पढ़ाते नहीं, बाकी सब कुछ करते हैं शिक्षक -- सचिन ठाकुर


पढ़ाते नहीं, बाकी सब कुछ करते हैं शिक्षक
"साविद्या या विमुक्तये." उपनिषद की वाणी में विद्या वही है जो मनुष्य को मुक्त करे. लेकिन देश में पिछले एक दशक से पढ़ाई-लिखार्ई की बेहतरी के नाम पर जो बंदोबस्त चल रहा है, उससे तो लगता है कि देश के सरकारी प्राइमरी स्कूल और वहां के मास्साब पूरी तरह से शिक्षा के बंधन से ही मुक्त किए जा रहे हैं. और इस करेला जैसी व्यवस्था को नीम पर चढ़ाने की कसर मिड डे मील ने पूरी कर दी.
जरा शिक्षकों के काम की लिस्ट पर नजर डालिए—मिड डे मील के लिए सब्जी खरीदनी है तो मास्टर, जनगणना करनी है तो मास्टर, वोटर लिस्ट के लिए बूथ लेवल ऑफिसर बनना है तो मास्टर, चुनाव कराने हैं तो मास्टर, बच्चों का हेल्थ चेकअप करना है तो मास्टर, सर्व शिक्षा अभियान में स्कूल की बिल्डिंग बनानी है तो मास्टर. आप मद जोड़ते जाइए और उसके पीछे मास्टर शब्द लगाते जाइए, एक दर्दनाक तुकबंदी तैयार हो जाएगी. वह भी ऐसे देश में जहां खुद सरकार मानती है कि 81 लाख बच्चों ने स्कूल का मुंह नहीं देखा है और सरकारी प्राइमरी स्कूलों में अध्यापकों के 12.5 लाख से ज्यादा पद खाली पड़े हैं.

लेकिन, दिन की रोशनी की तरह साफ और सरकारी कागजों में मोटे-मोटे अक्षरों में लिखी शिक्षकों को शिक्षेत्तर कार्यों में लगाने की इबारत से भारत सरकार बेखबर है. देश की संसद से जब पूछा गया कि क्या सरकारी अध्यापकों से अब भी पढ़ाई के अलावा दूसरे काम कराए जा रहे हैं? क्या राष्ट्रीय ज्ञान आयोग ने इस बारे में चिंता नहीं जताई है? सरकार इस चिंता से कहां तक सहमत है? और शिक्षकों को इस तरह के कामों से बचाने के लिए सरकार ने क्या कदम उठाए हैं? तो 8 मई, 2013 को देश के मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री शशि थरूर ने लोकसभा में सूक्तिपरक गूढ़ जवाब दिया, “इस बारे में सूचना जुटाई जा रही है और सदन के पटल पर रख दी जाएगी.” थरूर खूब जानते हैं कि इस मुद्दे पर ट्वीट करना आसान नहीं है. दरअसल सुप्रीम कोर्ट 6 दिसंबर, 2007 को ही स्पष्ट निर्देश दे चुका है कि शिक्षकों को पढ़ार्ई वाले दिनों में शिक्षा के अलावा दूसरे किसी काम में न लगाया जाए. ऐसे में सरकार आनाकानी के अलावा कर भी क्या सकती है?

खाना खिलाओ और खाते खोलो
हालांकि आंखों देखी और कानों सुनी को सरकारी हलफनामे की दरकार नहीं है. जिस संसद में थरूर जवाब दे रहे थे, वहां से महज 71 किमी दक्षिण में है, हरियाणा का मुस्लिमबहुल मेवात जिला. सावन के महीने में अरावली की पहाडिय़ों को हरियाली सूझ रही है और तलहटी में बसी मुरादबास पंचायत के स्कूल कैंपस के चूल्हे से धुआं उठ रहा है. यहां तीन सरकारी स्कूल हैं—एक मिडिल स्कूल, एक प्राइमरी स्कूल और एक बालिका प्राइमरी स्कूल. बालिका प्राइमरी स्कूल में 183 लड़कियों को पढ़ाने के लिए एक महिला शिक्षिका हैं. मिडिल स्कूल में 168 बच्चों को संभालने के लिए हेड मास्टर औैर एक मास्टर साहब हैं. प्राइमरी स्कूल में जरूर 133 छात्रों के लिए सात अध्यापक हैं, लेकिन उनमें से भी ज्यादातर सुबह-सुबह स्कूल में नजर नहीं आ रहे हैं. शिक्षा सत्र 25 मार्च से शुरू हो चुका है, लेकिन बच्चों को बांटी जाने वाली पाठ्य-पुस्तकों का कहीं अता-पता नहीं है. मिडिल स्कूल के शिक्षक खुर्शीद अहमद कहते हैं, “पूरे जिले का यही हाल है.”

