साहित्य

 जैसा कि शब्द से ही यह भान और ज्ञान हो जाता है कि जो समाज की बेहतरी के लिए समाज का आईना बनकर अतीत को सामने रखता है वह साहित्य है। साहित्य कभी भी अहितकारी और अमंगल सिद्ध नहीं हो सकता है। आज के दौर में भी लिखने वालों की कमी नहीं है। बेशक पढ़ने वालों की तादाद घटती जा रही है। जो पढ़ता है वही अच्छा और सच्ची बात लिख सकता है। साहित्य की महता को जानना आज अत्यावश्यक हो गया है। हम इतिहास में राजाओं के दरबार में साहित्यकारों कवियों, पंडितों, नीति ज्ञाताओं के विवरण पढ़ते आए हैं, जो राज्य को सुचारू रूप से चलाने में अहम भूमिका निभाते थे। जिनके ग्रंथ समय - समय पर राजाओं के मार्गदर्शक बने। समाज के लिए जिन लेखकों ने अपनी कलम से इतिहास को जिंदा रखकर आने वाले समय के लिए सुधार की व्यवस्था को बनाया उनको आज कौन नहीं जानता। आदिकाल से लेकर अब तक, वाल्मीकि से आरंभ हो कर न जाने कितने देसी और विदेशी लेखकों ने हमारे समक्ष उस वक्त से लेकर आज तक बहुत कुछ पढ़ने को रखा जिसको आधार बनाकर हम विज्ञान में और व्यवहार में सामाजिक विकास में तरक्की करते जा रहे हैं।अगर हमें अपना बिता कल पता न होता तो हम अगले कल की कल्पना भी नहीं कर सकते। केवल मात्र पशुवत जीवन जी रहे होते।इसलिए समाज को और बेहतर बनाने के लिए आज भी साहित्य की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है।हमें प्रत्येक मंच पर अपने अंदाज़ से वो कविता हो, कहानी हो, शायरी हो या संगीत के माध्यम से समाज में सुधार करने का प्रयास करना चाहिए। जैसे नीति कहती है कि साहित्य संगीत कला विहीन : साक्षात्पशु पुच्छविषाण हीन। युवाओं को आज साहित्य की ओर ले जाना आवश्यक है जिससे वह अन्य कुरीतियों से बचने के लिए प्रेरित होकर इतिहास में हुई गलतियों को दोहराने की गलती न कर बैठे। यह आपके यश, धर्म (बुराई रहित) , अर्थ (पैसा), ऐश्वर्य (काम) मोक्ष (आनंद) प्राप्ति का साधन बन सकता है। लेखन में कभी अभिमान और धन लालसा नहीं रखनी चाहिए। ये दोनों आपके रास्ते पर गड्ढे खोदने का काम कर सकते हैं। लालसा कभी भी यश प्राप्ति नहीं करवा सकती। व्यापार में लाभ कम समय के लिए होता है। साहित्य अगर व्यापार में बदल जाए तो उसमें न ज्ञान और न रस होता है। 

राजेश सारस्वत

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