सीसीटीवी कैमरे से बेहतर है अंत:करण-----जगदीश बाली

सत्यमेव जयते नानृतं अर्थात सत्य की जीत होती है, झूठ की नहीं - भले ही सारनाथ के अशोक स्तंभ पर लिखे मुंडकोपनिषद से लिए गए इन शब्दों को हम ईश्वरीय मान कर अपना आदर्श मानते हैं, परन्तु जब इन शब्दों को अपने जीवन में व्यवहारिक रूप में ज़मीन पर उतारने की बात आती है, तो बहुत से लोग इस पैमाने पर काफ़ी नीचे उतर आते हैं। कथनी के बार हमारी करनी में अंग्रेज़ी के अक्षर वाला यू टर्न आ जाता है। हम किसी रैस्तरां में खना खा रहे हों, चाहे कहीं वार्तालाप कर रहे हों, चाहे परीक्षा हॉल में परीक्षा दे रहे हों या परीक्षा ले रहे हों, चाहे हम किसी बस या रेलवे स्टेशन पर हों, चाहे हम कोई खरीदारी कर रहे हों - हमें नाइट विजन सीसीटीवी कैमरे चाहिए क्योंकि मालूम नहीं किसके अंदर का चोर कब मौका पाते ही अपना काम करने को ललायित हो रहा हो।
अब कुछ रोज़ पहले उस खबर के बारे में ही सोचो जिसे पढ़कर मैं हैरान और स्तब्ध रह गया था। पश्चिम बंगाल की मुख्य मंत्री ममता बैनर्जी की आधिकारिक यात्रा में गए वरिष्ठ पत्रकार लंदन के लग्ज़री होटल से चांदी की चम्मचें चुराते पाए गए। उनकी ये हरकत सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई। एक महाशय ने तो चुराई चम्मचों को अपने साथी के बैग में डाल दिया ताकि मामला सामने आने पर पकड़ में वो नहीं, उसका साथी आए। खैर सीसीटीवी कैमरे ने उसकी भी पोल खोल दी। मामला ज़ुर्माना दे कर थम गया। शर्मसार करने वाली इस घटना के बारे में पढ़ने के बाद मुझे इसी तरह की एक घटना याद आयी जो उस समय घटी जब मैं शिमला के एक सरकारी कॉलेज में पढ़ता था। एक दिन माल रोड पर स्थित पुस्तकों की एक दुकान में मैं एक पुस्तक खोज रहा था। तभी मेरी नज़र एक ग्राहक पर पड़ी जो अपने हाथ में ऑक्स्फ़ोर्ड डिक्शनरी ले कर खड़ा था। तभी सामने खड़े सेल्ज़्मैन ने उसे डिक्शनरी वहीं छोड़ कर बाहर निकलने का संकेत किया। ग्राहक मंद-मंद मुस्कुराता हुआ दुकान से बाहर निकला और लिफ़्ट की ओर चल पड़ा। दो या तीन मिनट के बाद वह सेल्ज़्मैन भी उसके पीछे निकल पड़ा। मुझे दाल में कुछ काला लगा। अत: मैं भी पीछे-पीछे हो लिया। लगभग सौ कदम आगे जाने के बाद सेल्ज़्मैन मिडल बाज़ार की ओर मुड़ गया। सीड़िया उतरते ही मिडल बाज़ार वो ग्राहक उसका इंटज़ार कर रहा था। उसने फ़टा फ़ट सेल्ज़्मैन कि एक सौ रुपए और एक पचास रुपए का नोट थमा दिया। सेल्ज़्मैन ने रुपए लिए और कहने लगा- पूरे चार सौ पचास की है।" इस तरह ग्राहक ने तीन सौ रुपए बचाए और सेल्ज़्मैन एक सौ पचास की कमाई कर गया। उधर दुकान का मालिक गया भाड़ में। कुछ दिनों बात पता चला कि मालिक ने सेल्ज़मैन को निकाल लिया है क्योंकि ऐसा ही कुछ करते हुए वह एक दिन पकड़ा गया।
