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फेसबुक के फायदे या नुकसान ?


       सभी पाठकों को मेरा प्यार भरा नमस्कार।भारत में ऐक्टिव फेसबुक यूजर्स की संख्या साढ़े छह करोड़ से भी ज्यादा हो गई है। अभी दो साल पहले यह सिर्फ 80 लाख थी। अंदाजा लगाया जा सकता है कि टीनेजर्स का मेंटल डिवेलपमेंट इससे किस हद तक प्रभावित हो रहा है। अभी यह सोशल नेटवर्क कुल नौ भारतीय भाषाओं में उपलब्ध है। यानी भाषा की भी कोई बाधा नहीं है। स्कूल में पढ़ने वाले  दो बच्चे अपनी-अपनी छतों से आवाज देकर कहते हैं, 'एफबी पे जाओ, चैट करते हैं। इससे कहीं अच्छा होता कि वे खुली हवा में छत पर बैठकर या बाहर पार्क में टहलते हुए गप्पें मारते लेकिन तो कोई उनसे यह कहने वाला है, और कहे भी तो वे मानने वाले नहीं हैं। इसके कुछ फायदे हैं तो कुछ नुकसान भी हैं। फायदा यह है कि कम उम्र में ही उनकी एक बहुत बड़ी दुनिया बन रही है। कुछ टीनेजर्स अपनी क्रिएटिविटी के लिए भी इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन इसका सबसे बड़ा नुकसान यह है कि टीनेजर्स अक्सर गलत सेल्फ-आइडेंटिटी डिवेलप कर ले रहे हैं। पॉप्युलर कल्चर और मीडिया के असर में आकर वे अपना मूल्यांकन अपने अपियरेंस के हिसाब से कर रहे हैं। इस सोशल प्लेटफॉर्म पर मिले कॉमेंट्स और मेसेज उनकी आइडेंटिटी का आधार बन रहे हैं। धीरे-धीरे इस 'मैनुफैक्चर्ड' दुनिया में ही रहने की आदत बन जाती है। एफबी पर 'फ्रेंड्स' और 'लाइक्स' की संख्या से उन्हें सेल्फ-प्रमोशन मिलता है। यह 'फॉल्स सेल्फ' उनके 'ट्रू सेल्फ' से काफी अलग है, क्योंकि अंतर्मुखी स्वभाव वाला किशोर भी यहां मुखर दिखाई देता है। इस तरह दो आइडेंटिटी के बीच की जिंदगी कई दफा उनके व्यक्तित्व को दोहरा बना रही है। बढ़ती उम्र में अपनापन, सुरक्षा और जुड़ाव जैसी बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं हो पातीं और यह उनके भीतरी बिखराव की वजह बन जाता है।

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