धुसाडा़ स्कूल एक संस्मरण--- राम मूर्ति लठ

मेरा पुश्तैनी गांव धुसाड़ा है। छठी से दसवीं कक्षा तक हाई स्कूल धुसाड़ा स्कूल में शिक्षा प्राप्त की। पंडित गिरधारी लाल जी हमारे हैडमास्टर थे। वह 1994 में हिप्र शिक्षा विभाग से बतौर संयुक्त निदेशक सेवानिवृत्त हुए । आजकल ऊना में रहते हैं । धुसाड़ा स्कूल में मुख्याध्यापक के रूप में उनका कार्यकाल स्वर्णिम कहा जा सकता है। वह बहुत ही ईमानदार,मेहनतकश अध्यापक ,कुछल और न्याय प्रिय प्रशासक थे उस समय विद्यालय में अध्यापकों की टीम एक दम टाप क्लास थी।

मुझे स्मरण है जब 1971 में प्राथमिक पाठशाला(जो गांव के बीच,हमारे घर से तकरीबन ढाई तीन किमी थी) से पांचवी क्लास पास करके धुसाड़ा स्कूल में दाखिल हुआ।  ठेठ ग्रामीण परिवेश में पले बडे़ एक बच्चे के रूप में मुझे नये और बड़े स्कूल में आने की खुशी थी तो मन में भय भी था। प्राईमरी तक निकर या पटेदार पायजामा पहना करते थे। बड़े स्कूल में पैंट पहनना शुरू किया। आधुनिक पोशाक टाई-बैज आदि का दूर दूर तक पता ना था।
उन दिनों हमारे क्षेत्र के आसपास रिजल्ट घोषित होने के बाद सबसे पहले ऊना स्थित हरदियाल सिंह पुस्तकां वाले से किताबें कापियां खरीद कर स्कूल बैग तैयार किया जाता।

यहां हरदियाल सिंह पुस्तकां वाले ऊना साहिब का जिकर करना भी आवश्यक है। जिला मुख्यालय ऊना के मेन बाजार में इनकी किताबों की बड़ी मशहूर दुकान थी। हरदियाल जी सख्त स्वभाव के व्यक्ति थे। वह बाहिद ऐसे विक्रेता होंगे जिनसे क्रेता
डरा करते थे। उनका इस क्षेत्र में एकाधिकार इसकी वजह हो सकती है। लाईन में लगकर किताबें खरीदना पड़ता था कापियां ,ज्योमैट्री बाक्स,पुष्पा पैन,पैंसिल,रबड़ और रंग भी साथ देते थे । किसी को लेनी हो तो लो वर्ना अपने घर का रास्ता नापो।गांव से गये व्यक्ति के पास चुपचाप उनके पैकेज को खरीदने के अतिरिक्त कोई चारा ना होता।
हम कालेज में भी हो गये लेकिन  उनसे खरीद फरोख्त करने में फिर भी झिझकते थे ।उनका इस फील्ड में दबदबा रहा,,,,धीरे धीरे और दुकानें खुलने से तस्वीर बदल गई।

