हिंदी दिवस --- राजेश वर्मा

मुगलई काल में अरबी-फारसी का बोलबाला था, अंग्रेजों ने राजकाज के लिए अंग्रेज़ी व उर्दू को चलाया लेकिन जिस देश को हिंदुस्तान के नाम से जाना जाता है उसकी भाषा हिन्दी न बन पाई। 14 सितंबर 1949 को देश के संविधान द्वारा हिन्दी को भारत की राजभाषा के रूप में मान्यता दी गई और धारा 343 से 352 तक राजभाषा व अन्य क्षेत्रीय भाषाओं की व्यवस्था की गयी। अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ की परिभाषा कहती है कि 'राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी, संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा। खंड (1) में किसी बात के होते हुए भी, इस संविधान के प्रारंभ से पंद्रह वर्ष की अवधि तक संघ के उन सभी शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाता रहेगा जिनके लिए उसका ऐसे प्रारंभ से ठीक पहले प्रयोग किया जा रहा था '
 
 
इस परिभाषा में यह तो व्याख्या है कि राजभाषा हिन्दी ही होगी और अंग्रेजी महज 15 वर्षों तक कामकाजी भाषा रहेगी अर्थात् संवैधानिक स्थिति अनुसार हिन्दी केवल प्रतीकात्मक तौर पर ही संघ की राजभाषा है जबकि अंग्रेज़ी सह भाषा लेकिन असलियत में अंग्रेज़ी ही आज भी राजभाषा है और हिन्दी केवल एक सह भाषा के रूप में अपना फर्ज निभा रही है। हिन्दी को प्रोत्साहित करने व इसके प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए गृह मंत्रालय द्वारा जून 1975 में स्वतंत्र विभाग के रूप में राजभाषा विभाग की स्थापना भी की गई। इसी तरह राजभाषा अधिनियम की धारा 4 के तहत 1976 में राजभाषा संसदीय समिति का गठन हुआ, राजभाषा नियम 1976 में लागू करने के साथ ही राजभाषा संसदीय सम‍िति की अनुशंसा पर राष्ट्रपति द्वारा 'राजभाषा नीति' बनाई गई, इस दिशा में और भी बहुत सी समितियां बनाई गई लेकिन सच कहें तो इन समितियों ने कागजों व बैठकों में तो राजभाषा के उत्थान के लिए बहुत कुछ किया परंतु ये सब आमजन तक न तो इस भाषा को सही मायनों में पहुंचा सके और न ही इसके महत्व को बताने में कामयाब हो सके। 
आज भी जो छाप मुंशी प्रेमचंद जी ने हिन्दी के माध्यम से करोड़ों दिलों में छोड़ रखी है कोई और साहित्यकार आज दिन तक वैसी जगह नहीं बना पाया है। हिन्दी के उत्थान के नाम पर संगोष्ठियां होती हैं महफ़िलें सजती हैं लेकिन क्या कभी इन सब कार्यक्रमों से एक आम इंसान हिन्दी को और बेहतर तरीके से समझ पाया? शायद नहीं! आम लोगों में राजभाषा के महत्व को लेकर कोई सकारात्मक संदेश नहीं गया, हां संगोष्ठियों व बैठकों में मौजूद बुद्धिजीवियां द्वारा एक दूसरे को सम्मानित करने व चाय-पान की व्यवस्था करवा कर हिन्दी का गुणगान बहुत होता आया। ऐसे आयोजनों का महत्व तो तब है जब इसके परिणाम स्वरूप गैर हिन्दी भाषी लोग भी हिन्दी की वकालत करते और हिन्दीभाषी हिन्दी को ही अपने जीवन का हिस्सा मानते न कि वह पलायन करते। चाहे संविधान की बात हो या इसमें किए गए अन्य प्रावधानों की आज तक राष्ट्रहित में भाषा को जोड़ने की बजाए बांटा ही गया राजभाषा अधिनियम 1963 द्वारा राजभाषा के शासकीय कार्यों, नियमन हेतु जो प्रावधान किए गए उनमें भाषा के आधार पर तीन भाषायी क्षेत्र बना दिए जिसके तहत 'क' क्षेत्र में- उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, हरियाणा, हिमाचल, उत्तरांचल, झारखंड, राजस्थान, दिल्ली एवं अंडमान द्वीप समूह, 'ख' क्षेत्र में गुजरात, महाराष्ट्र तथा उपरोक्त के अतिरिक्त अन्य सभी राज्य एवं संघों को' ग' क्षेत्र रखा गया। इस विभाजन के आधार पर हिन्दी कुछेक राज्यों की भाषा ही बन पायी न की राष्ट्र की ?
 
