कुपोषण समस्या

मुट्ठी भर दाने को भूख मिटाने को
मुंह फटी पुरानी झोली का फैलाता


विद्यालय जाते समय कुछ रोज़ पहले मैने देखा कि एक नन्हा सा बच्चा अपनी मा के साथ नज़दीक के प्राइवेट स्कूल जा रहा है। मा-बेटॆ के सथ-साथ उनका छोटा सा कुता भी दुम हिलाता हुआ चल रहा था। बच्चा बिसकिट खाता हुआ चल रहा था। वह बिसकिट खुद खाता और बीच-बीच में एक बिसकिट कुत्ते को भी देता। उसे ऐसा करते देख मुझे ख्याल आया इस वर्ष rजुलाई में दिल्ली के मंडावली में घटी उस दुखद घटना की जिसमें दो, चार व आठ साल की तीन सगी बहिनों की कथित तौर पर भूख व कुपोषण के कारण मौत हो गयी थी। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में डॉक्टरों ने बताया कि उन बच्चियों के पेट खाली थे और उन्हें काफी समय से पौष्टिक खाना नहीं मिला था। ये घटना देश की राजधानी दिल्ली की है जहां देश के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, उराष्ट्रपति, मुख्यमंत्री, भोजन मंत्री से ले कर सरकार व सियासत के बड़े-बड़े औधेदार बैठते हैं। इस स्थिति में राष्ट्रकवि रामधरी सिंह दिनकर की ये पंक्तियां स्टीक बैठती हैं:
श्वानों को मिलते दूध-वस्त्र, भूखे बालक अकुलाते हैं,
माँ की हड्डी से चिपक, ठिठुर जाड़ों की रात बिताते हैं।
विडंबना है कि हमारे देश में एक वर्ग तो स्थूलता से जूझ रहा है, वहीं दूसरी ओर करोड़ों बच्चे रोटी न मिलने की वजह से अस्थिपिंजर मात्र लगते हैं। जहां रोजाना लाखों टन भोजन कचरे में ज़ाया कर दिया जाता है, वहीं करोड़ों बच्चों भोजन न मिलने से कुपोषित रह कर जीने के लिए मज़बूर हैं। जिस देश में लगभग 21 मिलियन टन गेंहूं गल-सड़ जाता है, उसी देश में अनगिनत बच्चों का जीवन मुट्ठी भर दाने के लिए तरसते-तरसते समाप्त हो जाता है। जहां कुपोषण एक भीष्ण समस्या है, वहां भोजन की बर्बादी मानवीय संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट भी इसी ओर इशारा करती है जिसमें खाना ना मिलने के साथ साथ खाने की बर्बादी का ब्योरा भी दिया गया है।
अगर देश के दिल दिल्ली में ही कुपोषित व भूखे बच्चे रहते हैं, तो देश के अन्य राज्य जैसे मध्यप्रदेश, झारखंड, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार, महारष्ट्रा, हरय़ाणा, पंजाब, आसाम, राजस्थान, गुजरात अदि की स्थिति गंभीर ही होगी। आंकड़े तो ऐसा ही कुछ बता रहे हैं।
वैसे तो कुपोषण एक वैश्विक समस्या है, परन्तु भारत में बाल कुपोषण की स्थिति बहुत गंभीर है। गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में पुरुलिया और महाराष्ट्र के नंदूरबार जैसे जिलों में हर दूसरा बच्चा कुपोषित है। संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि भारत में हर साल कुपोषण के कारण मरने वाले पांच साल से कम उम्र वाले बच्चों की संख्या 10 लाख से भी ज्यादा है। दक्षिण एशिया में भारत कुपोषण के मामले में सबसे बुरी हालत में है। कुपोषण का मतलब है आयु और शरीर के अनुरूप पर्याप्त शारीरिक विकास न होना। एक स्तर के बाद यह मानसिक विकास की प्रक्रिया को भी वाधित देता है। यदि बहुत छोटे बच्चों, खासतौर से जन्म से लेकर 5 वर्ष की आयु तक के बच्चों को पर्याप्त पोषण आहार न मिले तो उनमें कुपोषण की समस्या जन्म ले लेती है। इसके परिणाम स्वरूप बच्चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता का घट जाती है और छोटी-छोटी बिमारियां उनकी मृत्यु का कारण बन जाती हैं। भारत में पांच वर्ष से कम उम्र के 38 फीसदी बच्चे अपनी आयु के मुताबिक कम ऊंचे हैं। 21 फ़ीसदी का वजन अत्यधिक कम है। ज़ाहिर है बाल कुपोषण देश में ब्याप्त गरीबी और भुखमरी की वजह से पनपी हुई महामारी है। विश्व के 23.4 फ़िसदी भूखे लोग भारत में रहते हैं। इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टिट्यूट (आई.एफ़.पी.आर.आई) की 2017 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में भूख एक गंभीर समस्या है। 119 देशों के वैश्विक भूख सूचकांक (जी.एच.आई.) में भारत 100वें पायदान पर है। 31.4 स्कोर के साथ भारत जी.एच.आई.की गंभीर श्रेणी में है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत की रैंकिंग पड़ोसी देश चीन, नेपाल, म्यांमार, श्रीलंका और बांग्लादेश से पीछे है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान क्रमश: 106वें और 107वें स्थान पर हैं और समूचे एशिया में केवल यही दो देश हैं जो भारत से पीछे हैं।