खैर ! बात धुसाड़ा स्कूल की हो रही थी तो आईये ! फिर उसी विषय पर लौटते हैं ।
प्राईमरी स्कूल में हम धूल मिट्टी में बैठा करते। कई बच्चे अपने घर से जूट की बोरी साथ लाते थे। फिर टाट पट्टी आ गई उस पर बैठने लगे। हाईस्कूल में भी सातवीं कक्षा तक टाट ही थे जबकि 8वीं क्लास के बाद शीशम की लकड़ी के डैस्क और बैंच दिए जाते थे। डैस्कों पर बैठने वाले बच्चे अपने आपको और ग्रह के प्राणी समझते थे। उन दिनों छठी सातवीं कक्षा के तीन  सैक्शन हुआ करते थे शेष कक्षाओं के दो दो सेक्शन थे।
स्कूल में घंटी की जगह एक चार फुट का लोहे का गार्डर लटका राहता। जिसे लम्बूतरे पत्थर से बजाया जाता। इस घंटी आवाज दूर दूर तक सुनाई देती थी तीन घंटिंयां बजती,पहली लंबी ,दूसरी छोटी और तीसरी तेज तेज । यह घंटी वर्तमान में भी विद्यमान है।
अंग्रेजी के अक्षर यू के आकार का स्कूल परिसर चार भागों में बंटा हुआ था जिसमें अमरूद के पौधे और सुन्दर फूल लगे हुए थे। एक कुआं परिसर में था जिस पर रैहट लगा था। सभी बच्चे इसी का पानी पीते और क्यारियों की सिंचाई भी इससे होती। दो अन्य बगीचे भी थे जिसकी देखभाल मिंया नाम का चौकीदार करता था। नत्थू राम और बालकृष्ण दो चपरासी थे। जिनसे हम अध्यापकों जितना ही डरते थे।
विद्यार्थी शारीरिक तौर पर तगडे़ थे कबड्डी,फुटबाल और वालीवाल विद्यालय की मुख्य खेलें थीं । फुटबाल का ग्राऊंड न होने के कारण प्रैक्टिस करने घंडावल बेल्ले (मैदान) में जाया करते थे।
सुबह और आधी छुट्टी के वक्त ग्रामोफोन पर गाने बजते,जिनमें से एक के बोल मुझे याद है,
"बच्चे होते हम भी अगर,
नाम हमारा होता बबलू डब्लू
खाने को मिलते लड्डू,,,,
काले रंग के गोल तबे जैसे रिकार्ड को घूमते प्लेटफार्म पर रख दिया जाता और फिर ध्यान से एक सूई लगी छड़ उस पर टिका देते। बड़ी सुरीली आवाज होती। हम घर से लाई चूरी खा कर जल्दी खेलने में जुट जाते। अपनी अपनी टोलियां अपने अपने खेल। बड़े बच्चे एक फुटबाल लेकर उससे खेलते लेकिन हम जैसे पिद्दी बच्चे उनमें घुसने का जोखिम कम ही उठाते। कभी कभार उस रेले में  घुस भी जाते तो इधर उधर भाग कर हांफते रहते पर बाल से हमारा संपर्क ना हो पाता,,,,
आधी छुट्टी बंद होने की घंटी हमें कतई ना सुहाती। हम तो खेलना और बस खेलना चाहते। लेकिन हम छठी सातवीं वालों की सुनता ही कौन था?
हमारे अध्यापक इतने मेहनती की पूछो मत। छठी में हमारे कक्षा के प्रभारी अध्यापक थे बसाल निवासी श्री चंद्र प्रकाश जी, दरम्यानी कद-काठी,गठीला शरीर,कम हंसने वाले चन्द्रप्रकाश जी कबड्डी के जबरदस्त खिलाड़ी थे।साईकिल पर आया करते। हमें अंग्रेजी और हिसाब पढ़ाया करते। कुटाई इतनी करते कि डर के मारे पैंट गीली हो जाती। मैं छठी-सी का मानीटर था मुझसे अक्सर डंडा मंगवाते। अगर उनके आने से पहले डंडा ना हो तो मानीटर को एक दो लाफे लग जाते। हम अपने अध्यापकों की मेहनत और उनकी मार के डर से पढ़ते लिखते कब दसवीं में पहुँच गये पता ही ना चला।
10 क्लास में गणित के हमारे टीचर मास्टर सुदर्शन भी बसाल गांव के रहने वाले थे। पतले लंबे कद के सुदर्शन जी भी नित साईकिल से स्कूल आया जाया करते। यह वह दौर था जब अध्यापक आपस में इस बात पर लड़ते थे कि ओवर टाईम किसने लेना। सारा साल सुबह स्कूल लगने से पहले हमारी गणित की क्लास लगती थी। शाम को अंग्रेजी की।
सुदर्शन जी इतने सवाल करवाते की हमें जुबानी याद हो गये थे।
सुबह बाहर क्लास बैठ जाती। निगाहें खड्ड पार सड़क पर,जैसे गणित के अध्यापक साईकिल पर आते दिखते,हमारी घिघ्घी बंध जाती। खड्ड में पानी होता था इस लिए वह नीचे उतर,पैंट ऊपर कर जूते  खोलकर खड्ड क्रास करते।
आते ही हमें सवाल लिखवा देते और जो बच्चे पहले दिखा देते और जिनका ठीक होता उन्हें दूसरों की चैकिंग को लगा देते और उनपर निगाह रखते।इस बीच वह बच्चों की लाईनों में चक्कर लगाते रहते। जो अच्छा बच्चा गलत करता दिखता उसे एक आध छड़ी जड़ देते और दोबारा देखने को कह कर अलर्ट कर देते। जैसे किसी बच्चे ने दिखा दिया बाकियों को खड़ा कर देते और मुर्गा बना कर ऐसी सेवा करते कि तशरीफ रखते,तशरीफ दुखने लगती। घर वालों के डर से स्कूल की मार का जिकर घर में भी ना करते।
 हमारे भाषा अध्यापक श्री देवराज प्रभाकर जी छोटे कद के बड़े सख्त मिजाज के टीचर थे। छोटा कद बड़ी डांग उनकी पहचान। सुलेख और भाषा की शुद्धता पर बल देते। फैंटने में वह अग्रणी अध्यापकों में उन्हें शुमार किया जा सकता है। वालीबाल के अच्छे प्लेयर थे। जम्प मारकर खास अंदाज में सर्विस देते थे बाल गूंजती दूसरी ओर जाती थी। प्रायः अध्यापकों और बच्चों में वालीबाल का मैच आधी छुट्टी में लगता था।

