आभासी दुनिया में रमती असली दुनिया-- जगदीश बाली

संसार में पदार्पण से ही मानव ने लगातार तरक्की की है और उसकी जीवन शैली में निरंतर परिवर्तन होता रहा है। एक ज़माना था जब लोग गांव के चौपाल पर इकट्ठा हो कर देश-दुनिया की बातें किया करते थे। वहीं बातों--बातों में पता चल जाता था किस घर में कौनसी खुशी मनाई जा रही है और कौनसा घर किस मुसीबत से गुजर रहा है। लोग चाचा, ताया या गांव के किसी दोस्त के घर आया-जाया करते थे। आत्मीयता से बातें होती थी। उधर बच्चे लुका-छुपी, पिट्ठू, कंचे, गुल्ली डंडा जैसे खेल खेलों में आनंदित रहते थे। परंतु वक्त तेज़ी से गुज़रता है और गुज़रने के सथ बदलता भी है। वैज्ञानिक तरक्की के साथ दुनिया भौतिक रूप से छॊटी होती गई, समाज सिमटता गया, परिवार बंटते गए और छॊटे होते गए। परिवर्तन के इस प्रवाह में वो गांव का चौपाल कहीं खो गया। होते-वाते अब इसका स्थान ले लिया है पांच इंच की जादुई स्क्रीन पर आभासी दुनिया ने। बच्चों के वो पुरने खेल भी कहीं खो गए। वट्सऐप, फ़ेसबुक, ट्विटर, हाइक इत्यादि की अभासी दुनिया का जादू इतना सर चढ़ कर बोल रहा है कि बच्चे, जवान, बूढ़े, पुरूष, महिला सब इसमें खोते जा रहे हैं। कई लोग तो इस आभासी दुनिया में इतने रम जाते हैं कि उन्हें असली दुनिया का ख्याल ही नहीं रहता। वास्तविक दुनिया की नमस्ते, गुड्मॉर्निंग व हाय-बाय इतनी महतपूर्ण अब नहीं रही जितनी फ़ेसबुक, वट्सऐप और फ़ेसबुक की। इस दुनिया है हजारों दोस्त हैं, मगर अधिकतर सिर्फ़ आभासी या कहने मात्र के लिए। इस दुनिया में संवेदनाओं का आभास मात्र होता है। वास्तविक दुनिया में सुख-दुख के साथी आखिर कितने होते हैं? लोगों को फ़ेसबुक पर तो चेहरे पसंद आ रहे हैं, परंतु वास्तविक चेहरों के लिए वक्त नहीं। लोग पांच इंच की स्क्रीन पर आत्ममुग्धता की दौड़ में मसरूफ़ हैं। अब न मेहमानी करने का वो मज़ा रहा और न मेजबानी की वो संतोष भरी खुशी। कभी मेहमान पांच इंच की स्क्रीन में रम जाता है तो कभी मेज़बान। हां, हूं, अच्छा जैसे शब्दों से ही काम चलता है। दोनों के बीच में चाए, नाश्ता व भोजन के सिवाय वास्तविक बात-चीत कम ही पाती है। इस आभासी दुनिया के लाइकस व कमैंटस में मानवीय रिश्तों का प्रेम, संवेदनाएं व अपनापन कहीं हाशिए पर चले गए हैं। वट्सऐप या फ़ेसबुक की दुनिया में मगन गृहिणी को दूध उबलने तक का आभास नहीं होता, वह मा बच्चे को दूध देना भूल जाती है। उसे कभी ध्यान नहीं रहता कि बच्चे ने कब पॉटी कर ली और कभी भूल जाती है कि वह बच्चे को नहलाने के लिए टब में छोड़ आई है। दफ़्तर में बाबू को पता नहीं चलता कि कब साहब उनके सामने से गुज़र गए क्योंकि बाबू जी तो वट्सऐप व फ़ेसबुक चैट में व्यस्त थे। एक अनुमान के अनुसार 2019 में भारत में सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या 258.27 मीलियन हो जाएगी और 2022 तक यह संख्या बढ़कर 370.77 मीलियन हो जाएगी।
