दानवों के स्वामी बलिराजा के बलिदान दिवस पर नगराओं में रात भर रही "बलाजा" की धूम। ----- जगदीश शर्मा

दानवों के स्वामी बलिराजा के बलिदान दिवस पर नगराओं में रात भर रही "बलाजा" की धूम।
देवता ही नहीं दानवों की भी जन कल्याण के कारण पांगणा क्षेत्र में पूजा होती है।इसकी जीवंत मिसाल है पांगणा के उप-गांव नगराओं का बलाजा(बलिराज उत्सव)।नगराओं का बलाजा रियासती काल से ही सुविख्यात है।बलाजा उत्सव के कारण नगराओं एक तीर्थ का रुप प्राप्त कर चुका है।यहां देवथला फरास का थला(पावन चबूतरा)लोगों की आस्था का केन्द्र है।नगराओं के युवा बसंत चौहान, सहायक अभियंता जय कुमार चौहान व विशाल,वनरक्षक भागचंद, अध्यापक राजकुमार,समाजसेवी निर्मल ठाकुर,पंचायत वार्ड सदस्या हेमा देवी,सहकारी भा समिति सचिव तेजराम गौतम,व्यवसायी पारस सोनी,पूर्व पंच दिलाराम, बसंती देवी,भीमादेवी खूबराज शर्मा,सुनील चंदेल आदि ने बताया कि पूरा नगराओं क्षेत्र थलादेओ की अनंत कृपा का ऋणी है।वंश वृद्धि,जान-माल-फसल की रक्षा,न्याय,भौतिक बाधाओं से मुक्ति थलादेओ ही करते हैं।इन्होंने बताया कि करसोग ही नहीं अपितु संपूर्ण सुकेत में नगराओं की पवित्र भूमि में ही "बलाजा"(बलिराज) का क्षेत्र देवता की उपस्थिति में सामुहिक रुप में विशाल उत्सव का आयोजन होना नगराओं की सहकारिता व जनजीवन का अभिन्न अंग है।वीरवार गोधूलि के समय देव थला जी के देव रथ के नगराओं पधारते ही बलाजा उत्सव की शुरुआत हो गई।यज्ञ करने वालों व दान देने वालों में सर्वश्रेष्ठ दानवों के राजा बलिराज के सम्मान में नगराओं वासियों द्वारा लकड़ी के बड़े-बड़े ठेले एक स्थान पर रखकर जलाए गए विशाल "घयाने"(अलाव)के पास थलादेओ ने देवनृत्य कर खुशी का इजहार किया।नगराओं ही नहीं अपितु पांगणा, कलाशन, सोरता, चुराग, मशोग पंचायत वासियों ने थलादेओ की विधिपूर्वक पूजा-अर्चना कर नया अन्न,गाय का नया घी,दानराशि थलादेओ को चढ़ाकर अपनी मन्नौतियां अर्पित कर स्वंय को धन्य किया।रात भर बलाजा जागरण, "बेड़"सुकेती नाटी गीत-संगीत बदलते युग को बीते युग के मनोरंजन के साधनों से रोमांचित करता रहा।थलादेओ समिति के वरिष्ठ कारदार नंदलाल चौहान ने बताया कि"बलाजा"के अगले दिन देववाद्य धूनों के साथ देव जागरण,देव स्नान,पूजा व झाड़ा देवोत्सव मनाया जाता है।जिसमें क्षेत्रवासियों के सुख-द:ख और कल्याण के लिए देव गूर चावल के दानों की सम-विषम गणना के आधार पर भूतकाल,वर्तमान व भविष्य का देववाणी में बखान करते हैं।
व्यापार मंडल के युवा प्रधान सुमीत गुप्ता व भूपेन्द्र ठाकुर का कहना है कि नगराओं का "बलाजा"ग्रामीण समाज के जीवन मूल्यों का परिचायक है।बलराजा का रोचक इतिहास है।वामन पुराण के आधार पर भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर ब्राह्मण के रूप में दैत्यराज बलि के यज्ञ में जाकर उससे तीन पग भूमि की याचना की थी।ब्राह्मण रुपी वामन भगवान के इस प्रकार कहने पर असुर बलि ने कमण्डलु लेकर ब्राह्मण को तीन पग भूमि का दान देने के लिए जैसे ही ब्राह्मण के हाथ में शुद्ध संकल्प का जल दिया तो ब्राह्मण ने विष्णु रुप में दिव्य रुप धारण कर लिया तथा तीन पगों में तीनों लोकों को दान में प्राप्त कर बलिराजा को पांव के नीचे दबाकर सुतल नामक पाताल में भेज दिया।दक्षिणा की संपन्नता होने पर दानेश्वर बलिराजा ने भगवान विष्णु से वरदान के रुप में वर्ष में एक दिन अपनी पूजा के लिए भी मांगा।विष्णु भगवान ने कहा कि गोवर्धन पूजा के बाद तुम्हारे पूजन के निमित दूसरा उत्सव मनाया जाएगा।उत्सवों में श्रेष्ठ यही बलिराज(बलाजा) उत्सव है।इस प्रकार प्राचीन काल में विष्णु भगवान ने वामण रुप धारण कर इन्द्र की भलाई, देवताओं की कार्यसिद्धि तथ ब्राह्मणों,ऋषियों,गायों के समूह और द्विजों के हित के लिये दानव राज बलि को बांधा था।पांगणा के पौराणिक वैभव एवं पारंपरिक लोक उत्सवों के परिप्रेक्ष्य में लोकप्रिय "बलाजा" का विशिष्ट स्थान है।
छायांकन के लिए विद्युत विभाग के सहायक अभियंता श्री जय चौहान जी का हार्दिक आभार जी।

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