 सांय की कक्षा छुट्टी के बाद खड्ड पार कर सड़क किनारे लगती थी क्योंकि पांच बजे के करीब एक मात्र बस ऊना को जाती थी। हम एक कुर्सी एक ब्लैक बोर्ड और चाक वहां ले जाते। बच्चे सीरुआ घास(चुभने वाली) पर बैठते। बच्चे मन  ही मन प्रार्थना करते,"हे भगवान् ! बस जल्दी भेज देना"
पर वह अपने समय पर आकर हमें निराश करती। या बस पहले आ जाए या अंधेरा पहले हो जाए तब क्लास छूटती।  शिक्षकों ने कमरे गांव में ले रखे थे वह कभी यहां रुक जाते कभी घर चले जाते।
मुख्याध्यापक पंडित गिरधारी लाल का छोटा बेटा मिंटू उर्फ सुनील हमारा सहपाठी था लेकिन सेक्शन -ए था। उन दिनों ए-सेक्शन में लड़कियां होती थी और कुछ लड़के । जबकि बी-सेक्शन में केवल लड़के । पिटाई में पंडित जी अपने बेटे का रत्ती भर लिहाज ना करते। उनका थप्पड़ जिसने भी एक दफा खाया होगा उसकी याद भूली ना होगी। अनुशासन इतना कि जैसे अपने दफ्तर से बाहर कदम रखते ,ग्राऊंड में लगी तमाम कक्षाओं में बैठे शिक्षक उठ खड़े होते और अलर्ट हो जाते।