ये दोनों घटनाएं शर्मसार करने वाली है और इस बात को तस्दीक करती हैं कि हमारे बाहरी आवरण के नीचे कितनी गंदगी छुपी है, हमारे अंदर कितना बड़ा चोर छुपा है। ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जिन्हें ऐसा करने पर अंत:करण और आत्मा की आवाज से कोई फ़र्क नहीं पड़ता या ये कहिए कि उनकी अतश्चेतना मृतप्राय हो चुकी है। वास्तव में हम ऐसे समाज व समय में रह रहे हैं जहां दोहरा जीवन यापन व पाखंड जीने का तरीका बनता जा रहा है। ऐसे लोग दिखना तो बडा चाहते हैं, परन्तु मौका मिलने पर कमीनगी की ओछी से ओछी हरकत भी कर लेते हैं। दिन के उजाले में तो वे नैतिकता व उच्चरित्र के बड़े-बड़े प्रवचन देते हैं, परन्तु रात के अंधेरे में काले कारनामें करने से नहीं हिचकते क्योंकि वे सोचते हैं - कौन देख रहा है या किसे पता चलेगा? ऐसे लोगों के बारे में कुंवर बेचैन ने दुरुस्त कहा है:
मैं कईं बड़े लोगों की नीचाई से वाकिफ हूं
बहुत मुश्किल होता है बड़े हो कर बड़े होना
लंदन के लग्ज़री होटल में चम्मच चुराते समय ’लोकतंत्र के चौथे स्तंभ’ के इन सदस्यों ने भी या ये सोचा होगा कि उन्हें कोई नहीं देख रहा या उन्हें अपने इस हुनर पर ज़्यादा ही विश्वास रहा होगा। उधर बुक शॉप पर सेल्ज़्मैन और ग्राहक ने भी यही सोचा होगा कि उन्हें कौन पकड़ पाएगा। पर सच्चाई ये है कि सच्च सामने आता ही है और झूठ की दुर्गंध ज़्यादा दिनों तक नहीं रुक सकती।
सवाल ये उठता है कि अंत:करण या अंतश्चेतना का कोई स्थान नहीं? क्या सच्चरित्र, सत्यनिष्ठा, ईमानदारी मायने नहीं रखते? क्या हमें ईमानदार बने रहने के लिए सीसीटीवी चाहिए ही चाहिए?
विषम परिस्थितियों में जो अपने सिद्धांतों को नहीं छोड़ता, वही असल में उच्च चरित्र का स्वामी होता है। संस्कृत में कहा गया है - यथा चित्तं तथा वाचो यथा वाचस्तथा क्रियाः अर्थात जैसा विचार मन में हो, वैसा ही बोलो, जैसा बोलो वैसा ही कार्य करो। यदि आप चरित्र, ईमानदारी और निष्ठा की पैरवी करते हैं, तो इन मूल्यों को अपने वास्तविक जीवन में जीओ। नैतिकता कोई विज्ञापन की वस्तु नहीं है, जिसका ढिंढोरा पीटा जाए। कुछ लोग किसी मार्किटिंग एजेंट की तरह ईमानदारी की बड़ी-बड़ी बात करते हैं और जब ईमानदारी दिखाने का सही अवसर होता है, तो पाला बदलते में देर नहीं लगाते। ऐसे लोग आईने में अपनी सूरत देखने से भी कतराते हैं क्योंकि वे अपना सामना नहीं कर पाते।
शीलम् पुरुषे प्रधानम् अर्थात मनुष्य में चरित्र सबसे ऊँचा स्थान रखता है। फ़्रांस के सम्राट लुई चौदहवें ने निदरर्लैंड के साथ काफ़ी लंबे समय तक युद्ध किया। इस संघर्ष में जब उसे ख़ास सफलता नहीं मिली, तो निराश हो कर अपनी असफलता के लिए मंत्रियों को कोसने लगा। तभी उसके एक क़ाबिल मंत्री जीन कॉल्बर्ट ने करारा जवाब देते हुए कहा: “सर, किसी राष्ट्र का बड़ा या छोटा होना उसकी लंबाई और चौड़ाई से निर्धारित नहीं होता, बल्कि उस देश में रहने वाले लोगों के चरित्र से होता है।” ईमानदार और सत्यनिष्ठ होने के लिए आप को बड़े औधे या महान होने की ज़रूरत नहीं होती। यदि आप जीवन के छोटे-छोटे कामों में ईमानदारी बरतते हैं, तो स्वत: ही आप हर काम को ईमानदारी से ही करेंगे।
हर काम को करने से पहले अत:करण की आवाज़ को सुनिए, खुद से पूछिए कि आप जो करने जा रहे हैं वो सही है या गलत। आप को सही राह मिलेगी। क्योंकि कहा गया है - जाके ह्रदय सांच है ताके भीतर आप। अगर इसे अपना सिद्धांत बनाओगे तो आप न कहीं चमम्च चुराओगे औए न ही किसी दुकान से कोई किताब चाहे सीसीटीवी कैमरे लगे हों या नहीं।

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