लेखक, कुमारसैन, शिमला

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( जगदीश बाली लेखक, कुमारसैन, शिमला से हैं )
कई झमेलों के चलते तालीम के बिगड़े हुए हुलिए को सुधारने के लिए निरीक्षण सैल भले ही रामबाण औषधि नहीं है, परंतु यह एक ठोस व बड़ा कदम है। विडंबना यह है कि हमारे देश में कदम तो ठोस होते हैं, पर कई बार इतने ठोस होते हैं कि या तो उठने में लंबा समय लग जाता है या फिर उठते-उठते रह जाते हैं…
प्रदेश के विद्यालयों को नियमित निरीक्षण की किस कद्र दरकार है, इस बात का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि यदा-कदा आला अधिकारियों द्वारा सरकारी विद्यालयों का औचक निरीक्षण किया गया, तो उस दौरान अकसर कई अध्यापक अपनी ड्यूटी से नदारद पाए जाते रहे हैं। ऐसा ही एक मामला कुछ समय पहले सामने आया, जब शिमला के जिलाधीश महोदय ने एक सरकारी विद्यालय का औचक निरीक्षण किया और विद्यालय के मुखिया सहित छह अध्यापकों को नदारद पाया। एक साथ किसी एक विद्यालय से इतने सारे गुरुजनों का गायब रहना, वह भी मुखिया सहित, शिक्षकों के काम करने के तौर-तरीकों और कर्त्तव्यनिष्ठा पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है। हालांकि ऐसे औचक निरीक्षण यदा-कदा ही होते हैं, परंतु यदि इस तरह के निरीक्षण नियमित रूप से होते रहें, तो ऐसे मामलों की संख्या ज्यादा नहीं तो सैकड़ों में तो हो ही सकती है।    आदत कहो या बीमारी, इस प्रवृत्ति पर नकेल कसने के लिए सरकार भी कमर कस रही है। जहां प्रदेश के कई स्कूलों में बायोमीट्रिक मशीन लगने के शुरुआती दौर की कसमसाहट व नानुकर से उबर कर शिक्षक समयबद्ध होते नजर आ रहे हैं, वहीं प्रदेश सरकार शिक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद रखने के लिए निरीक्षण सैल के गठन को काफी पहले मंजूरी दे चुकी है। आजकल शिक्षा विभाग 94 लोगों वाले इस सैल के गठन की कवायद में जुटा है। शायद सरकार समझ चुकी है कि आरएमएसए और एसएसए के चिंताजनक नतीजों के पीछे सशक्त निगरानी व्यवस्था का न होना एक बहुत बड़ा कारण रहा है। इन परियोजनाओं को कार्यान्वित करवाने के लिए कागजी आदेशों का ज्यादा सहारा लिया गया और जमीनी हकीकत की ओर तवज्जो कम ही दी गई। दावे कुछ और थे, नतीजे उससे उलट कुछ और, क्योंकि कागजी घोड़ों को दौड़ाना अलग बात है और असली घोड़ों को दौड़ाना कुछ और बात। इस बार लगता है, साहब लोग संजीदा हैं।
निरीक्षण सैल इसलिए भी प्रासंगिक है, क्योंकि आज आला अफसरों को स्कूलों के निरीक्षण की फुर्सत बमुश्किल मिलती है, क्योंकि विभाग भी तो इतना विस्तृत है। कभी-कभार निरीक्षण के लिए अगर वक्त निकाल भी लेते हैं, तो सिर्फ तभी अगर कोई शिकायत आलाकमान तक पहुंचती है। पूरे सत्र भर ये जानने की जहमत नहीं उठाई जाती कि अमुक विद्यालय में पठन-पाठन का कार्य सही मायनों में चल रहा है या नहीं। वर्ष भर कुंभकर्णी नींद में सोये रहना, परिणाम आने पर चौकन्ने हो जाना और शत-प्रतिशत परिणाम की तमन्ना तर्कसंगत नहीं जान पड़ती। शॉर्टकट हल से सौ फीसदी नतीजा पाने की हसरत में कई दूसरी समस्याएं खड़ी हो सकती हैं, जो अक्लमंदी नहीं, क्योंकि किसी घर की रोशनी की खातिर किसी के घर नहीं जलाए जाते। शैक्षणिक माहौल को दुरुस्त करना हालांकि आसान सफर नहीं जान पड़ता, फिर भी निरीक्षण सैल की स्थापना सरकार की नेक मंशा की ओर इशारा जरूर कर रही है। यह सैल अपने मंतव्य व गंतव्य को साध पाएगा या नहीं, यह अभी कहा नहीं जा सकता, क्योंकि अकसर हम नए फैसलों और नीतियों का जोशोखरोश के साथ बखान और आगाज तो कर लेते हैं, परंतु जमीनी हकीकत में नतीजा रहता है वही ढाक के तीन पात।
निरीक्षण सैल की स्थापना व हर विद्यालय में बायोमीट्रिक मशीनों से हाजिरी, ये दोनों कदम इस बात के द्योतक हैं कि सरकार और शिक्षा के आलमबरदार मन में यह बिठा चुके हैं कि गुरुजी अपने कर्त्तव्य के प्रति कोताही बरत रहे हैं। पर क्या सभी ऐसे हैं? हरगिज नहीं। अहम होगा कि अन्य कमियों के अलावा क्या निरीक्षण सैल नकर्मे गुरुओं की निशानदेही कर उन्हें राह पर ला पाएगा। अगर यह ऐसा नहीं कर पाता तो इसकी भी जवाबदेही तय हो, क्योंकि 94 लोगों की तैनाती का कुछ तो औचित्य हो। और हां, निरीक्षक महोदय, रपट जरा ध्यान से बनाइएगा, क्योंकि कहीं गुरुओं की निगहबानी के चक्कर में सैल जांच रपट की फाइलों में उलझ कर न रह जाए। निरीक्षण सैल गुरुओं को कसने में कामयाब हो भी गया, तो भी इसके अलावा हमारी शिक्षा व्यवस्था में कई और मुश्किलें भी हैं। ‘पप्पू पास हो गया’ वाली नीति, जो शिक्षा और शिक्षक के लिए सिरदर्द बनी हुई है, से कब मुक्ति मिलेगी? अध्यापक को कागजों में मगज खपाई से कब छुट्टी मिलेगी? जनगणना, पशुगणना, चुनाव, कब इन सब से छूट कर गुरुजी सिर्फ पप्पुओं की सुध ले पाएगा? ज्यादा देर ठीक है, देर कहीं ज्यादा ही न हो जाए :
अब तो इस तालाब का पानी बदल दो, ये कमल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।

इतने सारे झमेले के चलते तालीम के बिगड़े हुए हुलिए को सुधारने के लिए निरीक्षण सैल भले ही रामबाण औषधि नहीं है, परंतु यह एक ठोस व बड़ा कदम है। इसके पीछे सोच और मंशा सकारात्मक है।  विडंबना यह है कि हमारे देश में कदम तो ठोस होते हैं, पर कई बार इतने ठोस होते हैं कि या तो उठने में लंबा समय लग जाता है या फिर उठते-उठते रह जाते हैं। आशा है हर स्कूल में बायोमीट्रिक मशीन लगने के साथ-साथ निरीक्षण सैल जल्द ही काम करना आरंभ कर देगा। पहला-पहला जाम है, साहब! जरा संभल कर।

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