कभी कभी पियन हैडमास्टर आफिस से चिट लेकर क्लास में आता और कुछ बच्चों की अभ्यास पुस्तिकाएं ले जाता। जिनके वहां से वापिस आने पर टीचर यह जानने को उत्सुक रहते कि क्या टिप्पणी की है। जिन विद्यार्थियों को गुड या वैरी गुड मिलता वह फन्ने खां बने इतराते फिरते। दूसरे भी उनकी कापी देखते और बढ़िया से बढ़िया करने की अघोषित दौड़ लगी रहती।अलग-2 अध्यापकों के अलग-2 प्रिय बच्चे होते।
 दिसंबर अंत में  जनवरी महीने से सब क्रियाकलापों पर विराम लग जाता। फिर पढ़ाई और दोहराई की बात होती।
साल के आखिर तक यह स्पष्ट हो जाता कि कौन कितने पानी में है। 
जो बहुत लायक बच्चे होते उन्हें अलग बैठ कर पढ़ने की छूट रहती। हमारे से एक क्लास सीनियर एक ऐसा लड़का था पनोह गांव का जाटों का लड़का जगतार सिंह चौधरी। वह बाहुत कुशाग्र बुद्धि था स्कूल का प्रधान भी था। उन दिनों वह अंग्रेजी में भाषण देने वाला इकलौता विद्यार्थी था। वह बहुत मेहनत करता था। दसवीं क्लास में बोर्ड में थर्ड आया और फिर प्री-यूनिवर्सिटी साईंस में हिमाचल में फर्स्ट आया। बाद में बीएचयू में पढ़ा ,वहां से यूएसए वाले ले गये। आजकल वही निवास कर रहे हैं । बड़ा कारोबार है।
इस स्कूल में पढ़े विद्यार्थियों ने विभिन्न क्षेत्रों में अपना लोहा मनवाया है। सभी नामों का उल्लेख हो सकता ना हो पाये। जो कुछ जहन में आ रहे हैं उनमें घंडावल के डाक्टर नरेश कुमार लट्ठ किन्नौर में डीसी रहे है,स्तोथर के डीआईजी राजेन्द्र मोहन भी शायद यहीं पढ़े हैं । बैंकों और ओ एन जी सी में धुसाड़ा के पवन और कश्मीर हैं । पनोह के मोतीलाल हिमाचल बिजली बोर्ड में एक्सियन है।यहीं के स्व० जगदीश रतन जो हमारे सहपाठी थे वह भी एचपीएसईबी में एक्सियन थे। घंडावल का रमन और देवेन्द्र एसडीओ हैं । स्तोथर का गुलशन कालेज में प्रोफैसर है। स्कूल कैडर के प्रिंसिपल दलजीत सिंह,संतोष जोशी,उनकी बहन कुसुम,मतिंदर कुमार लट्ठ,सुशील लट्ठ,सुभाष धीमान,अशोक कुमार,विजय कुमार भी इस विद्यालय के स्टूडेंट रहे हैं बदोली वासी सीएमओ प्रकाश दडो़च और उनके भाई भी यहीं पढ़े । गर्व की बात है कि ,एजी एचपी,हिप्र सचिवालय,पुलिस,डाक तार विभाग,रेलवे आदि में भी रह चुके इस स्कूल से शिक्षित बच्चे। आजकल बीडीसी अंब के चेयरमैन और इस क्षेत्र के प्रसिद्ध ठेकेदार पंडित सतीश जी भी इसी स्कूल के स्टूडेंट रहे। 
मेरा सौभाग्य है कि मुझे इस विद्यालय में बतौर टीजीटी 1990 में ,लेक्चरार 2000 में और प्रिंसिपल 2011 में सेवा करने का अवसर मिला। यह मौका मेरे लिए महज एक और स्टेशन मात्र नहीं इससे कहीं बढकर था। जी जान से हमने विद्यार्थी हित में काम किया। शैक्षिक गुणवत्ता में सुधार के दृष्टिगत उठाये  मेरे कदम कुछ शिक्षकों को पसंद नहीं आये और तत्कालीन विधायक को अनापशनाप पढ़ा कर सेवानिवृत्ति के नजदीक होने परा भी मुझे चंबा ट्रांसफर करवा दिया। लेकिन वहां भी मैंने उसी तल्लीनता से कार्य किया और अपने सिद्धान्तों से कभी समझौता नहीं किया। 
इस विद्यालय के कण कण का मैं ऋणी हूं, क्योंकि जीवन में  हम जो थोड़ा बहुत कर पाये हैं । उसमें इस स्कूल का अहम योगदान है। 
विद्यालय को गऊ,गंगा,गीता,धरती के साथ माता का उच्चतम दर्जा यूं ही नहीं दिया गया  है। 
अंत में मैं उस समय के अपने अध्यापकों को कोटि कोटि नमन करता हूं जिन्होंने हमें पढ़ाया है।
20/11/2018

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