बात की जाए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी की स्थिति की तो विश्व के 60 से अधिक देशों के विभिन्न विश्वविद्यालयों और अन्य शैक्षणिक संस्थानों में हिन्दी पढ़ाई जा रही है। इसे हिन्दी भाषा के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते प्रभाव के तौर पर देखा जा सकता है। चीनी भाषा विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है तो हिन्दी इसके बाद 55 करोड़ लोगों द्वारा बोले जाने वाली दूसरी भाषा है और जिस अंग्रेजी के पीछे देश भाग रहा है उसका नंबर हिन्दी के बाद ही आता है। वैश्वीकरण के चलते कई देश हिन्दी की बढ़ते महत्व को स्वीकार कर रहे हैं। एक तरफ दक्षिण अफ्रीका, फीजी, सूरीनाम मॉरीशस, गुयाना, त्रिनिदाद, आदि जैसे देशों में हिन्दी की जड़ें निरन्तर गहरी होतीं जा रही हैं तो वहीं दूसरी तरफ अमेरिका, आस्ट्रेलिया, रूस, जापान, ब्रिटेन, जर्मनी, इटली, कोरिया, चीन, पौलेण्ड आदि जैसे प्रमुख देशों ने भूमण्डलीकरण के इस दौर में आर्थिक रूप से भारतीय बाजार में टिके रहने के लिए हिन्दी को ढाल बनाया है। 
 
भूमण्डलीकरण के इस दौर में उपभोक्ताओं तक अपने उत्पादों की सुगम पहुंच सुनिश्चित करने के लिए बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों ने आम आदमी से सम्पर्क स्थापित करने के लिए हिन्दी विज्ञापनों को ही खरीद-फरोख्त का माध्यम बनाया है। देश में बाहरी कंपनियों के उत्पाद तभी गांव-गांव तक पहुंच रहे हैं जब उनके लिए हिन्दी संपर्क सूत्र बनकर उभरी। पूरा विश्व हिन्दी को ढाल बनाकर अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में लगा हुआ है लेकिन यही हिन्दी हमारी बेरुखी का शिकार हो रही है। बात चाहे इलैक्ट्रोनिक मीडिया की हो प्रिन्ट मीडिया की हो या फिर सोशल मीडिया की सभी जगह हिन्दी का प्रभुत्व देखा जा सकता है। सोशल मीडिया पर भी आज सबसे ज्यादा वायरल होने वाला कंटेट हिन्दी भाषाई ही है। देश में सर्वाधिक समाचार पत्र एवं पाठक हिन्दी भाषाई ही हैं।
 
