मनुष्य अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए अनेक प्रकार की क्रियाएं करता है जिसको हम व्यवहार शब्द से परिभाषित करते हैं। व्यवहार ही एक ऐसा माध्यम जो समाज में आपका मान - सम्मान  बनाता बिगाड़ता है। अच्छा व्यवहार अच्छी छवि को स्थापित करने में सहायक होता है और आपका बुरा व्यवहार आपकी छवि को बिगाड़ता है। अक्सर देखने में आता है कि अच्छे भले आदमी अपनी कड़वी बातों और अपने बुरे व्यवहार से समाज द्वारा बहिष्कृत किए जाते हैं। जब हम चिड़िया को किसी फल पर चोंच मारते हुए देखते हैं तो यह समझ में आता है कि चिड़िया दाना चुगना चाहती है और जब हम उसकी चोंच में तिनके को देखते हैं यह अनुमान लगाते हैं कि चिड़िया घोंसला बनाने के लिए तिनके इकठ्ठा कर रही है। मनुष्य के संपर्क में आने से सबसे पहले उसके बोलने, बात करने के ढंग से ही उसके व्यवहार का पता लग जाता है उसके रहन - सहन, आचार - विचार तो बाद में पता चलते है। कुछ लोग शिक्षित होते हुए भी असभ्य होते हैं जो अपने बोलने के ढंग में कुवचनों का प्रयोग करते हैं। देखने में तो बहुत शालीन होते हैं परन्तु जुबान खुलते ही उनके दुर्गुणों की पोल खुल जाती है। व्यवहार मनुष्य की आंतरिक स्थिति का विज्ञापक होता है। शिष्टता और शालीनता सद्व्यवहार के प्राण कहे जाते हैं। व्यवहार में इन गुणों का समावेश ही यह बता देता है कि यह आदमी कितना संस्कारी है। कुछ लोग अपने अस्तित्व को बचाने के लिए अपने को सही सिद्ध करने के लिए दूसरों को गलत साबित करने में लगे रहते हैं जिसके परिणाम स्वरूप वह स्वयं का वजूद खो देते हैं। हमें आचार: परमो धर्म: आदर्श वाक्य को अपना सिद्धान्त बनाकर एक सुसंस्कृत और सभ्य समाज के निर्माण में अपना योगदान देना चाहिए। आपको सभ्‍य देखकर आपके अनुज भी इसी राह पर चल कर सभ्‍य समाज का निर्माण करेंगे।           राजेश सारस्वत 

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