बिखरा हुआ  बचपन 

सुबह सबेरे माँ का जल्दी से उठाना जल्दी से मुँह धुला कर चाय के साथ सूखी रोटी देकर कहना कि आज गाय बैल और भेड़ बकरियों के साथ उस दूर पार की पहाड़ी पर चले जाना अच्छे से पशुओं को घास चराना। लगभग सबके घर की शुरुआत इसी प्रक्रिया से शुरू होती थी। गाँव के सारे बच्चे टोली बनाकर एक ही किसी खुली जगह में जाकर पशुओं को चराने के साथ खुद को एक दूसरे के साथ कोई खेल खेलते और खुश रहते। माँ बाप को कोई चिंता नहीं रहती थी कि हमारा बच्चा कहीँ खो न जाए। मिलकर ऊंची ऊंची पहाड़ी पर ऊबड़ खाबड़ रास्ते पर पत्थर से खेलने के लिए सड़क बनाकर पत्थरों की गाडि़यों को चलाते और खुश रहते कभी-कभी घर से आटा नमक आलू और तौआ चुराकर परोंठे तो कभी-कभी हलवा बनाते और सब बच्चे मिलकर खाते और मन में प्रसन्नता होती। कभी कबार तो हिमाचल की देव संस्कृति से जुड़े कुछ पहलुओं को खेल के माध्यम से खेलते। धवाला प्रवास में जिस तरह देवता की पालकी उठाकर नृत्य करते हैं ठीक उसी तरह पालकी बनाकर देववाणी बोलते और खूब मस्ती करते। कभी-कभी पीठू कभी कबड्डी कभी क्रिकेट का खेल खेलते और बच्चों को देखकर सबको लगता कि सारा गाँव एक परिवार है, न जाने आज वो बचपन कहाँ खो गया न जाने आज वो खेल कहाँ चले गए जो एक दूसरे को इकठ्ठा करते थे एक परिवार में बांधते थे। इस बदलते समय में सब बदल गया एक मासूम सा बच्चा कीताबों के बोझ तले दब गया।20 किलो बजन वाला बच्चा 20 किलो कीताबों के भार को उठाता हुआ स्कूल जाता है और लौट कर चार दीवारी के अंदर किसी कोने में अपनी मस्ती के लिए मोबाइल फोन में खेलने का प्रयास करता है और अपनी आंखो की रोशनी को कमजोर करता जाता है। आज उस बच्चे को सुबह सबेरे बोर्नबीटा मिलाकर दूध पिलाया जाता है और ताज़ा खाना बनाकर नाश्ता करवाया जाता है साथ में स्कूल के लिए फ्रूट और जूस के साथ दोपहर का खाना दिया जाता है और बॉयल किया पानी दिया जाता है फिर भी  एक मजबूत और खुशहाल बचपन कहीं देखने को नहीं मिलता। आज के इस बदलते समय में सब कुछ बदल गया है जो गाँव एक परिवार सा लगता था वो गाँव तो दूर की बात परन्तु एक बिखरा हुआ परिवार लगता है जहाँ पर परिवार की रौनक किसी एक कोने में या तो किताबों में पड़ी हुई है या मोबाइल में कोई नया खेल खेल है वो बचपन कैसे मानसिक और शारीरिक रूप से मज़बूत हो सकता है, उस बचपन का सर्वागीण विकास होना संभव नहीं है। जो बचपन सर्दी गर्मी की परवाह किए बिना गाँव की गलियों में खेलता और हल्की फुल्की बीमारियों को नज़दीक नहीं फटकने देता था आज वही बचपन इतना नाज़ुक बन गया है कि जुखाम लगने पर भी टूट जाता है। उसी बचपन में आज हीमॉग्लोबिन की भारी मात्रा में कमी पायी जाती है। न जाने वो बचपन कहाँ खो गया जिस बचपन से इस देश को एक आस थी एक मज़बूत और खुशहाल भविष्य की उम्मीद थी। 

राजेश सारस्वत

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