हाल ही के कुछेक वर्षों के दौरान भारत सरकार द्वारा जहां हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ में अधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने के लिए प्रयास किए जा रहे है वहीं दूसरी तरफ़ शशि थरूर जैसे नेता हिन्दी को आगे बढ़ाने पर सवाल खड़ा करते हुए सदन में कहते हैं "हिन्दी राष्ट्रीय भाषा नहीं हैं, यह अधिकारिक भाषा है, हिन्दी को आगे बढ़ाने पर एक महत्वपूर्ण प्रश्न उभरता है, हमें संयुक्त राष्ट्र में आधिकारिक भाषा की क्या जरूरत है? अरबी, हिन्दी से ज्यादा नहीं बोली जाती है, लेकिन यह 22 देशों में बोली जाती है, हिन्दी केवल एक देश की आधिकारिक भाषा के तौर पर प्रयोग की जाती है " इस तरह के विचार कभी भी राष्ट्रहित में नहीं हो सकते सरकारी प्रयासों के चलते ही संयुक्त राष्ट्र संघ ने हिंदी में न्यूज वेबसाइट लांच की इससे हिन्दी को एशिया की पहली गैर आधिकारिक भाषा बनने का सम्मान प्राप्त हुआ। पिछले साल संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी न्यूज बुलेटिन की शुरुआत आदि कार्यक्रम संयुक्त राष्ट्र संघ की सातवीं अधिकृत भाषा बनने की तरफ बढ़ते कदम हैं। भारत सरकार भी हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की अधिकृत भाषा बनाने की कोशिश में है और संयुक्त राष्ट्र संघ के इन कदमों से लग रहा है कि हिंदी जल्द ही संयुक्त राष्ट्र संघ की सातवीं अधिकृत भाषा बनेगी। हमे याद है 1945 में संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक तौर पर अंग्रेजी, रूसी, फ्रांसीसी और चीनी आदि केवल 4 अधिकृत भाषाएँ ही थी और ऐसा नहीं यह ज्यादा बोली जाने वाली भाषाएँ थी केवल शक्तिशाली देशों की भाषा होने के कारण ही इनको जगह मिली। हालांकि बाद में अरबी और स्पेनिश भी संयुक्त राष्ट्र की भाषाओं में शामिल हो गई। हमारी हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनने का सौभाग्य तभी मिल सकता है जब संयुक्त राष्ट्र संघ में एक प्रस्ताव के तहत मौजूदा 193 सदस्य देशों में से दो तिहाई यानि 129 देश इसके लिए अपनी सहमति जता सकें व इसकी प्रक्रिया के लिए वित्तीय लागत भी साझा करने पर राजी हों। खैर यह तो अंतरराष्ट्रीय स्तर की बातें व मसले हैं इससे पहले जरूरी यह है की हर भारतीय देश की संस्कृति व सभ्यता की पहचान बनी इस भाषा की अहमियत को समझे यह वह भाषा है जो दिलों को जोड़ने के साथ-साथ देशों को भी जोड़ने का काम कर रही है। हमे गर्व होना चाहिए की हम इस भाषा से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं। 

