शिक्षा के गिरते स्तर के लिए "शिक्षक राजनीति" भी दोषी। ---- राजेश वर्मा (बलद्वाड़ा-मंडी)


र्तमान समय में सबसे ज्यादा जिस विषय पर चिंतन-मनन हो रहा है वह है शिक्षा व शिक्षक। प्रदेश में शिक्षा के स्तर को उठाने के लिए आए दिन नए-2 प्रयोग सामने आते हैं नित नई नीति सामने आती है परंतु सफलता शायद अभी भी कोसों दूर नजर आती है । बडा दुख होता है जब यह देखने सुनने को मिलता है कि पांचवीं कक्षा के बच्चों को दूसरी कक्षा की किताब पढ़ने नहीं आती और आठवीं कक्षा के छात्र को पांचवीं की किताबें पढ़ने नहीं आती। बच्चे पांचवी आठवीं कक्षा तक तो पहुंच गए लेकिन अक्षर ज्ञान नहीं हुआ। बोर्ड परीक्षाओं में मेरिट में भी आ गए लेकिन उच्च शिक्षा में प्रवेश के लिए सफल नहीं हो पाए। प्रश्न यह है कि इस चीज की जिम्मेदारी लेने को कोई भी तैयार नहीं। वजह साफ है व्यवस्था व समाज द्वारा शिक्षक जमात को दोषी मानना और शिक्षक द्वारा व्यवस्था व नीतियों को दोषी मानना। जहाँ शिक्षक वर्ग इसके लिए नीतियों को दोषी मानता है। वहीं वह भी इस के लिए कहीं न कहीं जिम्मेदार है। सभी की बात नहीं करूंगा लेकिन दोषी है वह शिक्षक जो बस राजनीति के सिवा कुछ नहीं जानते है। आज किसी शिक्षक संगठन को यह कहते नहीं सुना कि हम फलां-फलां कक्षा को स्वेच्छा से पढाएंगे बस आए दिन कोई कहता है कि हम प्राईमरी कक्षा को नहीं पढाएंगे तो कोई कहता है हम 6ठी से 8वीं को नहीं पढाएंगे। हैरानी की बात है कि एक शिक्षक नियुक्त ही शिक्षण उद्देश्य के लिए हुआ परंतु शायद यह उद्देश्य लगता है कहीं दूर छिटक गया है। मेरी बात कुछेक को जरूर बुरी लगेगी लेकिन प्रदेश के ज्यादातर शिक्षक ऐसे है जिन्हें किसी भी कक्षा को पढ़ाने में कोई शर्म नहीं बल्कि वह इसे अपना सौभाग्य समझते हैं। दिक्कत तो सबसे ज्यादा शिक्षकों के नाम पर नेतागिरी करने वाले शिक्षकों को है। सही मायनों में यह लोग चाहते ही नहीं कि शिक्षा स्तर में सुधार हो क्योंकि यदि सबकुछ पटरी पर चलने लगा तो इनको पूछेगा कौन?
"शिक्षक राजनीति" ने भी प्रदेश की शिक्षा का स्तर गिराने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। माना आज शिक्षकों की बहुत सी समस्याएं हैं और इनके समाधान के लिए संघ या संगठनों का होना जरूरी समझा जाता है परंतु वर्तमान में ये संगठन शिक्षकों की समस्याओं का समाधान करने की बजाए मात्र अपने निज स्वार्थ तक केंद्रीत हो गए हैं। यह जग जाहिर है कि प्रदेश में लोगों को आम कहते सुना जा सकता है कि "मास्टरों को राजनीति के सिवा कुछ नहीं आता"। आप हम सब आए दिन देखते हैं कि कई संगठनों के शिक्षक नेता आज सचिवालय में नजर आते हैं तो कल निदेशालय में। कई बार सरकार व विभाग की तरफ से भी सख्ती बरतने के निर्देश हुए कि शिक्षकों के सचिवालय और निदेशालय में डेरा जमाने पर सख्त कार्रवाई होगी। कई बार तो यहां तक भी पाया गया कि कुछेक शिक्षक साल में ज्यादातर समय स्कूलों से नदारद रहते हैं। इसी तरह का उदाहरण पिछले वर्ष शिमला जिला में वहां के उपायुक्त महोदय द्वारा अचानक कुछेक स्कूलों का निरीक्षण करने पर देखने को मिला। हैरानी की बात है जो शिक्षक नेता आए दिन शिक्षक राजनीति में व्यस्त रहते हैं वह अपने स्कूलों में कितना समय दे पाते होंगे इसका अंदाजा कोई भी लगा सकता है।
