शिक्षा पर बढ़ता खर्च गिरता स्तर, कहां है चूक ----- डा. मामराज पुंडीर, शिमला।

 
हिमाचल में भी पूरे देश की तरह प्राथमिक और उच्च प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में काफी विस्तार हुआ है और इस  

कार्य में सर्व शिक्षा अभियानमध्याह्न भोजनराष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियानशिक्षा का अधिकार अधिनियम (यानि 6-14 साल की आयु के बच्चों को अनिवार्य तथा नि:शुल्क शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार) ने विशेष योगदान दिया है। लेकिन शिक्षा के स्तर में सुधार कहीं दूर-दूर तक भी नजर नहीं आ रहा है। शिक्षा व्यवस्था पर भारी खर्चे के बावजूद इसके स्तर में लगातार गिरावट आना बहुत चिंता का विषय है। 

देश भर में ही स्कूलों की संख्या तथा वहां भौतिक सुविधाएं पहले के मुकाबले काफी बढ़ गई हैं। इससे कई राज्यों में सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या में वृद्धि भी हुई है, लेकिन हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे कई राज्यों में हालत चिंताजनक ही बने हुए हैं। यहां सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ने के बजाए लगातार घटती जा रही है। शिक्षा का स्तर ऊंचा उठाने के लिए सरकार के तमाम प्रयास बेकार साबित होते नजर आ रहे हैं। हाल ही में प्रकाशित अनेक सर्वेक्षण इस निराशाजनक तस्वीर को उजागर कर रहे हैं।
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आर्थिक विकास एवं सहयोग के संगठन (यूईसीडी) द्वारा हाल ही में छात्रों में पढ़ने व गणित की आयोजित विश्व स्तरीय प्रतियोगिता में हिमाचल प्रदेश और तमिलनाडू जैसे शैक्षिक दृष्टि से उन्नत समझे जाने वाले राज्यों का प्रदर्शन काफी निम्न स्तरीय पाया गया है। एक अन्य प्रमुख गैर सरकारी संगठन ‘प्रथम’, जो प्रति वर्ष प्राथमिक शिक्षा की स्थिति पर व्यापक सर्वे के पश्चात प्रतिवेदन प्रस्तुत करता है, ने अपने 7वें वार्षिक सर्वेक्षण में पाया कि हिमाचल प्रदेश में पांचवीं में पढ़ने वाले बच्चे दूसरी कक्षा का गणित और 8वीं में पढ़ने वाले बच्चे 5वीं कक्षा का गणित पढ़ने में असमर्थ दिख रहे हैं। इस सर्वेक्षण रिपोर्ट का प्रदेश में सरकारी स्कूलों के कुछ अध्यापक संगठनों ने विरोध भी किया, परंतु बेहतर होता यदि वे विरोध के बजाए शिक्षा की इस स्थिति पर चिंतन कर सरकार को कोई सार्थक सुझाव प्रस्तुत करते। विभिन्न सर्वेक्षण दर्शा रहे हैं कि यहां स्कूली शिक्षा में वर्ष 2006 और 2010 की तुलना में उल्लेखनीय गिरावट आई है।
कहां है चूकः हिमाचल प्रदेश में कई बार सामने आया है कि सरकारी स्कूलों में फर्जी दाखिले हो रहे हैं। यह भी देखा गया है कि छात्रों का सरकारी स्कूलों में नामांकन के साथ- साथ निजी स्कूलों में भी दाखिला है। सरकारी स्कूलों में दाखिला बढ़ाने के लिए अनेक योजनाएं शुरू की गई हैं, जिनका अनेक बार लाभ लेने के लिए एक से अधिक स्कूलों में दाखिला लेने की प्रवृत्ति भी बढ़ रही है। अध्यापकों का स्कूलों से गायब रहना भी एक बड़ी समस्या है। कई रसूखदार अध्यापक तो स्कूल महीने में सिर्फ एक बार ही जाते हैं।
इसके अतिरिक्त शिक्षा विभाग के कुछ अधिकारियों का नकारात्मक व्यवहार भी शिक्षा के स्तर को गिराने के लिए जिम्मेदार है। हाल ही में शिक्षा विभाग के एक उच्च अधिकारी ने सोलन में सर्व शिक्षा अभियान को सैर सपाटा अभियान कहा था। वे उस समय सोलन में प्रिंसीपल और मुख्याध्यापकों की एक बैठक को संबोधित कर रहे थे।
