रस्म अदायगी का हिस्सा बनता शिक्षक दिवस ------ जगदीश बाली

वास्तव में जब घराट ढीला हो जाता है और गेहूं गिला, तो अच्छी किस्म का आटा नहीं मिल सकता। मतलब यह कि नीति निर्धारक, निर्णायक मंडल, अभिभावकों व अध्यापक सभी का शिक्षा के प्रति दायित्व है। एक-दूसरे पर दोष मढ़ने से कुछ हासिल नहीं होगा
एक बार एक छात्र ने टेस्ट में 10 में से दो अंक लिए। नाराज अध्यापक ने उसके टेस्ट पेपर में नोट लिखा-पूअर चाइल्ड! अगले दिन अध्यापक ने देखा कि उनके नोट के नीचे छात्र के पिताजी ने टिप्पणी की है-शागिर्द की कारकर्दगी से पता चलता है कि उस्ताद कितना काबिल है! भले ही पिताजी की यह टिप्पणी अध्यापक को नागवार गुजरी हो, उसके अहं को ठेस पहुंचाती हो और इस टिप्पणी से वह तिलमिला उठा हो, परंतु काफी हद तक यह हकीकत को ही बयां करती है। जब राजा धनानंद ने चाणक्य को भिक्षा मांगने वाला साधारण ब्राह्मण कहकर जलील किया और अपने दरबार से खदेड़ दिया, तो उसने कहा था-अध्यापक कभी साधारण नहीं होता। निर्माण और विध्वंस उसकी गोद में खेलते हैं। चाणक्य का यह कथन आवेश में कहा गया महज एक सियासी जुमला नहीं था, बल्कि उसने इसे सिद्ध कर दिखाया था। एक हकीर बालक, चंद्रगुप्त को शिक्षित कर उसने नंद वंश का विध्वंस किया और उसे राजगद्दी पर बिठा दिया था।
बेहतर मुल्क के लिए बेहतर तालीम का होना लाजिमी है और बेहतर तालीम के लिए बेहतर शिक्षक लाजिमी है। चिकित्सक, अभियंता, नेता, अभिनेता, राजनेता या कोई बड़े से बड़े पद पर आसीन व्यक्ति क्यों न हो, सभी के पीछे अध्यापक का ही हाथ होता है। विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय देश के भविष्य के लघुचित्र होते हैं। जहां माता-पिता बच्चों का लालन-पालन करते हैं, वहीं अध्यापक उसे तराशने काम करता है। वक्त के बहते दरिया के साथ शिक्षा भी बदली, इसके आयाम बदले, इसकी दिशा और दशा बदली। यह गुरुकुलों और शांतिनिकेतनों से निकलती हुई आज विशाल इमारतों वाले मॉडल स्कूलों तक आ पहुंची है, परंतु इस सारी कवायद में अध्यापक की प्रतिष्ठा का जो कुछ हुआ, वह संतोषजनक कतई नहीं है। इस सफर में उसने बहुत कुछ खो दिया और बहुत कुछ उस से छीन लिया गया। भगवान से भी ऊपर का दर्जा रखने वाला गुरु आज हर किसी की उलाहना का शिकार बन गया। अभिभावक उससे निराश हैं, अफसर नाखुश हैं व सरकारें उस पर भरोसा करने को तैयार नहीं। अगर कुछ बचा है, तो सिर्फ पांच सितंबर यानी अध्यापक दिवस। इस दिन जरूर उसकी गाथाएं गाई जाती हैं, मगर इस रस्म अदायगी के बाद क्या होता है? बस वही उलाहना और प्रताड़ना।
कोई शिष्य अच्छे अंक ले, तो वह शिष्य मेहनती और होशियार और अगर कहीं परीक्षा परिणाम का जायका जरा सा बिगड़ गया, तो गुरुजी नालायक। आखिर ऐसा क्या हुआ कि जिस समाज ने गुरु को ज्ञान का सतत झरना मान कर सिर आंखों पर बैठाया, आज उसी समाज के लिए अध्यापक का जायका क्यों बिगड़ता चला गया? हमारे देश की शिक्षा का जो ढांचा है, उसे देख कर वह कहावत याद आती है, कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा, भानुमती ने कुनबा जोड़ा। दरसल हुआ यह कि भ्रष्ट तंत्र के मार्फत अध्यापन के नेक व्यवसाय में कई किस्म के ऐसे गुरु घुसते चले गए, जिनका इस तंत्र में मंत्र चलता था और जिनका मकसद सिर्फ तनख्वाह लेना रहा। चाहे ऐसे गुरुओं की तादाद बहुत ज्यादा नहीं, पर बहुत कम भी नहीं है। गंदी मछली चाहे एक ही क्यों न हो, तालाब तो सारा गंदा कर ही जाती है और यहां तो कई मछलियां हैं। यहां तक तो फिर भी बात जम सकती थी, क्योंकि यह संभव नहीं कि सभी अध्यापक प्रखर विद्वान हों। निरंतर प्रयास से अध्यापक इस कमी को दूर कर सकता है, परंतु हमारे गुरुओं की खूबी है कि एक बार गुरुजी बन गए, फिर ज्ञान की सारी किताबें बक्से में बंद हो जाती हैं और बक्सा भी ऐसा कि खोले नहीं खुलता। बात यहां भी रुक सकती थी, परंतु अपनी सलाहियत बढ़ाने की बात तो दूर, इन गुरुओं ने अपने कारनामों की जो मिसालें पेश करनी शुरू कर दीं, उनसे समाज में अध्यापक की प्रतिष्ठा का गिरनी ही थी। नशा करना, खुद नशे के कारोबार में शामिल होना, परीक्षाओं में बच्चों को नकल का भरोसा देना, यहां तक कि छात्राओं से दुराचार जैसी घटनाएं भी सामने आने लगीं, जिन्होंने कहीं न कहीं उन गुरुओं की प्रतिष्ठा व आबरू को भी दागदार किया है। मन को विषादित करने वाला पहलू यह भी है कि कोई जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं।
वास्तव में जब घराट ढीला हो जाता है और गेहूं गिला, तो अच्छी किस्म का आटा नहीं मिल सकता। मतलब यह कि नीति निर्धारक, निर्णायक मंडल व अध्यापक सभी का शिक्षा के प्रति दायित्व है। एक-दूसरे पर दोष मढ़ने से कुछ हासिल नहीं होगा। मैं-मैं और तू-तू की इस कशमकश में खामियाजा बेकसूर विद्यार्थियों को भुगतना पड़ रहा है। भले ही आज अध्यापक का व्यवसाय कांटों से भरा हुआ है, परंतु इसमें भी कोई शक नहीं कि आज भी बेहतरीन शिक्षकों की समाज कद्र करता है और विद्यार्थी इज्जत। अरस्तु ने एक बार कहा था-जो बच्चे को बेहतर तालीम देता है, उनका सम्मान उनसे भी ज्यादा होना चाहिए, जिन्होंने उन्हें पैदा किया है! निस्संदेह विद्यार्थी अच्छे अध्यापक को हमेशा याद रखता है, परंतु वह बुरे अध्यापक को भी कभी नहीं भूलता।
ई-मेल : jagdishchandbali@gmail.com

सााभार http://www.divyahimachal.com/category/himachal-articles/peoples-opinion/


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