कितने हिंदी हैं हम? -- जगदीश बाली

कुछ रोज़ पहले मैने पडोस के एक बच्चे से कहा कि मेज़ पर रखे 10 सेब ले आओ। बच्चा चुपचाप खड़ा रहा और सेब लाने के लिए नहीं बढ़ा। मैने फ़िर कहा। बच्चा थोड़ा झिझकते हुए बोला कि दस कितने होते हैं, अंकल। मैने अंग्रेज़ी में कहा कि दस 'टैन' होते हैं। बच्चा प्टाक से दस सेब ले आया। मुझे अचरज हुआ। बच्चा दस नहीं समझ पाया, परंतु टैन समझ गया। मुझे लगा देश की बिंदी, हिंदी के प्रति हमारा नज़रिया कितना उदासीन व तुच्छ है। 
उधर एक वो 4 अक्टूबर 1977 का मंगलवार था जो हिंदी भाषा और हिंदोस्तान के लिए गौरवशाली दिन बना क्योंकि उस दिन तत्कालीन सरकार में विदेश मंत्री के तौर पर काम कर रहे अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्र संघ आम सभा के 32वें अधिवेशन में हिंदी में भाषण दिया था। विश्वपटल पर इस गूंज ने हिंदी भाषा को एक अहम स्थान दिया। यूएन में पधारे प्रतिनिधियों ने खड़े हो तालियां बजा कर वाजपेयी के इस भाषण का अभिनंदन किया था। हिंदी भाषा को प्रचारित और प्रसारित करने का इससे बेहतर व्यवहारिक उदाहरण व प्रयास क्या हो सकता है। क्या आज हिंदी के पैरोकार व हमारा हिंदी के प्रति नज़रिया ऐसा ही व्यवहारिक है? हम गर्व से तो कहते हैं कि हिंदी हमारी बिंदी है, पर धरातल पर इस भाषा को खास तरज़ीह नहीं देते।
क्या हम ऐसा माहौल या परिवेश बना पा रहे हैं जहां कहा जा सके कि हिंदी हमारी जनमानस की भाषा है? पैदा होने के बाद निस्संदेह बच्चा अपने मा-बाप व आस-पास के वातावरण से सीखता है। वह जिस भाषा को सुनता है, वो वही भाषा बोलता है। आज कल हमारे समाज में प्रचलन कुछ ऐसा चल पड़ा है कि मा-बाप बच्चों को दैनिक शबदावली के हिंदी नहीं बल्कि अंग्रेज़ी के शब्द सिखाने को ज़्यादा अहमियत देते हैं। सबसे पहले बच्चा मा से बोलना सीखता है और बड़ी सहजता से उसी भाषा को अपनाता है। अक्सर देखा जाता है कि जब बच्चा बंदर को बंदर बोलता है तो मां कहती हैं, बंदर नहीं बेटा 'मंकी' बोलो। वो कहती है घोड़ा नहीं 'हॉर्स' बोलो, नाक नहीं 'नोज़' बोलो। कभी तो वो नोज़ को नोज़ी और हैंड को हैंडु भी बोल देती है। क्या बंदर को मंकी या घोड़े को हॉर्स बोलने से बंदर या घोड़े की शक्लें बढिया दिखती हैं? शायद माताएं ये मानती हैं कि हिंदी के बजाय अंग्रेज़ी बोलने से उनके बच्चे अधिक प्रतिभाशाली बनेंगे। मुझे माता-पिता के अपने बच्चों को अंग्रेज़ी शब्द सिखाने पर कोई आपत्ति नहीं, कोई गिला-शिकवा नहीं, परंतु हिंदी की बिंदी वाले इस देश में हमारे लिए बंदर, घोड़ा, हाथ पहले है मंकी, हॉर्स व हैंड बाद में। बंदर को मंकी या घोड़े को हॉर्स बोलने का प्रतिभा से कोई संबंध नहीं। गिनती को हिंदी में एक, दो, तीन... के बजाय अंग्रेज़ी में वन, टू, थ्री... कहने से कोई ज़्यादा सभ्य नहीं हो जाता। नमस्ते की जगह गुड्मॉर्निग कहने से बच्चा खास नहीं हो जाता बल्कि ये सब बातें इस बात का द्योतक है कि जाने-अनजाने हम अभी भी मानसिक रूप से भाषाई गुलामी के दौर से उबर नहीं पा रहे हैं। 
ये बात उचित है कि बच्चे को हिंदी के अलावा अन्य भाषा का भी ज्ञान हो, परंतु उससे भी बेहतर है कि अन्य भाषा से पहले उसे हिंदी का ज्ञान हो। मुझे इस बात पर गर्व है कि मैं अंग्रेज़ी का अध्यापक हूं, परंतु इससे भी ज़्यादा गर्व मुझे इस बात पर है कि मैं हिंदी बोल सकता हूं और हिंदी लिख सकता हूं। स्कूल तो भाषा को सीखने, उसे उन्नत करने व विकसित करने की सबसे बेहतर जगह होती है। परंतु चिंता का विषय है कि स्कूलों में भी जब बच्चे हिंदी में बात-चीत करते हैं, तो वे अक्सर हिंदी के सामान्य शब्दों का उच्चारण सही नहीं करते। उनका वाक्य विन्यास भी बहुत गड़बड़ होता है। विद्यालय की प्रात:कालीन सभा में भी बच्चे जब बोलते हैं, तो वे कई शब्दों का उच्चारण गलत करते हैं। बिना देखे या ज़ुबानी बोलने की बात तो दूर हैं, देख कर भी बच्चे गांधी को घांदी, गधे को घदा, उत्कल को उच्च्कल, विद्यालय को विदालय, व्यक्ति को व्यकित कहते हैं। अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि जहां हिंदी उन्नत व विकसित होनी चाहिए, वहां हिंदी की नींव कमज़ोर दिखती है। कई बढ़िया ज्ञान रखने वाले भी उन्नासी और नवासी के अंतर में उलझ जाते हैं। जब गिनती के इन संख्याओं की बात आती है, तो अमूमन अंग्रेज़ी में सेवैंटीनाइन या ऐटिनाइन कहना ही पड़ता है। कई महानुभाव तो उन्नतीस व उन्नतालीस में भी उलझन में पड़ जाते हैं। इस तरह की भाषाई उलझनें हमारे हिंदी के प्रति रवैये की पोल खोलती हैं। एक ज़माना था कि रेडियो उदघोषक को सूचना व मनोरंजन के अलावा शुद्ध हिंदी के लिए भी सुना व जाना जाता था, परंतु आजकल कुछ उदघोषकों के हिंदी शब्द उच्चारण की खामियां आसानी से सामने आ जाती हैं। कौन भूल सकता है जसदेव सिंह, सुशील दोशी, रवि चतुर्बेदी, मुर्ली मनोहर मंजुल जैसे कॉमैंटेटरों की हिंदी की जादुई आवाज़ को जो श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देती थी। उनको सुनना आनंद तो देता ही था, परंतु साथ में हम हिंदी भाषा के शब्द, उनका उच्चारण और लहजे के बारे में काफ़ी कुछ सीख जाते थे। आजकल कुछ कॉमैंटेटर तो हिंदी की ऐसी खिचड़ी पेश करते हैं कि कबीर की सधुक्कड़ी गश खा जाए। उनको सुन कर हिंदी कॉमैंटेरी का ज़ायका ऐसा बिगड़ता है कि सुनने वाला यही कहता है ऐसी हिंदी कॉमैंटरी का तो बस खुदा ही मालिक। 
हिंदी दिवस पर हिंदी के विकास की बड़ी-बड़ी बातें होती हैं, परंतु इसके बाद ये सारी बातें हवा हो जाती हैं। मैं ये नहीं कह रहा हूं कि हिंदी को किसी तरह का खतरा है। हिंदी तो पूरे विश्व में फ़ल फ़ूल रही है। परंतु हिंदी को सम्मान का मतलब है इसे अपने दिल की भाषा जान कर सम्मान से अपने जीवन में अपनाना। इस सोच को बदलना होगा कि अंग्रेज़ी बोलने से आदमी विद्वान बन जाता है और हिंदी बोलने वाला अज्ञानी रह जाता है। हम बढ़िया हिंदी बोलें और लिखें और हमारे बच्चे भी बढ़िया हिंदी बोले और लिखें। जब हर घर में बढिया हिंदी होगी तभी हम कह सकते हैं, हां हिंदी हैं हम।

