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गुरु-शिष्य: घटता संवाद, बिगड़ता रिश्ता -- जगदीश बाली

कहते हैं गुरु उसके शिष्य के लिए ईश्वर से भी ऊंचा स्थान रखता है, परंतु यदि छात्र अपने ही गुरु के साथ हिंसा पर उतर आए तो यह गुरु-शिष्य के बीच में बिगड़ते रिश्ते का द्योतक है। हाल ही में नाहन के डॉ यशवंत सिंह परमार स्नातकोतर महाविद्यालय में हुआ जब एक छात्र अपने ही कालेज के प्राध्यापक के साथ थप्पड़बाज़ी पर उतर आया। प्राध्यापक का इतना कसूर था कि उन्होंने छात्र को गाड़ी में बजाए जा रहे गाने की आवाज़ कम करने को कहा। छात्र ने प्रिंसीपल को भी कह दिया कि जो करना है कर लो। इस तरह की सीनाज़ोरी की घटनाएं आम होती जा रही हैं। पिछले वर्ष रामपुर के गोविंद वल्लभ पंत पी.जी. कॉलेज में एक छात्र ने विज्ञान संकाय के प्राध्यापक पर हमला कर दिया था। अगस्त 2014 में संजौली कॉलेज में छात्रों ने प्रधानाचार्य व अन्य शिक्षकों के साथ मार-पीट की थी। ये घटनाएं विद्यालय से ले कर विश्वविद्यालय तक होती रहती हैं। अक्तूबर 2016 में प्रदेश के गंगथ के सरकारी स्कूल के एक छात्र ने सुबह-सवेरे स्कूल ग्राउंड में प्रधानाचार्य का गला पकड़ लिया था। उनकी गलती ये थी कि उन्होंने उस छात्र को एक विद्यार्थि की तरह अनुशासित होने की हिदायत दी थी। ये घटनाएं इस बात को दर्शाती है कि जिस देश में शिष्य अपने गुरु को देवतुल्य मानता आया है, वहीं आज इस रिश्ते में इतनी तनातनी आ गयी है कि मामला मारपीट तक पहुंच जाता है। कभी तो कत्ल भी हो जाता है। 14 दिसम्बर 1998 में अरसू के एक सरकारी स्कूल के नवी कक्षा के एक छात्र ने प्रधानाचार्य पर सरिये से वार किया जिसके कारण उनकी मौत हो गयी थी। देश के अन्य राज्यों में भी ऐसा होता रहता है। आपको याद होगा कि सितंबर 2016 में दिल्ली के सुलतानपुरी इलाके के एक सरकारी स्कूल में अध्यापक का उसके ही दो शिष्यों ने चाकू घोंप कर कत्ल कर दिया था। दिसंबर 2014 में झारखंड के एक स्कूल के सातवी कक्षा के तीन छात्रों ने अपने अध्यापक को इसलिए मार डाला क्योंकि उक्त अध्यापक ने उन्हें धुम्रपान न करने की सलाह दी थी। फ़रवरी 2012 में चिन्नई के एक स्कूल में नवी कक्षा के छात्र ने चाकू से अपने अध्यापक की जान ले ली। ये सारी वारदातें गुरु-शिष्य के बीच बिगड़ते रिश्ते की पराकाष्ठा है। 
      जिस देश का इतिहास गुरु-शिष्य की आदर्श परंपरा के उदाहरणों से भरा पड़ा है, उस देश में आज गुरु-शिष्य के बीच बढ़ती खाई एक समस्या बनती जा रही है। विद्यालय में मुल्क के भविष्य को सींचा जाता है और भाग्य की रेखाएं खींची जाती है। इस मुकदस जगह पर इल्म के चिराग जला कर गुरु अपने शिष्य के अज्ञान के अंधेरे को दूर करने का प्रयास करता है और उसे अनुशासन, संस्कार और शिष्टाचार का सबक पढ़ाता है। परन्तु जो कुछ घटित हो रहा है, उससे साफ़ ज़ाहिर है कि धीरे-धीरे शिक्षण संस्थान अनुशासनहीनता, बदज़ुबानी, मारपीट, और हिंसा का केंद्र बनते जा रहे हैं। आज गुरु-शिष्य के संबंधों में वो आत्मीयता नहीं रही। अगर अपने शिष्य को सही राह दिखाना, पथभ्रष्ट होने से रोकना, गलती पर टोकना, उसे अनुशासित रहने का सबक सिखाना गुरु के लिए अब गुनाह हो गया है, तो आखिर इन शिक्षा के मंदिरों का औचित्य क्या है? यदि शिक्षण संस्थानों में ऐसा होता रहा, तो ऐसे असुरक्षित वातावरण में गुरु कैसे अपने कर्तब्य का निर्वाह कर पाएगा? क्या संत कबीर जी की 'गुरु कुम्हार शिष कुंभ है... वाली पंक्ति सिर्फ़ किताबी छलावा है?
