मैं अमन पसंद हूं, मेरी छत पर तिरंगा रहने दो... जगदीश बाली

मैं अमन पसंद हूं, मेरी छत पर तिरंगा रहने दो...
हमारे देश की विडंबना है कि इसने विश्व को तो ’वसुधैव कुटुम्बकम’ का संदेश दिया, परन्तु यह स्वयं समय-समय पर मज़हबी कट्टरवाद का शिकार होता रहा है। चंद फ़िरकापरस्त ताकतें धर्म के नाम पर इस मुल्क को तार-तार करने की नपाक कोशिश करते ही रहते हैं। बंटवारे के बाद भी देश धार्मिक उन्माद के अंगारों में सुलगता ही रहा है। आजकल बंगाल के कई ज़िलों से सांप्रदायिक दंगों की आवाजें सुनाई दे रही हैं। उधर ज़िहाद के नाम पर लगातार देश में दहशतगर्दी फ़ैलायी जा रही है और कश्मीर में आज़ादी का उन्माद भरा जा रहा है। 1990 में धर्म के ठेकेदारों ने जो तांडव मचाया उसमें काश्मीरी पंडितों के साथ जो कुछ हुआ, वो ज़ुल्म की इंताह की दास्तान को ब्यान करते हैं। लाखों पंडितों को अपने घर-बार छोड़ कर प्लायन करना पड़ा था। 27 फ़रवरी 2002 को गोधरा रेलवे स्टेशन पर साबरमती ट्रेन के एस-6 कोच अग्निकांड में 59 लोगों की मौत के बाद जो साम्प्रदायिक दंगे की ज्वाला गुजरात में भड़की उसने हज़ारों लोगों को अपना ग्रास बनाया था। पंजाब में जब खालिस्तान की मांग उठी तो यह खूनी लड़ाई अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में ऑपरेशन ब्लू स्टार से होते हुए 31 अक्तूबर 1984 को देश की प्रधान मंत्री इंदिरा जी की हत्या तक जा पहुची। उसके बाद भड़के सिक्ख विरोधी दंगों ने लगभग 3000 लोगों को अपना शिकार बनाया था। इस आग में न जाने कितने घर सुपूर्दे खाक हुए हैं। 
वास्तव में धर्म के नाम पर इतना खून बहाया गया है कि भविष्य में रोने के लिए आंसू भी नहीं बचेंगे। कहीं कोई अस्पताल में पड़ा लहु के चंद कतरों के लिए तरसता है. तो कहीं वही लहू ख़ुदा के नाम पर सड़कों पर बह रह होता है। आज जो मंजर देखने को मिल रहा है, उसे देख कर लगता है कि इंसान कहीं परेशान है और इंसानियत खो गयी है। कहा जा सकता है:
नफ़रतों का असर देखो जानवरों का बंटवारा हो गया, 
गाय हिन्दू हो गई और बकरा मुसलमान हो गया
ये साबरमती के उस संत का देश है जिसने कहा था - आंख के बदले आंख एक दिन विश्व को अंधा बना देगा। उन्होंने सत्य और अहिंसा के रास्ते पर चलते हुए देश को बिना खड़ग और ढाल के आज़ादी दिलाने का बीड़ा उठाया था और पूरे विश्व को मानवता का संदेश दिया था। आज हमें मौहब्ब्त के उद्घोष करने की ज़रूरत है क्योंकि संसार को मोहब्बत की रोशनी चाहिए न कि नफ़रत का स्याह अंधेरा। हम इस दुनिया को प्यार-मौहब्बत से एक अचछी जगह बनाने आए हैं, इसे विनाश के गर्त में धकेलने के लिए नहीं। 
