ईनामी सम्मान, शिक्षा व शिक्षक .... जगदीश बाली

ईनामी सम्मान, शिक्षा व शिक्षक
हाल ही में प्रदेश सरकार ने मुख्यमंत्री शिक्षक सम्मान योजना को मंजूरी दी है। इन योजना के तहत पांच वर्षों तक बोर्ड की परीक्षाओं में 100 फीसदी परिणाम देने वाले गुरुओं को एक वर्ष का सेवा विस्तार मिलेगा। इसके साथ ये भी कहा जा रहा है कि लगातार तीन वर्षों तक वेहद खराब परिणाम देने वाले गुरुओं की सैलाना मिलने वाली वित्तीय बढ़ौतरी को भी रोका जा सकता है। वैसे शिक्षक दिवस पर मिलने वाले सम्मान के अतिरिक्त भी सौ फ़ीसदी परीक्षा परिणाम देने वाले विद्यालयों को भी सम्मनित किया जाता है। जब सरकार शिक्षकों को उनकी सेवाओं के लिए अच्छी खासी तनख्वाह देती है, तो जाहिर है सरकार शिक्षकों से अच्छे शैक्षणिक कार्य व परिणाम की तबकको भी रखती है। अच्छे परिणाम के लिए अध्यापकों को नवाज़ा जाना और खराब परिणाम के लिए जवाबदेही तय करना भी नाज़ायज़ नही है क्योंकि घटते शिक्षा के स्तर के लिए सरकार की अपनी भी तो जनता के प्रति जवाबदेही होती है। सैद्धांतिक तौर पर लगता है यह नीति बेहतर परीक्षा परिणाम के लिए शिक्षकों को प्रोत्साहित ज़रूर करेगी, परन्तु ज़रा ज़मीनी हकीकत से भी रूबरू हो लेते हैं।
    माना जा सकता है कि संस्कृत, ड्रॉइंग, शारीरिक शिक्षा जैसे विषयों में तो लगातार पांच वर्ष तक सौ फीसदी परिणाम आ भी सकता है, परन्तु अंग्रेज़ी, गणित, विज्ञान संकाय में ऐसा करना एक अज़ीम कारनामा होगा। बात एक वर्ष की होती तो बात कुछ बन भी सकती थी, परन्तु मौजूदा ग्रेडिंग प्रणली के चलते जो स्तर बोर्ड की 10वी और 12वी कक्षा के छात्रों का है, उसे देख कर लगता है इन विषयों में लगातार पांच वर्षों तक सौ फीसदी परिणाम देना परियों की कहानी जैसा है। प्रदेश सरकार स्वयं भी लंबे समय से ग्रेडिंग प्रणाली को शिक्षा के गिरते स्तर के लिए एक अहम कारण मानती है और केंद्र से मांग भी करती आयी है कि पास और फ़ेल प्रणाली पुन: आरंभ की जाए। यदि प्राथमिक व माध्यमिक स्तर पर परिणामों का आंकलन किया जाए तो ही आगे चल कर बोर्ड की परीक्षाओं में कोई बेहतर परिणाम आ सकते हैं। यदि पांचवी और आठवी स्तर तक ऐसी शिक्षक सम्मान योजना को लाया जाए, तो इस योजना की प्रासंगिकता और बढ़ जायेगी। सोने पर सुहागे वाली बात तब होगी जब शिक्षक सम्मान योजना के साथ प्राथमिक व माध्यमिक स्तर पर भी बोर्ड की परीक्षाएं पुरानी पास-फ़ेल की तरज़ पर पुन: शुरु की जाए। यदि दसवी व बारहवी की बोर्ड परीक्षाओं में अच्छा परीणाम आने पर शिक्षकों को नवाज़ा जा सकता है और खराब परिणामों के लिए लताड़ा जा सकता है, तो पांचवी व आठवी में ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता? वास्त्तव में प्राथमिक व माध्यमिक स्तर पर जब अच्छा परिणाम आयेगा तो आगे चल कर अच्छे परिणाम की संभावना बढ़ जायेगी। निचले स्तर पर रही आधारभूत कमियों को 10वी व 12वी कक्षाओं को पढ़ाने वाले अध्यापक आखिर कहां तक पूरी कर सकते हैं और उन्हें इन कमियों के लिए क्यों दोषी माना जाए?