वे बताना नहीं चाहते लेकिन साफ नजर आता है कि यहां एक ही कमरे में दो-दो क्लासों के बच्चों को एक साथ पढ़ाना पड़ रहा है. पास में खड़े अधबने कमरे के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, “सर्व शिक्षा अभियान से बन रहा है. बनवाने का काम मैं ही देख रहा हूं.” यानी हरियाणा सरकार की नजर में सोशल साइंस का टीचर सिविल इंजीनियर भी है, आर्किटेक्ट भी है और ठेकेदार भी.

इस बीच प्राइमरी के अध्यापक मीरुद्दीन तीन-चार रजिस्टर लेकर आ गए. वे बड़ी तल्लीनता से उन्हें देख रहे थे. ग्रामीण बैंक में 400 से ज्यादा बच्चों के खाते खुलवाने की जिम्मेदारी भी इन्हीं हजरात की है. बैंक कहता है कि माता-पिता के दो-दो पहचान पत्र लाओ. जिस गरीब आदमी के पास खाने को नहीं है और मिड डे मील और वजीफे की आस में बच्चों को स्कूल भेजता है, वह ये कागज कहां से लाए. मीरुद्दीन ने कहा, “तो हम लोग एफिडेविड बनवाते हैं.” अब तक मिड डे मील के चूल्हे की आंच तेज हो गई. जब तक खाना पकता हमने पास ही मेवली कलां के राजकीय उच्च विद्यालय का रुख किया.

वोटर बनाओ और स्वास्थ्य जांच करो
स्कूल में बास्केटबॉल का मैदान था, इसमें घुटनों तक पानी भरा था. सामने अंग्रेजी राज की निशानी के तौर पर ऊंची इमारत खड़ी थी. बच्चे और मास्टर इससे जरा बचके ही निकलते हैं, क्योंकि दो साल पहले इसका एक हिस्सा गिरने से बड़ा हादसा होते-होते बचा था. बहरहाल, यहां के प्राइमरी सेक्शन में 1,025 और छठी से 10वीं के सेक्शन में 526 बच्चे पढ़ते हैं. 1,551 बच्चों के लिए यहां हेडमास्टरों को मिलाकर कुल 27 अध्यापक हैं. यानी 58 बच्चों के लिए महज एक मास्टर. लेकिन शायद तालीम के मसीहाओं को यहां ज्यादा मास्टर दिखाई देते हैं. स्कूल के तीन अध्यापकों को मतदाता सूची के काम में बूथ लेवल ऑफिसर बनाया गया है.
एक शिक्षक ने बताया, “स्कूल में पढ़ाई के दौरान भी अगर कोई गांव वाला वोटर लिस्ट में नाम चढ़वाने आ जाए तो हम मना नहीं कर सकते.” इस स्कूल में कुछ अन्य किस्म के रजिस्टर देखने को मिले. यहां हरियाणा सरकार की ‘इंदिरा बाल स्वास्थ्य योजना’ का जलवा दिखा. इसके तहत शिक्षकों को सभी छात्रों के स्वास्थ्य के बारे में 29 बिंदुओं की सूचना दर्ज करनी है. इसमें यह सूचना भी शामिल है कि क्या बच्चे को शाम या रात के समय देखने में दिक्कत होती है. अध्यापक से उम्मीद की जा रही है कि वह रात में भी बच्चे की सेहत का हाल खुद ले. हर महीने यह रिपोर्ट बनाकर स्वास्थ्य विभाग को भेजी जानी है. स्वास्थ्य पर इतनी सरकारी मेहरबानी के बावजूद हर रोज 700 रु. का पानी का टैंकर मंगाकर यहां पीने के पानी का इंतजाम किया जाता है. यह आलम तब है जब सिर्फ वित्त वर्ष 2013-14 के लिए सर्व शिक्षा अभियान में 27,258 करोड़ रु. के बजट का प्रावधान है.
ये कौन-सी शिक्षा व्यवस्था है? इसका जवाब खंगालते हुए एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक जे. एस. राजपूत कहते हैं, “जब से अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं शिक्षा के लिए भारत सरकार को पैसा देने लगी हैं, तब से जांच पर जांच और फाइल पर फाइल बनाना ही अध्यापकों का पहला काम हो गया है.” हरियाणा से राजस्थान चले जाएं तो भी पढ़ाई का यही नजारा है. नागौर जिले के लादडिय़ा के काबरा नाडा स्कूल के अध्यापक दानाराम महेला घर-घर की खाक छान रहे हैं और उनके साथ स्कूल में दो शिक्षक हैं. लेकिन महेला नए लोगों के नाम मतदाता सूची में जोडऩे में ही ज्यादा मुस्तैद रहते हैं. इस काम से बच्चों की पढ़ाई का नुकसान होने के सवाल का जवाब वह जरा घुमाकर देते हैं, “कागजी कार्रवाई औैर जवाबदेही इतनी है कि देर रात तक काम करना पड़ता है.” उधर, श्रीगंगानगर के साहूवाला स्कूल के प्रधानाध्यापक श्याम सुंदर सिंगल की तल्ख टिप्पणी सुनिए, “पोषाहार के नाम पर सरकार ने हमारे गले का नाप ले रखा है, पता नहीं कब दब जाए.” इसी अफसाने की दूसरी कड़ी जोड़ते हुए शिक्षक संघ (शेखावत) के जिलाध्यक्ष भूप सिंह कूकणा की व्यथा है, “जनगणना, आर्थिक गणना, पल्स पोलियो जागरूकता, बीएलओ, बच्चों का वजीफा आवेदन, जन्म प्रमाणपत्र, जाति प्रमाणपत्र और बैंकों में बच्चों का खाता खुलवाना, सब मास्टरों की जिम्मेदारी है.”