जब मनुष्य का जन्म होता है, तो वह ‘अल्ला हू अकबर‘ या ‘हर हर महादेव‘ का सिंहनाद करते हुए इस दुनिया में अवतरित नहीं होता। किसी पर भी ये ठप्पा नहीं लगा होता कि अमूक व्यक्ति हिंदू, मुसलमान, सिक्ख या ईसाई होगा। कोई इस तरह की चिप्पी भी नहीं लगी होती कि ये गोरा, ये काला, ये सांवला, ये निम्न जात का, ये ऊंची जात का। ख़ुदा ने तो इंसान पैदा किया है और वो भी एकदम बराबर, परन्तु वो खुद ही बंट गया - कोई बन गया हिंदू, कोई सिक्ख, कोई मुसलमान, कोई ईसाई, कोई ढीमका, कोई फ़्लां। हम इस संसार में उसके बंदे के रूप में आते हैं। मानव की एक ही जात है - इंसानियत और एक ही मज़हब है - मोहब्बत।
न हमें ख़ुदा ने बांटा, न हमें प्रकृति ने बांटा। चांद का कोई मज़हब नहीं, ईद भी उसकी मनाई जाती है और करवा चौथ भी। ऐसा नहीं होता कि सूर्य की किरणें किसी पर मधम और किसी पर तेज़ पड़ती हैं और वर्षा की बूंदें किसी पर बरसती हैं और किसी को अछूता रख देती है। रिलायंस हो या वोडाफ़ोन, कोई ऐसा नेटवर्क नहीं जो गोरे रंग वालों को बढ़िया और काले रंग वालों को घटिया सिगनल देते हैं या हिंदुओं के लिए बढ़िया चलते हैं और मुसलमानों के लिए रुक जाते हैं। फ़िर इंसान ने इंसान क्यों बांट रखा है? संत कबीर कहते हैं: 
अव्वल अल्लाह नूर उपाया, कुदरत दे सब बन्दे,
एक नूर ते सब जग उपज्या कौन भले कौ मंदे 
धर्म कभी भी नहीं टकराते, टकराती तो वहशत है, टकराती तो संगदिली है। उर्दू शायर इकबाल ने बहुत ख़ूब कहा है - मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना। सद्भाव सभ्यताओं को जोड़ता है, राष्ट्र को बनाता है। ये सभी धर्मों के उसुलों के विरुद्ध है कि जाति, धर्म और रंग के आधार पर किसी का हक छीनें, किसी को अपमानित करे और किसी का कत्ल करें। वहशत और दहशत फ़ैलाने वाले न कुरान के हैं, न गीता के, न गुरुग्रन्थ साहिब के, न बाइबल के। हां, उनका एक धर्म है - नफ़रत और दहशत फ़ैलाना। धर्मांधता की ऐसी ही भट्टियों से निकल कर आते हैं याकूब मेनन, अजमल कसाव जैसे लोग। 
इंद्रधनुष दिलकश इस लिए है क्योंकि इसमें अलग-अलग रंगों का बेहतरीन सामंजस्य है, ठीक उसी तरह हिंदोस्तान की खूबी व खूबसूरती इसकी विभिन्न संस्कृति, धर्म और भाषा में निहित है। इस देश को चॊटी वालों ने, दाढ़ी वालों ने, पगड़ीवालों ने बराबर सींचा है। 
हम एक ही बीज़ से उत्पन्न हुए पौधे हैं। ऐसा कैसे हो सकता है कि आप जड़ से मोहब्बत करें और पेड़ से घृणा? हमारा देश, हमारा संसार तभी सुंदर लगेगा अगर यहां विभिन्न, जाति, रंग और धर्म के लोग भ्रातृभाव से रहें। इस भाव को मन से निकाल दें कि दाढ़ी वाले दहशतगर्द और चॊटी वाले काफ़िर हैं। इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि राष्ट्र सर्वोपरि है। राष्ट्र से ऊपर न आप हैं, न मैं, न मेरा धर्म, न आपका धर्मं। इसलिए सोचो, फ़िर कब सोचोगे? जब सब खाक हो जायेगा, तब सोचेंगे? तो आओ! 'वसुधैव कुटुम्बकम’ और 'सर्वे भवन्तु सुखिनः’ को अपने जीवन का सिद्धांत बना कर एक कल्याणकारी व मज़बूत राष्ट्र बनाने का प्रयास करें:
मैं अमन पसंद हूँ, मेरे शहर में दंगा रहने दो
लाल और हरे में मत बांटो, मेरी छत पर तिरंगा रहने दो

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