्य किया जाए और अन्य जिस किसी की विषय विशेषज्ञ बनने की इच्छा हो उसे शिक्षा प्रणाली में अलग से व्यवस्था होनी चाहिए। यह नहीं की गणित व इतिहास उनके लिए भी जरूरी हो जो अन्य विषयों में कहीं बेहतर हों। हमारे देश में भी आज ऐसी ही शिक्षा प्रणाली की जरूरत है जो प्राथमिक शिक्षा के बाद बच्चों की रुचि को ध्यान में रखते हुए उनकी दिशा तय करने में सहायक हो। 



राजेश वर्मा (बलद्वाड़ा-मंडी)
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