पिस रहे गरीबों के बच्चे
जिम्मेदारी देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में भी कम नहीं है. यहां लाखों बच्चे अपने हाथ में लैपटॉप आने की बाट जोह रहे हैं. हजारों प्राइमरी अध्यापक ट्रांसफर, रिलीविंग और नई जगह पर डेरा जमाने की कवायद से जूझ रहे हैं. ऐसे अफरा-तफरी के माहौल में राजधानी लखनऊ से 15 किमी दूर सरोजनीनगर ब्लॉक का अहिमामऊ प्राथमिक विद्यालय जूझ रहा है. यहां के बच्चों की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि देश की प्राथमिक शिक्षा की डेमोग्राफी का ब्लूप्रिंट जैसा लगता है. कुल बच्चे हैं 86. इनमें से 46 अनुसूचित जाति के, 10 पिछड़ा वर्ग के, 23 मुस्लिम और महज 7 बच्चे सामान्य वर्ग के हैं. यानी सरकारी शिक्षा वंचित तबके के लिए पहली और आखिरी उम्मीद है. यहां तैनात दोनों शिक्षक मिड डे मील से जूझ रहे हैं. उधर, ललितपुर जिले के तालबेहट में मिड डे मील की सब्जी खरीद रहे अड़वारा पूर्व माध्यमिक विद्यालय के अध्यापक रामगोपाल नायक का जवाब हाजिर था, “हमें क्या है सब्जी खरीदवा लो, सिलेंडर भरवा लो या बच्चों को पढ़वा लो. सब सरकारी काम हैं. हमें तो नौकरी करनी है.” फिर भी राज्य के प्राथमिक शिक्षा मंत्री रामगोविंद चौधरी कहते हैं, “मैंने मुख्य सचिव को पत्र लिखकर कहा है कि शिक्षकों की ड्यूटी चुनाव कार्य और दैवीय आपदा के अलावा किसी काम में न लगाई जाए.”

मास्टर भी कम जिम्मेदार नहीं
कहां फंसे हैं गुरुजीसर्व शिक्षा अभियान से जुड़े एक कंसल्टेंट ने कहा, “अभियान में शिक्षकों को गैर-शिक्षा के कामों से बचाने के पर्याप्त इंतजाम हैं, लेकिन जिला स्तर की ब्यूरोक्रेसी इनका पालन नहीं कर रही है. जिलाधिकारियों को इस बारे में ट्रेनिंग दी जाए.” वहीं एसएसए की निदेशक मनिंदर कौर ने इस बारे में कोई भी बात करने से इस आधार पर इनकार कर दिया कि वे मीडिया से बातचीत के लिए अधिकृत नहीं हैं. नेशनल कैंपेन फॉर एजुकेशन के नेशनल कैंपेन कोऑर्डिनेटर कौशलेंद्र प्रपन्न का तर्क है, “अगर डायरेक्टोरेट ऑफ स्कूल एजुकेशन की रिपोर्ट को देखें तो प्राइमरी शिक्षकों को 15 से 30 दिन तक ही गैर-शिक्षा कार्यों में लगाया गया है. 85 फीसदी शिक्षक काम के प्रति उदासीन हैं.”

नीति नियंता पता नहीं किससे सहमत हैं, लेकिन अब तक अरावली की पहाडिय़ों की तलहटी वाले स्कूल में मिड डे मील बनकर तैयार हो चुका था. छोटे-छोटे बच्चों की थाली में गरमागर्म खिचड़ी परोसी गई. गर्म भात से उंगलियां जली तो जीभ से चाटकर जलन को कम किया गया. कुछ बच्चे घर से प्याज, टमाटर और अचार भी ले आए थे. जितना खाया गया, खा लिया. कुछ ने बाकी बचा बकरियों को डाला तो कुछ इसे सहेज कर घर देने चले गए. सरकार ने गरीब बच्चों की पेट की भूख शांत कर दी, लेकिन दिमाग कोरे के कोरे.
Sachin Thakur article originally belongs to  INDIA TODAY 

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