कागजी शिक्षक प्रशिक्षण के भरोसे शिक्षा ---- ड़ा मामराज पुंडीर

देश में प्राथमिक व उच्च प्राथमिक शिक्षा का भारी विस्तार हुआ है । इस विस्तार में सर्व शिक्षा अभियान , मध्याह्न भोजन , राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान, शिक्षा का अधिकार अधिनियम यानि 6-14 साल की आयु के बच्चो को अनिवार्य तथा नि:शुल्क शिक्षा प्राप्त करने के अधिकार ने विशेष योगदान दिया है । इसके बाबजूद आज भी ग्रामीण व शहरी क्षेत्रो में प्राथमिक व उच्च प्राथमिक शिक्षा आजादी प्राप्ति के समय जितनी ही निराशाजनक दिखती है। स्कूलो की संख्या व भौतिक सुविधाए पूर्वापेक्षा बढ़ी है। कई राज्यो में सरकारी स्कूलों मे छात्रों की संख्या में वृद्धि हुई है और कई राज्यो में हालत चिंता जनक है और हिमाचल प्रदेश के हालत भी उन राज्यो से मिलते है जिनकी छात्रों की संख्या सरकारी मे भारी गिरावट देखी गई है । सरकार के द्वारा किए प्रयासो के वावजूद शिक्षा का स्तर उठना उपेक्षित था। यह संभव नही हो सका। वस्तुत: इन स्कूलों मे दी जा रही तथा छात्रों द्वारा ग्रहण की जा रही शिक्षा का स्तर चिंतनीय हो रहा है। हाल ही मे प्रकाशित अनेक प्रतिवेदन इस निराशा जनक हालत को उजागर करते है । आर्थिक विकास व सहयोग के संगठन (यूईसीडी) द्वारा 73 देशो के छात्रों में पढ़ने व गणित की प्रतियोगिता में हिमाचल व तमिलनाडू जैसे शैक्षिक दृष्टि से उन्नत समजे जाने वाले राज्यो से चयनित छात्रों का प्रदर्शन निम्न स्तरीय रहा था। वे 73 देशो की प्रतियोगिता में 72 वा स्थान ही प्राप्त कर सके। हैरानी की बात है कि ALM (एक्टिव लर्निंग मेथोड़ोलोगी) को सीखने के लिए हिमाचल प्रदेश से भी एक अध्यापको का झुंड तमिलनाडू गया था और उसे स्कूल तक लागू करने की कोशिश की गई थी । परंतु तमिलनाडू से एएलएम के गुण सीख कर आए अध्यापक राज्य मे शायद ही कही रीसौर्स पर्सन का काम किया होगा ,यह चिंता का विषय है। उसके साथ ही एक प्रमुख गैर सरकारी संगठन 'प्रथम' जो प्रति वर्ष प्राथमिक शिक्षा की स्थिति पर व्यापक सर्वे के पश्चात प्रतिवेदन प्रस्तुत करता है, ने अपने 7 वे` वार्षिक प्रतिवेदन में छात्रों की पढ़ने, लिखने, जोड़ने और घटाने की क्रिया मे चिंतनीय गिरावट दर्शाती है और हिमाचल में तो हालत इतने चिंतनिए है कि पाँचवी में पढ़ने वाले बच्चे दूसरी कक्षा का गणित और 8 वी मे पड़ने वाला बच्चा 5 वी कक्षा का गणित पढ़ने मे असमर्थ दिख रहा है। इस सर्वे का कुछ हिमाचल के सरकारी स्कूलों के अध्यापक संगठन ने विरोध भी किया ,परंतु विरोध करने से पहले सोचना चाहिए कि आखिर इस गिरावट की वजय क्या है। छात्रों मे 2006 व 2010 की तुलना में उल्लेखनिए गिरावट आई है। अनेक प्रकरणो में फर्जी नामांकन, सरकारी स्कूलों में नामांकन के साथ साथ निजी स्कूलों में भी प्रवेश के प्रकरण सामने आए है । स्कूल जाने को प्रेरित करने के लिए अनेक सुविधाए प्रदान की जा रही है । इन सुविधायों का अनेक बार लाभ लेने के लिए एक से अधिक स्कूलों में दाखिला लेने की प्रवर्ती दृष्टिगोचर हुई है । सर्व शिक्षा अभियान , शिक्षा का अधिकार के क्रियान्वयन पर भारी धनराशि खर्च की जा रही है । परंतु इन सभी के सार्थक परिणाम नही आ पाना चिंता का विषय है। शिक्षा पर निरंतर बढ़ता खर्च गिरते हुए स्तर को थामने मे असमर्थ है`। बढ़ी हुई शैक्षिक सुविधाए बच्चो को स्कूल लाने में तो समर्थ हुई है । परंतु कैसी शिक्षा दी जा रही है? किसके द्वारा दी जा रही है ? छात्र प्रवेश लेने के साथ साथ विध्यालयो मे कितने समय तक छात्र विद्यालय मे रुकते है ?