यथार्थ से परे शिक्षा की सरकारी योजनाएं--- डा. विनोद कुमार लेखक, खुडला, सरकाघाट, मंडी

शिक्षा को किसी भी व्यक्तिके जीवन का महत्त्वपूर्ण आधार माना गया है। शिक्षण काल में मिले संस्कारों का व्यक्ति पर जीवनपर्यंत प्रभाव रहता है। स्वतंत्रता के पश्चात हम शिक्षा के ढांचे को इस देश के अनुरूप विकसित नहीं कर पाए हैं। हालांकि इस देश में शिक्षा से संबंधित सुधार हेतु भिन्न-भिन्न समय पर अनेकों आयोग गठित ेिकए गए हैं, जिनमें डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन आयोग, मुदालियर, कोठारी, आचार्य राम मूर्ति आयोग आदि से होते हुए आज हम यहां तक पहुंचे हैं। हमारे संविधान में यह वर्णित है कि इस देश के नागरिकों को शिक्षा, स्वास्थ्य व कानून संबंधी सुविधाएं कम से कम खर्च पर मुनासिब हों, परंतु आज वस्तुस्थिति कुछ और ही बयान कर रही है। हमारे देश की शिक्षा को त्रिमुखी माना गया है। इस के तीन प्रमुख आधार हैं, जिस में शिक्षक, शिक्षार्थी व शिक्षार्थी को पढ़ाया जाने वाला पाठ्यक्रम है। आज हालत यह है कि गरीब आदमी के बच्चे शिक्षा से विमुख होते जा रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों के दौरान शिक्षा जगत में निजी क्षेत्र के आगमन के कारण शिक्षा का तेजी से व्यावसायीकरण हुआ है। हालांकि ये संस्थान सोसायटी एक्ट-1860 के अंर्तगत कार्य कर रहे हैं, जिसमें ये चैरिटी का ही कार्य कर सकती हैं, परंतु यथार्थ इसके विपरीत है। बीते कुछ वर्षों में हिमाचल प्रदेश में भी बड़े पैमाने पर प्राथमिक शिक्षण संस्थानों से लेकर विश्वविद्यालयों तक की स्थापना हुई है। निजी शिक्षण संस्थानों में फीस के तौर पर मोटी रकम वसूली जाती है, जिस पर सरकार कोई नियंत्रण नहीं कर पाई है, यह रकम हर संस्थान की अपनी दरों पर निर्भर है। इस मसले पर शिक्षाविदों की चुप्पी भी रहस्यमयी बनी हुई है। वे मुंह खोलने को तैयार नहीं हैं। इस के बावजूद इन संस्थानों में छात्रों की भीड़ उमड़ती है। हालांकि इनकी शैक्षणिक गुणवत्ता भी उच्च स्तर की नहीं कही जा सकती है। उधर सरकारी स्कूलों में शिक्षार्थियों की संख्या दिन-प्रतिदिन गिरती जा रही है। कई स्कूलों में तो शिक्षार्थियों की संख्या शिक्षकों के बराबर हो गई है। आज के दौर में यदि इस समस्या का गहराई से विश्लेषण किया जाए तो हम पाते हैं कि विधायिका और कार्यपालिका की जुगलबंदी इसके लिए पूर्णतया दोषी है। ये ‘येन केन प्रकारेण’ अपने फैसलों को अधिक विचार किए बिना इन स्कूलों व संस्थाओं पर थोप रहे हैं। हिमाचल प्रदेश जैसे राज्य में जहां प्रति व्यक्ति आय देश के विकसित राज्यों से भी अधिक है, वहां मिड-डे मील योजना लागू कर दी गई। जबकि यह योजना भुखमरी से ग्रस्त जिलों में ही चलाई जानी चाहिए थी, जैसे दुमका, संथाल और काला हांडी आदि। इसी प्रकार राज्य में स्कूली छात्र-छात्राओं को एक सप्ताह में एक आयरन की गोली देने का कार्यक्रम बनाया गया है। अब प्रश्न यह है कि क्या ये गोलियां प्रयोगशाला के परीक्षण के आधार पर नहीं दी जानी चाहिए? क्या ये आयरन डोज बिना डाक्टरी परीक्षण के दी जानी चाहिए? आयरन की गोलियां हिमोग्लोबिन की कमी वाले व्यक्ति को दी जाती हैं और जब यह स्तर ठीक पहुंच जाता है तो आयरन की गोलियां देनी बंद कर दी जाती हैं। अब दो प्रश्नों का उठना स्वाभाविक है, एक तो यह कि जो मिड-डे मील स्कूलों में दिया जा रहा है, वह पौष्टिक नहीं है, तभी आयरन डोज का सप्लीमेंट देने की योजना बनाई गई। दूसरा प्रश्न यह है कि हमारा शरीर हर तत्त्व को शरीर में आवश्यकतानुसार पैदा करता है, तो ऐसे में भले-चंगे बच्चों को आयरन की गोलियां देने का क्या प्रयोजन? इस से उस की प्रतिरोधात्मक शक्ति में कमी आएगी और शरीर के रुग्ण होने के अधिक आसार होंगे। ऐसे मे इस तरह की नीति तैयार करते वक्त पूरा खाका बनाया जाना चाहिए। सरकारी स्कूलों में आने वाले सभी विद्यार्थियों का खानपान एक जैसा नहीं होता। कुछ बच्चे हरी साग-सब्जी ज्यादा खाते हैं तो उन्हें एनीमिया की शिकायत न के बराबर होती है। ऐसे बच्चों को आयरन डोज देना ठीक नहीं। अतः बिना डाक्टरी परीक्षण के बच्चों की सेहत से खिलवाड़ करना ठीक नहीं है। अभी बिलासपुर में इसी डोज के कारण कुछ स्कूली छात्र बीमार भी हुए थे। अब यह जानना आवश्यक हो जाता है कि कौन इस तरह की योजनाएं बनाता है और इन योजनाकारों का इन में क्या स्वार्थ निहित है। जब इस तरह की नीतियों का सरकारी स्कूलों में कार्यान्वयन होगा तो वहां छात्र-छात्राओं की संख्या तो घटेगी ही।

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