 इस बावत बच्चों और युवाओं की स्थिति चिंतनीय है। देश में 8-13 साल के 73% बच्चे सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं, जबकि 13-17 साल के 86% लड़के इंटरनैट का इस्तेमाल करते हैं। औसतन बच्चे प्रतिदिन दो घंटे नैट का इस्तेमाल करते हैं। वे इंटरनैट का इस्तेमाल चैटिंग  के लिए, गेम खेलने के लिए, पॉर्नोग्राफ़ी देखने के लिए करते हैं। चैटिंग के दौरान दी गई सूचना के आधार पर कई अपराध भी अंजाम दिए जाते हैं। ऑनलाइन पर आभासी इशकबाज़ी के चलते बहुत से युवा व युवतियां वास्तविक जीवन में विभिन्न तरह की मुश्किलों में पड़ जाते हैं। फ़ेसबुक या वट्सऐप पर दिखाए गए सब्ज़बाग वास्तव में होते ही नहीं है या बहुत महंगे साबित होते हैं। पहले ददा-ददी और नाना-नानी की कहानियां और लोरियां सुनते-सुनते बच्चे सो जाया करते थे, परंतु अब उन्हें मोबाइल गैम चाहिए। नैट की चकाचौंध वाली गेन में वे बहुत सा समय जाया कर देते हैं। इंटरनैट पर ब्लूव्हेल नामक खेल ने बच्चों की आत्महत्याओं का जो कोहराम मचाया था उससे माता-पिता सकते आ गए थे। इस खेल का शिकार हुए एक 19 साल के युवा विगेश ने अपने सुसाइड नोट में ब्लूव्हेल के बारे में लिखा कि यह एक खतरनाक खेल है और जो इसे खेलता है, इससे बाहर नहीं आ सकता। ऐसा भी क्या मनोरंजन कि जान पर बन आए। अब आजकल लड़के पबजी ने धूम मचा रखी है। स्क्रीन पर ऑन्लाइन व्यस्त रहते हुए बच्चे, किशोर व युवा अपना कीमती समय अनुपयोगी कार्यों में नष्ट कर रहे हैं। कई बार मा-बाप भी अपनी व्यस्तता के चलते और बच्चों से पीछा छुड़ाने के लिए उनके हथों में स्मार्ट फ़ोन दे देते हैं। आगे चल कर यह बच्चों की लत बन जाती है। जानकारों का मानना है कि बच्चे को समार्ट फ़ोन थमाने का मतलब है कि आप उसके हाथों में कोकीन या एल्कोहल दे रहे हैं। मनोचिकित्सकों का कहना है कि मोबाइल एडिक्शन बच्चों और युवाओं की सेहत के लिए खतरनाक है। इससे चिड़चिड़ापन, कम भूख ल्गना व कम नींद आना जैसी समस्याएं हो सकती हैं। किशोर व युवा आत्मनुग्धता के इतने शौकीन हो गए हैं कि एड्वैंचरस सैल्फ़ी लेने के लिए वे खतरनाक जगहों पर चले जाते हैं। ऐसा करते हुए कई नदी में डूब जाते हैं, तो कई पहाड़ी पर से गिर जाते हैं। वे ट्रैन या गाड़ियों से भी टकरा जाते हैं। एक ग्लोबल अनुसंधान के अनुसार 2011 से 2017 तक विश्व में 259 व्यक्ति सैल्फ़ी लेने के चक्कर में अपनी जान गंवा बैठे। इनमें 20-29 वर्ष के 50% और 20-29 वर्ष के 36% लोग थे। कुल 259 मे से 159 भारत के लोग थे। निसंदेह विज्ञान द्वारा प्रदत अन्य सुविधाओं की तरह इंटर्नैट के भी अपने गुण और दोष है। यह ज्ञान का भंडार व बेशुमार मानव सुविधाओं का पिटारा है, वहीं इसका अविवेकपूर्ण व अंधाधुंध इस्तेमाल घातक है। याद रखें कहावत 'अति सर्वत्र वर्जयेत' इंटरनैट के लिए भी लागू होती है।

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