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लघु कहानी



मंगलू और राधो का टूटा सपना 
 
अरी सुनती हो क्या, मान सिंह उठ गया हो तो नाश्ता करवा कर भेड़ बकरियों के पास भेज देना उसको फिर आकर स्कूल भी जाना है। 
राधो.      तुम रोज़ उसे बकरियों को चराने भेज देते हो कभी उसको पढ़ने भी दिया करो। 

मंगलू.  हां हां उसके मास्टर ने कल भी उसकी शिकायत की है कि ये शरारतें बहुत करता है पढ़ाई की तरफ इसका कोई ध्यान नहीं रहता। पिछले वर्ष भी फ़ेल होकर मेरी नाक कटवा दि इस बेबकत की औलाद ने।  
 
 राधो.   बेटा मानसिंह उठ जाओ नहाकर नाश्ता कर लो। 

मान सिंह..   माँ मुझे आज स्कूल नहीं जाना है मेरा मन नहीं कर रहा स्कूल जाने को। माँ उसकी बात मान जाती है और नाश्ता करवा कर बकरियों के पास भेज देती है। आखिर वह खुश होकर बकरी चराने चला गया। शाम ढलने से पहले वह घर आया और फिर से उसे स्कूल जाने की चिंता सताने लगी। दूसरे दिन उसका कोई बहाना नहीं चलना था और जैसे कैसे मन बना कर स्कूल चला गया।मास्टर जी जान चुके थे कि मान सिंह कुछ और चाहता है उसे पढ़ाई नहीं करनी है। मास्टर जी पूछते हैं कि  बेटा मान सिंह आप जिंदगी में क्या करना चाहते है? मान सिंह के पास गुरु जी को बताने के लिए कुछ शब्द नहीं थे क्योंकि वह झिझक रहा था। जब गुरु जी ने उसे बार बार पूछा कि बेटा जिंदगी में हर आदमी को कुछ न कुछ अपनी आजीविका के लिए करना पड़ता है। कहाँ से दाल रोटी कमाओगे? खाना तो हर व्यक्ति के जीवन के लिए जरूरी है बिना भोजन के कैसे जीओगे? कब तक माँ बापू तुम्हें खाना खिलाएँगे वो तो अब बूढ़े हो चुके हैं, तुम्हें ही सब कुछ करना है। अगर कुछ करोगे नहीं तो तुम्हारी शादी भी नहीं होगी। कौन तुम्हें अपनी बेटी देगा? शादी के नाम पर मान सिंह मुस्कुराया और गुरु जी समझ गए कि उसको सही रास्ते पर लाने के लिए यही तरीका उचित है।बार बार पूछने पर मान सिंह गुरु जी बता देता है कि वह फौजी बनना चाहता है और देश की सीमाओं पर पहरा देकर दुश्मनों से देश की रक्षा करना चाहता है। गुरु जी उसकी पीठ थपथपाते है और उसके लक्ष्य को देखकर खुश होते हुए उसको प्रोत्साहित करते है। मान सिंह बहुत खुश होता है और अपनी जिंदगी के प्रत्येक पहलू को मास्टर जी बताता है। गुरु जी उसके साथ अपनापन देकर उसको पढ़ने के लिए उत्साहित करते है। उस दिन से मान सिंह रोज़ स्कूल जाता और पढ़ाई करता। गुरु जी समय समय पर उसका मार्गदर्शन करते। आखिर मान सिंह दसवीं की परीक्षा पास करता है और फौज में भर्ती होने के लिए मैदानी परीक्षा पास करता तथा लिखित परीक्षा में भी उत्तीर्ण होकर फौज में भर्ती हो जाता है। ख़ुश होकर मान सिंह गुरु जी के पास मिठाई लेकर गुरु जी को अपनी सफलता का श्रेय गुरु जी को बताता है। उधर मंगलू और राधो की खुशी का ठिकाना नहीं रहता। सारे गाँव में मिठाई बांटी गई और एक रात का जश्न भी गाँव में मनाया गया। कुछ वर्षों बाद मान सिंह अपनी शादी की बात को लेकर अपने बापू से कहता है कि वह एक पास के इलाके की लड़की से शादी करना चाहता है। इस बार वह शादी की बात को लेकर शर्माया नहीं जैसा गुरुजी के पास मुस्कुराया था। बापू ने भी उसकी बात मान ली और लड़की के साथ शादी का प्रस्ताव पास कर लिया। आखिर अब लड़की वालों से बात करने का समय आया। सारा सिलसिला आसानी से निंभ गया। विवाह के कुछ दिन बाद मान सिंह अपनी छुटी पूरी करके कश्मीर की सीमा पर सेवा देने के लिए रवाना हो गया, जहाँ पर कश्मीर को लेकर दो देशों की सरकारों की खींचतान के बीच मान सिंह शहीद हो गया। यह खबर सुनकर उसके माँ बापू और पत्नी के सपनों पर पानी फिर गया और बेहोश हो गए। उनके दुख का कोई ठिकाना नहीं रहा आखिर हो भी क्यों न। मान सिंह उनका जिगर था जिगर का टुकड़ा था। उनके मन में शहादत की खुशी के साथ एक सवाल आज भी जिंदा है कि आखिर कश्मीर के कारण कितने जिगर के टुकड़े जान दे गये। उनका क्या कसूर था? बस यही कि वो देश सेवा करना चाहते थे।

राजेश सारस्वत

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