 गुरु और शिष्य की बीच की तनातनी का एक कारण यह है कि दोनों कक्षा में एक दूसरे से मिलते तो हैं, परन्तु उनमें संवाद नहीं होता। अध्यापक और शिष्य का रिश्ता वर्चस्व स्थापित करने का नहीं, बल्कि आपसी समझ का एक ज़हनी रिश्ता है।
 गुरु-शिष्य के बीच बढ़्ती दूरियों के लिए अभिभावक भी जिम्मेदार हैं। अभिभावक समझते हैं कि शिक्षक महज़ एक कर्मचारी हैं जिसे सरकार मोटी तनख्वाह दे रही है या वे मोटी रकम फीस के रूप में अदा कर रहे हैं। वे भूल गए हैं कि गुरु-शिष्य का रिश्ता ग्राहक और दुकानदार का पेशा नहीं है। शिक्षण ऐसा कार्य है, जिसमें शिष्य में ज्ञान प्राप्ति का जुनून व समर्पण की भावना होनी चाहिए और गुरु में अपने ध्येय के प्रति निष्ठा। बच्चों के मन में शिक्षक के प्रति आदर-भाव भरने की बात तो दूर, अभिभावक उनकी शिकायत करने या उनके विरुद्ध मुकद्दमा दायर करने के लिए आतुर रहते हैं। ऐसी स्थिति में बच्चों में गुरु के लिए सम्मान की भावना कैसे विकसित होगी? विद्यालयों में एसएमसी गुरु-शिष्य-अभिभावक के रिश्तों को सुदृड़ करने में अहम भूमिका निभा सकती है। 
 घर बच्चे की पहली पाठशाला होती है और मा-बाप पहले अध्यापक। बच्चों के मानस पटल पर घर के माहौल और वहां मिल रही तरबीयत का गहरा असर होता है। जिस अत्यधिक खुले वातावरण में आज बच्चे पल रहे हैं, उसने उनका भला कम और नुकसान ज़्यादा किया है। माता-पिता 'बैस्ट पापा' या 'बैस्ट मॉम' कहलाने के चक्कर में अपने बच्चॊ की हर बात या मांग पर 'यैस' कहने की होड़ में शामिल रहते हैं। इस होड़ में न माता-पिता, न ही बच्चे ये समझ पाते हैं कि 'नो' शब्द की अहमियत कितनी है। 'यैस' को सुनते-सुनते बच्चे को 'नो' सुनना अखरने लगता है। 'दरवाज़ा खुला है' वाली निति पर चलते-चलते पता भी नहीं चलता कि बच्चा कब राह से भटक गया। वास्तव में आज उचित समय पर कहा गया 'नो' कल बच्चे के भविष्य के लिए 'यैस' साबित होता है। मा बाप को याद रखना चाहिए कि एक चिंगारी को बुझाने के लिए चुल्लु भर पानी भी काफ़ी होता है, मगर जब वह ज्वाला बन जाए, तो दमकल विभाग का टनों पानी भी कुछ नहीं कर पाता। उठते ज़ख्म को वक्त पर दवा न मिले तो वह नासूर बन जाता है। बच्चे की बेहतर परवरिश के लिए डांट व दुलार, फ़टकार व तारीफ़, थपेड़े व पुचकार की ज़रूरत होती है, ताकि उसका विकास एकतरफ़ा न हो।

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