हिमाचल के "अछूत" अनुबंध कर्मी



प्रत्येक इंसान के जीवन मे एक ऐसा पढ़ाव आता है कि उस पढ़ाव को वह अपने जीवन का सबसे सुनहरी काल मानता है और उसी काल मे वह समाज को अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ योगदान देता है और वह काल होता है "युवा काल" और इसे ही जीवन के सुनहरे काल की संज्ञा दी गई है और यह उसकी शिक्षा दीक्षा के बाद प्रारंभ होता है अर्थात जब उसके जीवन मे नौकरी नामक उपहार आता है, मुझे याद है आज भी वो दिन जब हमारे कालेज के प्रोफेसर कहते थे कि जब उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की थी तब की सरकारें नौकरी के लिए घर से बुला कर ले जाती थी परंतु आज के परिपेक्ष मे ऐसी कल्पना ही की जा सकती है बस, अब पहले तो सरकारी क्षेत्र मे नौकरी मिलना मुश्किल है और यदि सरकार के द्वारा बनाई गई चयन प्रक्रिया को पूरा करके कोई नौकरी हासिल कर भी लेता है तो बस वहीं से शुरू हो जाता है उसका वो सुनहरी काल जोकि वर्तमान मे सुनहरी की जगह शोषण काल बन गया है, पढ़े-लिखे युवाओं के पास कोई चारा नही होता हर कोई सरकारी नौकर का टैग लगवाना चाहता है और इसी टैग के चक्कर मे उसे शोषित होने के लिए टाँग दिया जाता है,
ये सच है कि अनुबंध नीति सभी राज्यों मे है परंतु जहाँ कई जगह इसकी शर्ते खून चूसने वाली है तो कई जगह राहत भरी ,

हिमाचल मे अनुबंध नामक ला-ईलाज बीमारी का कीटाणु पैदा किया पिछली भाजपा सरकार ने लेकिन वह नही जानती थी की इसी बीमारी के कारण उसे सत्ता गँवानी पड़ेगी क्योंकि प्रत्येक घर अनुबंध से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप ग्रसित है , जहाँ पिछली सरकार ने भारी दबाव के चलते अनुबंध अवधि को आठ वर्ष से घटाकर छ वर्ष कर दिया परंतु फिर भी समस्याएँ जस की तस बनी रही और इसी कड़ी मे वर्तमान सरकार को अनुबंध कर्मी सत्ता मे तो ले आए परंतु वो समस्याएँ हल नही हो पाईं सरकार ने वादा किया था कि अनुबंध करमीयों को 5 वर्ष के सेवाकाल के बाद नियमित किया जाएगा लेकिन ये वादा भी अनुबंध करमीयों के अथक संघर्ष के बाद सरकार ने अपने तीसरे बजट मे जाकर पूरा किया कहने को तो अनुबंध करमीयों को 5 वर्ष के अनुबंध सेवाकाल बाद नियमित कर दिया जाएगा परंतु यह मात्र सिक्के का एक पहलू है सिक्के का दूसरा पहलू बहुत ही भयानक है जिसमें 31 मार्च की शर्त की आड़ मे अनुबंध करमीयों का जमकर शोषण किया जा रहा है 31मार्च की शर्त की बात की जाए तो इसमें सरकार ने एक कट ऑफ डेट रखी है की प्रत्येक वित्तीय वर्ष मे यदि किसी अनुबंध कर्मी के 31मार्च को 5 वर्ष पूरे होते है तो केवल उसे ही नियमित किया जाता है मतलव यदि कोई 1 अप्रैल को 5 वर्ष का अनुबंध कार्यकाल पूरा करता है तो उसे अगले वर्ष के 31 मार्च का इंतजार करना पड़ेगा मतलव एक दिन की देरी से एक वर्ष तक शोषण और नियमितीकरण बोलने को 5 परंतु हुआ 6 वर्ष बाद,  कहानी यहाँ भी खत्म नही होती 31 मार्च  की घोषणा होने पर उसी अधिसूचना का इंतजार जो कि लगभग 1 महीने तक होता है उसके बाद संबंधित विभागों मे अधिसूचना का पहुँचना उसमें भी लगभग एक और माह का समय अब फिर यही शोषण अपनी चर्म सीमा मे पहुँच जाता है विभागों मे अधिसूचना पहुँचने के बाद शुरू होती है नियमितीकरण की प्रक्रिया और यह प्रक्रिया भी पूरे 4 से 5 माह तक चलती है अब 31मार्च के बाद भी 6 माह का अतिरिक्त समय लग जाता है नियमितीकरण के आदेश होने को इसी तरह कुल अवधि बन जाती है छ वर्ष से भी उपर 1अतिरिक्त वर्ष 31 मार्च तक  , जबकि 6 माह 31 मार्च की अधिसूचना के
बाद का , कुल मिलाकर 6 से 7 वर्ष के बीच नियमितीकरण तब 5 का क्या औचित्य, क्यों सबके लिए अनुबंध कर्मी "अछूत" बने हुए है
यह 31 मार्च की शर्त भी पिछली सरकार की देन थी परंतु वर्तमान सरकार पिछली सरकार का बहाना लगाकर अपना पल्ला नही झाड सकती क्योंकि उसे ऐसी नीतियों के कारण बाहर जाना पड़ा अब दायित्व बनता है ,

