आखिर कब तक चलती रहेगी सिफारिश!

आखिर  कब तक चलती रहेगी सिफारिश
कभी सुना था कि जीवित रहने के लिए तीन चीजें जरूरी है रोटी कपड़ा और आवास परंतु शायद इन तीन जरूरी चीजों के इलावा भी एक चीज जो अब जरूरी लगती है वो है सिफारिश "सिफारिश" शब्द सुनते ही सबसे पहले हमारे दिमाग में किसी नौकरी के लिए की गई सिफारिश का ख्याल आता  है लेकिन शायद वर्तमान में इसकी परिभाषा बहुत बदल गई है मैं आज अपने इस लेख  में नौकरी की सिफारिश के इलावा अन्य सिफारिशों की बात करूंगा

आज आपको अपना छोटे से छोटा काम पूरा करने के लिए  नैतिक या अनैतिक रूप से प्रयास करना पड़ता है। हम आप रोजाना अपनी दिनचर्या में देखते हैं कि जब हम अपने किसी कार्य के लिए किसी भी सरकारी या निजी कार्यालय में जाते हैं तो वहां बेशक उसे पूरा करने की एक अपनी प्रक्रिया होती है लेकिन एक प्रक्रिया इससे भी अलग होती है वो है सिफारिश या तो जान पहचान की या फिर किसी भी कर्मी या उच्च अधिकारी या माननीय की। ज्यादातर हम इसके लिए व्यवस्था को दोषी ठहराते है जबकि व्यवस्था से ज्यादा खुद हम लोग दोषी होते हैं मैंने खुद भी ये चीज देखी है कि जब हम किसी अस्पताल में जाते हैं तो वहां पर अपनी-अपनी पर्ची तो बनवा लेते हैं लेकिन कुछेक पर्चियां पहले ही बन जाती है हो सकता है कि ये पिछले दिन की हो, पर जरूरी नहीं सभी पिछले दिन की ही हो, कहने का अर्थ है कुछेक जान पहचान से उसी दिनांक की बन जाती है फिर वो चाहे किसी भी दिन क्यों न बनी हो? जो एक आम आदमी नहीं समझ सकता अगर समझ भी जाए तो वह औरों को नहीं समझा सकता, इसके बाद वह अपनी बारी के इंतजार में लाइन में खड़ा हो जाता है कि कब उसका नंबर आए इस बीच देखते-2 कई लोग बिना पर्ची व अपनी बारी के सीधे चले जाते हैं ना तो उनको कोई रोकने वाला होता है ना ही कोई टोकने वाला, कोई डाक्टर जी के जानने वाला होता है तो कोई उनके किसी कर्मी की जान पहचान वाला और इन सबके बीच जो पिस्ता है वो है एक आम आदमी जिसकी किसी से जान पहचान नहीं होती वो सुबह से लेकर शाम तक उस लाईन में लगा रहता है अपनी बारी के इंतजार में। ये सब अस्पतालों में ही नहीं होता अन्य जनमानस से जुड़े विभागों के भी यही हाल है
हम देखते हैं कि बिजली पानी या अन्य किसी सार्वजनिक सुविधा के लिए एक साथ आवेदन करने वालों में से कुछेक को कनेक्शन आसानी से मिल जाता है तो वहीं कुछेक को कई दिनों तक चक्कर काटने के बावजूद भी सुविधा नहीं मिल पाती यहाँ भी सिफारिश हावी हो जाती है और यह सिफारिश राजनैतिक पहुंच की कम और आम लोगों की अपने-अपने स्तर पर ज्यादा होती है किसी की रिश्तेदारी की बजह से तो किसी की यारी दोस्ती के नाम पर।
कोई व्यक्ति अपने काम  के लिए किसी भी कार्यालय में जाता है तो वहां भी यही हाल होता है जिसकी जान पहचान है उसके लिए कोई नियम कायदे नहीं और जिसकी जान-पहचान नहीं उसके लिए सबकुछ, आज यदि एक तहसील कार्यालय में किसी दस्तावेज/सर्टिफिकेट को भी बनवाना पड़े तो वहाँ भी कुछेक लोग अपनी पहचान का गलत फायदा उठाकर अपना काम निकलवा लेते हैं वहीं कुछ ऐसे भी होते है जो पूरी प्रक्रिया के तहत इंतजार में रहते है कि कब उनका काम हो, जो लोग सिफारिश के बूते यदि अपना काम निकलवा भी लेते है तो क्या उनको नहीं लगता कि उन्होंने ऐसा करके अच्छा किया?
ये सब यहीं खत्म नहीं है बात करें यदि प्रदेश के मंदिरों या अन्य धार्मिक स्थलों की तो सिफारिश वाले तो यहाँ भी पीछे नहीं रहते आते तो देवी-देवताओं के दर्शनों के लिए हैं परंतु यहाँ भी उनको भीड़ और लाईन में लगना गंवारा नहीं वे अपने तिकड़म से सबसे अलग होकर अपना हित साध ही लेते हैं और शायद अपने दिल को झूठी तस्सली देने में कामयाब भी हो जाते हैं लेकिन ये सब आपको दिल बहलाने के लिए तो अच्छा है परंतु एक अनुशासित समाज में इसकी कल्पना नहीं की जा सकती। ऐसे बहुत से कार्य है जो हम आप प्रतिदिन नैतिक अनैतिक रूप से करते व करवाते हैं लेकिन हम उनको भूल जाते हैं जिनकी ना कोई सिफारिश होती है नाहीं उनका कोई जान-पहचान वाला होता है जब तक हम सब ऐसे लोगों के प्रति अपने व्यवहार और अपनी सोच में परिवर्तन नहीं लाते तब तक ना तो आप खुद को विकसित कह सकते हो नाहीं विकसित समाज की कल्पना कर सकते हो।

हलांकि इन सब बातों को व्यवस्था से जोड़ कर देखा जाता है। लेकिन व्यवस्था से ज्यादा दोषी तो हम लोग हैं क्या हममें इतनी सी नैतिकता नहीं कि हम अन्य लोगों की तरह अपने कार्य को उसकी प्रक्रिया के तहत पूरा होने दें क्या हम भी अस्पताल में अपनी बारी का इंतजार नहीं कर सकते हो सकता है हमारी वजह से उस व्यक्ति को तकलीफ हुई हो जो हमारी बिमारी से भी ज्यादा किसी गंभीर बीमारी से ग्रसित हो लेकिन उसके पास  ना तो कोई जान पहचान वाला है ना ही उसके पास किसी की सिफारिश होती है,इस बात का अहसास हमें तब होता है जब हम खुद ऐसी परिस्थिति में से गुजरते है तब हम औरों को तो नैतिकता का पाठ पढ़ाने से नहीं हिचकिचाते लेकिन खुद इसी नैतिकता को किनारे कर देते हैं, व्यवस्था कभी नहीं कहती कि समाज में हम आप इन हथकंडों को अपनाएं लेकिन फिर भी हम ऐसा  करने से गुरेज नहीं करते।
देश प्रदेश उन्नति कर रहा है लेकिन शायद हम उन्नति की इस होड़ में खुद को व्यक्तिगत रूप से आगे रखना चाहते है हम अपनी व्यक्तिगत उन्नति को ही देश प्रदेश  की उन्नति मान लेते हैं और यह सोच ही  देश प्रदेश के विकास में बाधा उत्पन्न करती है
कोई भी देश तभी विकास पथ पर अग्रसर होता है जब वहाँ के लोगों की सोच अपने निजी विकास की बजाए समाज और देश के विकास वाली सोच होगी।
राजेश वर्मा


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