हम भूल गए की जिस काम के लिए हमें सरकारें नियुक्ति करती हैं उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा। शिक्षक संघ यह मांग तो जरूर करते हैं कि शिक्षकों व शिक्षा से राजनीति दूर हो लेकिन यही शिक्षक नेता अपनी राजनीति पर कोई बात नहीं करना चाहते? ये बात सच है प्रदेश में विभिन्न श्रेणियों के शिक्षक नियुक्त हैं और प्रत्येक शिक्षक व शिक्षक वर्ग की अपनी-अपनी समस्याएं है उनका समाधान भी जरूरी है। किसी को अपनी प्रमोशन के लिए इन संगठनों से जुड़ना पडता है तो किसी को वित्तीय लाभों के लिए परंतु इमानदारी से शिक्षा के स्तर व शिक्षक समाज का भला शायद ही ऐसे संगठन आज दिन तक करवा पाए हों। कोई दिन नहीं होता जब अखबार ऐसी खबरों से काले न हों कि प्रमोशन के लिए इनके नेता माननीय मुख्यमंत्री जी से मिले या वित्तीय लाभों के लिए उच्च अधिकारियों से मिले। यह ठीक है अपने अधिकारों के लिए सरकार व विभाग के उच्च अधिकारियों तक बात पहुंचे परंतु प्रमोशन करना तो विभाग की जिम्मेदारी है और वह अपने समय पर होती ही है इसके लिए शिक्षक नेताओं द्वारा श्रेय लेना अनुचित है । क्या यह समझा जाए कि यदि यह लोग नहीं मिलेंगे तो क्या प्रमोशन नहीं होगी? या कोई वित्तीय लाभ नहीं मिलेगा? जिस तरह से यह संगठन बखान करते हैं उससे तो पूरे शिक्षक समाज को मानो ये लोग ऐसा संदेश देते हैं कि जैसे सबकुछ इन लोगों ने ही करवाया सरकार व विभाग तो कुछ नहीं करता है न करने वाला था।
मुझे नहीं लगता उन स्कूलों में पढ़ाई सुचारू रूप से चलती होगी जिन स्कूलों में ऐसे लोग नियुक्त हैं जिनका मकसद शिक्षक अधिकारों की आड़ में मात्र ट्रांसफर करने करवाने और राजनीति तक ही सीमित है। साल भर आखिर यह लोग कितने दिन स्कूल जातें होंगें यह कोई बताने की बात नहीं जब ये लोग खुद ही अपना बखान करते हैं कि आज हम यहां है तो कल वहां थे। सबसे बड़ी बात है इन संगठनों की चुनावी प्रक्रिया जिसमें मैंने खुद देखा कि इन संगठनों के चुनावों में 10-20 शिक्षक एक साथ अपने-अपने धड़े के लिए वोट मांगने निकले होते हैं। इस बात का अंदाजा यहीं से लगाया जा सकता है कि जिन-जिन स्कूलों से ये सभी लोग चुनावी अभियान में निकले हैं वहां पर उन दिनों शिक्षा का स्तर क्या होता होगा? दूसरा जिस-जिस जगह ये जाएंगे वहां भी उस दिन स्कूलों का क्या माहौल होगा? अपने अधिकारों की रक्षा करना जहां जरूरी है वहीं जिन बच्चों के लिए हम इस क्षेत्र में आए हैं उनके अधिकारों की रक्षा करना भी तो शिक्षक समाज का ही दायित्व है। यदि ये संगठन आवाज नहीं उठाएंगे तो क्या प्रमोशन नहीं होगी? शिक्षकों को वेतन नहीं मिलेगा? यह मात्र कोरी राजनीति है जिससे न तो शिक्षक समाज का भला हो रहा है व न ही उन बच्चों का जिनकी डोर इनके हाथों सौंपी हुई है।
आज समय की मांग है ऐसी शिक्षक राजनीति पर लगाम लगे। मुझे याद है माननीय मुख्यमंत्री जी का भरी जनसभा में दिया वह वक्तव्य जिसमें उन्होंने कहा था कि मेरे पीछे-पीछे दौड़ने की जरूरत नहीं है स्कूलों में जाकर पढ़ाई पर ध्यान दो आपकी जो समस्याएं हैं वह उनसे भलीभांति परिचित हैं। कुछेक को मेरी यह बात रास नहीं आएगी लेकिन यह उनको रास नहीं आएगी जिनको अपने कार्य के सिवा राजनीति में ज्यादा दिलचस्पी है। आज टैक्नोलॉजी का युग है सरकार ने प्रत्येक समस्या के समाधान के लिए तकनीकी साधन उपलब्ध करवाए हैं जिनसे आप घर बैठे अपनी समस्या का समाधान कर सकते हो करवा सकते हो। इसी कड़ी में मेरी सरकार व विभाग से अपील है शिक्षकों की समस्याओं के लिए एक ऐसा पोर्टल तैयार किया जाए जिसमें प्रत्येक शिक्षक अपनी समस्या घर या स्कूल में बैठे हुए भी सामने रख सके तथा उस समस्या का निर्धारित समय के बीच समाधान करने का भी प्रावधान हो फिर वह चाहे पदोन्नति की बात हो किसी की वेतन विसंगतियों की बात हो,अन्य वित्तीय लाभों की बात हो, शिक्षकों के नियमितीकरण मुद्दे की बात हो, या फिर शिक्षा की बेहतरी के लिए कोई कार्य योजना। इस ढंग से जहां प्रत्येक शिक्षक बिना किसी भय के अपनी समस्या को विभाग व सरकार के सामने रख पाएगा वहीं दिन ब दिन शिक्षा को राजनीति का अखाड़ा बना रहे ऐसे शिक्षकों पर भी लगाम लग पाएगी और शायद तभी हम शिक्षा व शिक्षक के स्तर को उपर उठा पाएंगे।
राजेश वर्मा (बलद्वाड़ा-मंडी)

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