प्राथमिक और उच्च प्राथमिक शिक्षा के गिरते स्तर पर ध्यान देने पर शिक्षा व्यवस्था की अनेक कमियों पर ध्यान जाता है। शिक्षा सुविधाओं के विस्तार के अनुरूप शिक्षकों की नियुक्ति नहीं की जा रही है। नियमित एवं प्रशिक्षित शिक्षकों के स्थान पर अप्रशिक्षित व्यक्तियों को शिक्षण दायित्व दिया जाना भी एक प्रमुख बाधक है। वर्तमान में मूल्यांकन की व्यवस्था भी इस गिरते स्तर में बड़ा योगदान दे रही है। हिमाचल जैसे अनेक राज्यों में कक्षा1 से 8वीं तक विद्यार्थियों को फेल नहीं करने की नीति बनाई गई है। इससे विद्यार्थी पास- फेल के तनाव से तो मुक्त हुए हैं, लेकिन साथ ही पढ़ाई के प्रति लापरवाह भी। न तो अध्यापक इस नीति को ध्यान से लागू कर पा रहे हैं और न ही छात्र पढ़ने में रुचि ले रहे हैं।
इसके अतिरिक्त यहां शिक्षकों से शिक्षण के अलावा निर्वाचन, जनगणना, मिड डे मील जैसे कार्य भी करवाए जा रहे हैं। इसका भी पढ़ाई पर बुरा प्रभाव पड़ता है। पाठ्यक्रम आज भी रूढ़िवादी रूप लिए हुए हैं। बदलते सामाजिक वातावरण के अनुरूप उनमें परिवर्तन नहीं हो पा रहा है। मूल्य आधारित शिक्षा शनै: शनै: समाप्त हो रही है। इससे छात्रों के समाजोपयोगी व्यक्तित्व का विकास नहीं होने पा रहा। नेशनल कैरीकुलम फ्रेम वर्क 2005 के अनुरूप पाठ्यचर्या का अभाव है। परंतु गिरते स्तर के लिए सर्वाधिक ज़िम्मेवार कमजोर शिक्षक- प्रशिक्षण व्यवस्था ही है।
कुछ विचारणीय बिंदुः स्कूलों में बेहतर शिक्षको की नियुक्ति के लिए शिक्षक प्रशिक्षण उपाधि को आवश्यक बताया गया है। ऐसे शिक्षक ही बच्चों के मनोविज्ञान को बेहतर समझकर उनके अंदर छिपी प्रतिभा व बौद्धिक संभावनाओं को उजागर करने में असमर्थ होते हैं। वे अध्यापन को रुचिकर बनाकर छात्रों में पढ़ाई के प्रति आकर्षण बढ़ा सकते हैं। शिक्षकों में एक ‘शिक्षकतत्व विद्यमान होता है, जो उन्हें छात्रों से स्नेहित व्यवहार करने, अपने आचरण व व्यवहार में छात्रों के लिए आदर्श रोल मॉडल बनने को प्रेरित करता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षक परीक्षण शिक्षा को नियमित व नियंत्रित तो किया ही जाए, साथ ही शिक्षक परीक्षण में विविधता और गहनता लाई जाए। हिमाचल प्रदेश में तो हाल ही बेहाल है, जिसका खामियाजा मासूम बच्चो को भुगतना पड़ता है। हिमाचल में जहां राज्य स्तर पर SCERT, जिला स्तर पर DIET और राज्य परियोजना कार्यालय अध्यापको के परीक्षण का काम देखते हैं, वही खंड स्तर पर ट्रेनिंग का प्रोग्राम खंड परियोजना अधिकारी और खंड प्राथमिक शिक्षा अधिकारी के माध्यम से बीआरसीसी करवाते हैं। परंतु हैरानी की बात है राज्य स्तर पर और जिला स्तर पर किस प्रकार शिक्षण परीक्षण के लिए रिसोर्स पर्सन तैयार किए जाते हैं, यह एक गंभीर विषय है, क्योंकि यदि रिसोर्स पर्सन तैयार करवाने वाले वो लोग होंगे, जिन्होंने कभी कक्षा में जा कर पढ़ाया ही नहीं है तो अच्छे नतीजों की उम्मीद कैसे की जा सकती है? सरकारी स्कूलों में गुणवत्ता लाने के लिए सरकारी तंत्र में सुधार की भी नितांत आवश्यकता है। सरकारी स्कूलों में पाँचवीं और आठवीं कक्षा में बोर्ड की परीक्षा शुरू करनी होगी। अध्यापकों द्वारा प्राप्त परीक्षण को सुचारु रूप से कक्षा स्तर तक लागू करने के लिए स्कूलों के मुखिया से लेकर अधिकारियों को भी जवाबदेय बनाना होगा।
                                                     लेखक सीनियर सैकेंडरी स्कूल में राजनीतिक शास्त्र के प्रवक्ता हैं।  (मो.- 9418014586)

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