 मै एक अनुबंध कर्मी होने के नाते भी अपनी सरकारों से यही पूछना चाहता हू कि अगर 5 वर्ष का वादा है और नियमितीकरण की नीति 5 वर्ष की है तो फिर ये 1 से डेढ़ वर्ष का अतिरिक्त समय क्यों ? आखिर ये शोषण किस कारण, वर्तमान सरकार कहती है ये शर्त हमनें नही थोपी सही भी है , ये शर्त पिछली भाजपा सरकार का तोहफा था अनुबंध की शुरुआत भी और 31 मार्च जैसी अन्याय पूर्ण शर्ते भी लेकिन उसे अपनी करनी सत्ता से बाहर होकर भुगतनी पड़ी परंतु क्या इसी बहाने के साथ वर्तमान कांग्रेस सरकार भी आगे बढ सकती है कि ये पिछली सरकार की देन है अगर पिछली सरकार की देन है तो क्या वर्तमान सरकार का दायित्व नही बनता की वह अपने 5 वर्ष के वादे को बिना 31मार्च की अन्याय पूर्ण शर्त लगाए लागू कर सके  ताकि प्रदेश के अनुबंध कर्मी किसी पर तो भरोसा कर सकें और हजारों शोषित अनुबंध करमीयों को राहत मिल सके , जिसके लिए तमाम अनुबंध कर्मी लंबे समय से संघर्षरत है ,

ये प्रदेश के वे अनुबंध कर्मी है जो सरकार द्वारा निर्धारित भर्ती एवं पदोन्नति नियमों को पूरा करके चयन बोर्ड व लोक सेवा आयोग द्वारा चयनित होकर अनुबंध की दलदल मे आते है , ये वही अनुबंध कर्मी है जिसको अन्य नियमित करमीयों की तुलना मंहगाई भत्ते के नाम पर फूटी कौडी तक नही मिलती , ये वही अनुबंध कर्मी है जो चाहे खुद गंभीर बिमारीयों से या इसका परिवार घिर जाए परंतु इसको चिकित्सा भत्ते के नाम पर कुछ भी नही मिलता , ये वही अनुबंध कर्मी है जिसको घर से सैकड़ों मील दूर रहने पर भी आवास भत्ता नही मिलता , ये वही अनुबंध कर्मी हैं जो बिना नियमित हुए सेवानिवृत्त हो जाता है , ये वही अनुबंध कर्मी है जो कभी पैशन का मुँह नही देखेगा, ये वही अनुबंध कर्मी हैं जिससे काम तो पूरा लिया जाएगा परंतु मेहनताना अन्य की तुलना एक चौथाई दिया जाएगा , ये वही अनुबंध कर्मी है जिसके लिए कोई भी संगठन आवाज नही उठाएगा अगर कोई अन्य संघ उठाएगा तो पहले अपना फायदा ढूँढेगा और वहीं अगर अनुबंध कर्मी खुद आवाज उठाएगा तो ऐसै संगठन ही उसे डरा धमका कर चुप कराने की कोशिश करेंगे या अनुबंध करमीयों को राजनीति का शिकार बना दिया जाएगा ,लेकिन अब यही अनुबंध कर्मी जाग चुका है उठ चुका है चल पड़ा है और लगा है उसी "सुनहरी काल" को पाने जो व्यवस्था के हाथों "शोषित काल" मे बदल गया है , 

राजेश वर्मा




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