क्या स्कूल का वातावरण बच्चो को सम्पूर्ण समय तक स्कूल मे बनाए रखने लायक है । ये सभी ऐसे प्रश्न जिन पर गंभीर विचार होना चाहिए। प्राथमिक और उच्च प्राथमिक शिक्षा की निरंतर मॉनिटरिंग जरूरी है । क्योकि अध्यापको का स्कूलो से गाएब रहना सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है। हालात इस लिए भी चिंतनिए है कि कई रसूख दार अध्यापक तो स्कूल सिर्फ महीने में ही जाते है। जिसका रिकॉर्ड सरकार के पास होता है। दूसरा विभाग के अधिकारियों का नकारात्मक व्यवहार भी शिक्षा के इस स्तर को बर्बाद करने में तुला है। हाल ही में शिक्षा के उच्च अधिकारी ने सोलन में सर्व शिक्षा अभियान को सेर सपाटा अभियान कहा था और ऐसे शब्दो का उपयोग उस समय किया जब सोलन के प्रिन्सिपल और मुख्याध्यापक की वैठक को संभोदित कर रहे थे। सरकार को स्कूलो में हो रही गैरहाजिरी को रोकने के कड़े कदम उठाने के साथ साथ इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि प्राथमिक व उच्च प्राथमिक शिक्षा ही वह मूलाधार है जिस पर सम्पूर्ण सेकेन्डरी व उच्च शिक्षा व सम्पूर्ण शैक्षिक भविष्य निर्भर करता है। 
प्राथमिक व उच्च प्राथमिक शिक्षा के गिरते स्तर पर ध्यान देने पर शिक्षा व्यवस्था की अनेक कमियों पर ध्यान जाता है। शिक्षा सुविधाओ के विस्तार के अनुरूप शिक्षकों की नियुक्ति नही की जा रही है। नियमित एव प्रशिक्षित शिक्षको के स्थान पर अनेक कार्ये को नापसंद करने वाले अप्रशिक्षित व्यक्तियों को शिक्षण दायित्व दिया जाना एक प्रमुख बाधक है। वर्तमान में मूल्यांकन की व्यवस्था भी गिरते स्तर में बड़ा योग देती है हिमाचल जेसे अनेक राज्य में कक्षा 1 से 8 वी परीक्षा पास फेल के तनाव से मुक्ति शिक्षा के अधिकार के अनुसार तो सही हो सकती है परंतु वास्तव में छात्र को अगली कक्षा में ले जाने के सिवाए कुछ नहीं क्योकि न तो अध्यापक इस नीति को ध्यान से कर रहे है न ही छात्र पड़ने में रुचि ले रहे है। सतत समग्र मूल्यांकन को लागू करना जहा अध्यापको ने ही विरोध किया वही बच्चो को इसके फायदे बताने में असमर्ध रहे। इसकी सफलता के लिए शिक्षको का छात्रो से अति निकट संपर्क व संवाद अति आवश्यक है। परंतु भारत में शिक्षको से शिक्षण के अलावा अनेक प्रकार के सामान्य निर्वाचन से लेकर जनगणना, मिड डे मील से लेकर अनेक प्रकार की सूचनाव को इकट्ठा करना, आदि में भी शिक्षको को लगाया जाता है। जो शिक्षको व छात्रो के बीच निकट संपर्क व संवाद में बाधक है। पाठ्यक्रम आज भी रूढ़िवादी रूप लिए है और बदलते सामाजिक वातावरण के अनुकूल परिवर्तन नही हो पाने से पढ़ाई व स्कूल में रुकना रुचिकर नही रह पाता है। मूल्य आधारित शिक्षा शनै : शनै: समाप्त हो रही है। जिससे छात्रो के समाजोप्योगी व्यक्तितवका विकास नही होने दे रही है। नेशनल कैरीकुलम फ्रेम वर्क 2005 के अनुरूप पाठ्यचर्या का अभाव है। परंतु गिरते स्तर के लिए सर्वाधिक ज़िम्मेवार कमजोर शिक्षक- प्रशिक्षण व्यवस्था है ?