कुपोषण जन्म के बाद ही नहीं, बल्कि पहले भी शुरू होता है। भारत में 51.4% माताएं बच्चे को जन्म देते समय अनीमिया से ग्रसित होती हैं। मा कुपोषित होगी, तो बच्चा भी कुपोषण का शिकार होगा। कुपोषण के कारण वृध्दि बाधिता, मृत्यु, कम दक्षता और कम आईक्यू जैसी समस्याएं आ जाती है। कुपोषित बच्चे घटी हुई सीखने की क्षमता के कारण वह पिछ्ड़ जाता है और अकसर स्कूल में टिक नहीं पाता। स्कूल से बाहर वे सामाजिक उपेक्षा व शोषण के शिकार हो जाते है। इस कारण बड़ी संख्या में बच्चें बाल श्रमिक बन जाते हैं और बाल वैश्यावृत्ति के लिए भी मज़बूर हो जाते हैं। कई बार भूख मिटाने के लिए रोटी की तलाश में बालजीवन गुनाह के रास्ते पर भी चल पड़ता है क्योंकि कहते हैं - वुभुक्षितम् किं न करोति पापं अर्थात भूखा मनुष्य कौनसा अपराध नहीं कर सकता।
कुपोषण देश के लिए चिंता का विषय बन गया है। ये समस्या इतनी गंभीर है कि विश्व बैंक ने इसकी तुलना ब्लेक डेथ नामक महामारी से की है जिसने 18वीं सदीं में यूरोप की जनसंख्या के एक बड़े हिस्से को अपना शिकार बनाया था। हालांकि 1975 में बच्चों को कुपोषण से बचाने के लिए बाल विकास परियोजना व आंगनवाड़ी परियोजनाएं शुरू की गयी थी, परन्तु इन्हें प्राथमिकता की दृष्टि से नहीं देखा गया। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए देश में राष्ट्रीय पोषण अभियान की शुरुआत भी की गयी है जिसके अंतर्गत 5
माह को पोषण माह के रूप में मनाया जा रहा है। फाइट हंगर फाउंडेशन और एसीएफ इंडिया ने मिल कर ’जनरेशनल न्यूट्रिशन प्रोग्राम’ की शुरुआत की है। परन्तु कुपोषण की लड़ाई तब तक नहीं जीती जा सकती है, जब तक कि सरकार इसे मुख्य ऐजैंडे में शामिल नहीं करती। इस अभियान की निरंतर निगरानी करनी होगी ताकि यह अभियान भ्रष्टाचार व लालफ़ीताशाही की भेंट न चढ़े। हर सरकार व हर जिम्मेदार नागरिक का नैतिक कर्तव्य है कि वो सुनिश्चित करे कि बच्चों का बचपन सुरक्षित रहे। गरीब कुपोषित बच्चों के लिए हमारे मन में संवेदना होनी चाहिए।
बच्चे देश के भविष्य के नैगेटिव फ़ोटो होते हैं जिन्हें विकसित हो कर देश का आदर्श नागरिक बनना होता है। बचपन खेलने-कूदने, मौज-मस्ती, शारीरिक व दिमागी विकास का समय होता है। परन्तु कुपोषण एक ऐसा दुष्चक्र है जो इस बचपन को निगल लेता है और इसके साथ ही खो जाता है देश का भविष्य भी। कुपोषण के चंगुल में बच्चे अपनी मां के गर्भ में ही फंस जाते हैं। उनका अंधकारमय भविष्य दुनिया में जन्म लेने से पहले ही तय हो जाता है। गरीबी और भुखमरी की काली स्याही से उनकी नियति में खिलने से पहले ही मुरझाना लिख दिया जाता है। जब किसी देश का बचपन कुपोषण से जूझ रहा हो, तो हम कैसे एक संपन्न भविष्य व मज़बूत राष्ट्र का दावा कर सकते हैं।
कितना भयानक होता है भूख से तडपते बच्चों को देखना! हकीकत है भूख मौत से बड़ी और भयंकर होती है। सुबह मिटाते हैं, परन्तु शाम को फिर सताने चली आती है। जब भूख का सवाल खड़ा होता है, तो सब उपदेश धरे के धरे रह जाते है। फ़िर तो सिर्फ़ रोटी चाहिए, चाहे जैसे भी हो – मांग कर या फिर छीन कर। अगर आस-पड़ोस के किसी ग़रीब कुपोषित बच्चे के मुट्ठी भर दाने को, भूख मिटाने को फैले हाथों को हमारे हाथों से भोजन के निवाले मिल जाए, तो संभव है इन बच्चों के जीवन में उम्मीदों की सांसे आ जाए। गोपाल दास नीरज जी ने सही कहा है:
तन की हवस मन को गुनाहगार बना देती है, बाग़ के बाग़ को बीमार बना देती है
भूखे पेटों को देशभक्ति सिखाने वालो, भूख इन्सान को गद्दार बना देती है

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