नाम मे क्या रखा है। --- जगदीश बाली

निज़ाम भी तुम्हारा, साहिब-ए-मसनद भी तुम्हारा। जो चाहो नाम छाप दो, शहर का बड़ा अखबार भी तुम्हारा।  
विलियम शेक्सपीयर ने अपने नाटक रोमियो और जूलियट में कहा है: "नाम में क्या रखा है? गुलाब को कोई और नाम से पुकारोगे तो भी वह वैसी ही खुशबू देगा।" पर अगर शेक्सपियर नाम के नाम पर मचे बवाल को देखते तो ज़रूर अपनी सोच को बदल लेते और कहते: ~कुछ तो है नाम में जो इतनी हाय तौबा मच जाती है।" मा-बाप बच्चों का नाम रखने के लिए पंडित जी से सही महूर्त पूछ नामकरण समारोह मनाते हैं। पंडित जी के बताए पहले अक्षर से नाम ढूंढने के लिए किताबें छान मारते हैं, गुगल की सैर भी कर अते हैं। किसी मा बाप को द से दुर्योधन, र से रावण, क से कंस, श से शूर्पणखा नाम रखते सुना है? आखिर नाम में कुछ तो रखा है। अब मेरा नाम ज से जगदीश रखा है और अगर ज़ालिम सिंह रखा होता, तो कितना बुरा लगता। भई कुछ तो बात है नाम है। काम कितना भी बुरा कर लो, नाम बुरा नहीं रखेंगे। नाम चाहे कितना बदनाम हो जाए, पर नाम बदनाम नहीं रखेंगे। गुणी राम में कितने ही अवगुण हो, लायक राम कितना नालायक हो, खुशी राम चाहे कितना ही दुखी हो, बुद्धि राम कितना ही मूर्ख हो, नयन सुख भले ही अंधा हो, पर नाम तो ठीक है न। पर सवाल ये है कि अगर रावण का नाम राम होता और राम का नाम रावण होता, तो क्या उनके कर्म बदल जाते? चाचा को चाचु कहो या अंकल, रिश्ता तो नहीं बदल जाता। मगर अगर चाचा को चाची या मामा कह दो तो मामला गडबड़ हो जाएगा। यदि नरेंद्र के साथ मोदी न लगे और राहुल के साथ गांधी न लगे, तो हो गई न ऐसी-तैसी। वैसे नाम जब रख ही लिया है, तो क्या इसे बदल देना सही है। और अगर बदल दिया जाए, तो क्या फ़र्क पड़ता है? कलकता को कोलकता, बंगलौर को बंगलुरु, मद्रास को चेन्नई, गुड़गांव को गुरुग्राम करके क्या इन शहरों की काया कलप हो गई। अरे आप तो सोचने लगे कि मैं नाम बदलने के विरोध में हूं। नहीं जी, मैं तो बस शेकसपीयर वालों का एक सवाल कर रहा था। जो शेक्सापियर वाले नहीं है, वे तो कहते हैं अगर नाम ही गलत रख दिया गया हो, तो बदलने में कोई हर्ज़ नहीं। वे तो मानते हैं कि नाम हमारी संस्कृति के अनुसार होने चाहिए। पर मेरे एक हिंदू दोस्त ने अपनी बेटी का नाम डेज़ी, दूसरे ने रोज़ी, तीसरे ने मिल्ली रख दिया है और चौथे ने तो अपने बेटे का नाम पीटर रख दिया है। अब उनकी हिंदू संस्कृति का क्या होगा? पर नाम बदलने वाले व्यक्तियों के  नाम बदलने की बात थोड़ी कर रहे हैं। वे तो जगहों के नाम बदलने की बात कर रहे हैं। अब दावा करने मात्र से तो नाम नहीं बदलेगा। दावा किया है तो दलील भी होनी चाहिए। दलील ये है साहब कि जिन जगहों के नामकरण में उनकी पहचान, संस्कृति व गौरवमयी इतिहास को मसलने का प्रयास किया गया है, उन जगहों का नाम तो बदल ही देना चाहिए। इन दावों व दलीलों में कुछ जगहों के नाम बदलना तो उचित लग सकता है गोया डलहौजी व नूरपुर। परन्तु शिमला को श्यामला करने की बात जमेगी नहीं, ठनेगी ज़रूर। शिमला मिर्च के बारे में भी सोचना पड़ेगा क्योंकि बात जब निकलती है तो दूर तलक जाएगी। नाम तो पहचान होती है। नाम बदलने की ठसक में कहीं पहचान गुम न हो जाए साहब।   चुनांचे नाम बदलते समय जन मानस की भावनाओं की कद्र होनी चाहिए क्योंकि हम लोकतंत्र में रहते हैं। नाम बदलिए, पर महज़ नाम बदलने के लिए नाम मत बदलिए। शेक्सपीयर कोई छोटा मोटा आदमी तो था नहीं कि उसकी बात हल्के में ली जाए। फ़िर भी अगर नाम बदलने वाले नाम बदलने पर अड़ ही गए है, तो आम लोग तो यही कहेंगे: निज़ाम भी तुम्हारा, साहिब-ए-मसनद भी तुम्हारा। जो चाहो छाप दो, शहर का बड़ा अखबार भी तुम्हारा।                        - बाली.जे.

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