स्कूलो में शिक्षण कार्ये में पारंगत व्यक्तियों को शिक्षक बनने के लिए शिक्षक प्रशिक्षण उपाधि को आवश्यक बताया गया है। शिक्षण मे प्रशिक्षित व्यक्ति बच्चो के मनोविज्ञान को बेहतर समझकर छात्रों के अंदर छिपि प्रतिभा व बौद्धिक संभावनाओ को उजागर करने में असमर्थ होता है। वह अध्यापन को रुचिकर बनाकर छात्रो में पढ़ाई के प्रति आकर्षण बढ़ा सकता है। शिक्षको में एक 'शिक्षकतत्व विधयमान होता है , जो उन्हे छात्रो से स्नेहित व्यवहार करने, अपने आचरण व व्यवहार में छात्रो के लिए आदर्श रोल माडल बनने को प्रेरित करता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षक परीक्षण शिक्षा को नियमित व नियंत्रित तो किया ही जाए, साथ ही शिक्षक परीक्षण में विविधता और गहनता लाई जाए। हिमाचल प्रदेश में तो हाल भूत ही बेहाल है जिसका खामियाजा शिक्षा प्राप्त करने वाले मासूम बच्चो को भुगतना पड़ता है। हिमाचल में जहा राज्य स्तर पर SCERT, जिला स्तर पर DIET और राज्य परियोजना कार्यालय अध्यापको के परीक्षण का काम देखते है वही खंड स्तर पर ट्रेनिंग का प्रोग्राम खंड परियोजना अधिकारी और खंड प्राथमिक शिक्षा अधिकारी के माध्यम से बीआरसीसी करवाते है। परंतु हैरानी की बात है राज्य स्तर पर और जिला स्तर पर किस पप्रकार शिक्षण परीक्षण के लिए रीसौर्से पर्सन तैयार किए जाते है, गंभीर विषय है क्योकि यदि रेसौर्स पर्सन और तैयार करवाने वाले वो होंगे जिन्होने कभी कक्षा में जा कर पढ़ाया नही तो किस प्रकार शिक्षा में गुणवाता आ सकती है। परंतु हिमाचल में जहा सरकारी तंत्र सरकार पर भारी है वही सरकारी स्कूलो में शिक्षा की चिंता भी किसी को नही है। सरकार यदि सरकारी स्कूलो में यदि गुणवाता लाना चाहती है तो सरकारी तंत्र में सुधार लाना होगा, सरकारी स्कूलो में पाँचवी और आठवी कक्षा में बोर्ड की परीक्षा शुरू करनी होगी। अध्यापको द्वारा प्राप्त परीक्षण को सुचारु रूप से कक्षा स्तर तक लागू करने के लिए स्कूलो के मुखिया से लेकर सभी अधिकारियों को भी अपने कर्तव्य का पालन करना होगा। आज हिमाचल की शिक्षा पर बहुत बड़ा खतरा मंडरा रहा है, हिमाचल के शिक्षा को यदि सच में बचाना है तो कागजी शिक्षा से बाहर आकर गुरु बनने का अपने दायित्व को निभाना होगा।
ड़ा मामराज पुंडीर
राजनीतिक शास्त्र प्रवक्ता (हिमाचल प्रदेश)

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