    माना जा सकता है कि सौ फ़ीसदी परीक्षा परिणाम देने वाला अध्यापक बेहतर है, परन्तु ये देखना भी ज़रूरी है कि ये परिणाम वास्तव में वर्ष भर की मेहनत का नतीज़ा है या फ़िर कुछ और। इस बात से भी तो इंकार नहीं किया जा सकता कि सौ फ़ीसदी परिणाम वर्ष भर निठल्ले रहने वाले शिक्षक परीक्षा भवन में मात्र तीन घंटे तक सक्रीय रह कर भी तो दे सकते हैं। ऐसा भी हुआ है कि जिन विषयों के पद खाली पड़े रहे, उन विषयों में भी सौ फ़ीसदी परीक्षा परिणाम आया। मैं ये तो नहीं कह रहा हूं कि प्रदेश के सभी परीक्षा केंद्रों पर बेथाशा नकल होती है, पर ऐसे केंद्र भी कम नहीं जहां बिना रोक-टोक के यह अनैतिक प्रक्रिया चलती है। ऐसे केंद्रों पर उड़न दस्ते या तो पहुंचते नहीं, अगर पहुंचते हैं तो चाय की चुस्कियों के साथ बिस्किट व पकौड़ों का आनंद लेने के बाद वे ये कह कर निकल लेते हैं - कौन पचड़े में पड़े, हमें क्या पड़ी है! सौ फ़ीसदी परीक्षा परिणाम ले कर ईनाम पाने की हसरत या खराब परिणाम आने का डर, कई अध्यापक इस तरह के हथकंडे अपनाने से भी गुरेज़ नहीं करेंगे। हां, यदि बोर्ड परीक्षा केंद्रों पर सी सी टी वी कैमरे लगा देता है तो शायद बात कुछ बन सकती है।
    सौ फ़ीसदी परिणाम ऐसा आंकड़ा है जो सुनने औए सुनाने में बहुत अच्छा लगता है, परन्तु हमेशा ज़रूरी नहीं कि ऐसा परिणाम न देने वाला अध्यापक अपना कार्य बेहतर ढंग से नहीं कर रहा। बहुत से शिक्षक हैं जो सही मायनों में बेहतर शिक्षक होने का फ़र्ज़ बखूबी अदा कर रहे हैं। ये अलग बात है कि मौजूदा शिक्षा प्रणली और ब्यवस्था के चलते उनकी कर्मठता व कर्तब्य निष्ठा किसी अनजान कोने में सिमट कर रह गयी है। सता के गलियारों तक उनके कार्य की आवाज़ नहीं पहुँच रही है न ही सत्ता के गलियारों का रास्ता उन तक पहुँचता है। वह कहीं दूर किसी स्कूल के छोटे से कोने में गुमनामी में भी अपने कार्य का निर्वाह कर रहा है। इस गुमनामी में अपने कर्तब्य का पालन करते हुए उसे ये चाह भी नहीं है कि उसे किसी अध्यापक दिवस पर नवाज़ा जाए और उसे कोई सेवा विस्तार मिले। वह तो बस अपना कार्य कर रहा है। उसे डर है जिस दिन वह भी ईनाम की कतार में शामिल हो जाएगा तो शायद उसका उद्देश्य बेहतर शिक्षा देना नहीं बल्कि ईनाम रह जाएगा। दूसरी और ऐसे गुरुओं की भी कमी नहीं है जो सत्ता के गलियारों से जुड़े रहने का हुनर जानते हैं और अक्सर विभागों या सरकार द्वारा किसी अध्यापक दिवस पर नवाज़े भी जाते हैं। उनके ईनामों के पीछे हकीकत कम व अफ़साना ज़्यादा होता है।
    नि:संदेह मुख्यमंत्री शिक्षक सम्मान जैसी योजना सरकार की चिंता व गंभीरता को तो दर्शाती है। यदि इस योजना को प्राथमिक स्तर से उच्च स्तर तक पुख्ता ढंग से अम्ल में लाया जाए तो यह अधिक प्रासंगिक और कारगर साबित हो सकती है। वैसे विभाग को अंग्रेज़ी, गणित व विज्ञान संकाय में सौ फ़ीसदी परिणाम देने वाले शिक्षकों को नवाज़ने के साथ उनकी एक कार्यशाला भी आयोजित करनी चाहिए जिसमें ये हुनरमंद शिक्षक बाकि शिक्षकों को भी सौ फ़ीसदी परिणाम पाने का राज़ और गुर बताएं। आखिर बाकि शिक्षक भी तो जाने कि सौ फ़ीसदी परिणाम क्या बला है।

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