शिक्षक सम्मान की गरिमा लोग सर आंखों बिठाया करते हैं हमें मेरी सख्सियत इनाम की मोहताज नहीं- एक अध्यापक --- जगदीश बाली

शिक्षक दिवस पर इस समाचार पत्र के  पन्ने के एक ओर पीटर हॉफ में सम्मानित होने वाले अध्यापकों की सूची थी, तो इस सूची के बगल में इन इनामों के चयन में मैरिट सूची में गड़बड़ी की खबर थी। इसे देख और पढ़ कर हैरानी हुई मगर उससे ज़्यादा दुख हुआ। मन में सवाल उठा आखिर इन इनामों से सम्मान कैसा। जहां पीटर हॉफ की तड़क भड़क व चौंधियाती रौशनी के बीच 5 सितम्बर को शिक्षक समनानित हो रहे थे वहीं पुरस्कार चयन की मैरिट को ले कर उठते सवालों की खबर के बीच में शिक्षक सम्मान की गरिमा धूमिल होती प्रतीत हो रही थी। जब पुरस्कार वितरण की चकाचौंध वाले समारोह से ये शिक्षक बाहर आए होंगे तो इनामों पर उठते विवाद के धुंए को देख एक पल के लिए खुद को विषादित ज़रूर महसूस किया होगा। शिक्षक दिवस पर सम्मानित होना हर शिक्षक के लिए एक गर्व का विषय होता है और यह उसके जीवन की एक मुबारक घड़ी होती है। परंतु जब इन इनामों को ले कर सवाल खड़े हो जाएं, तो अध्यापक के सम्मान को ठेस ज़रूर पहुंचती है। ऐसे में योग्य एवं उपयुक्त पात्र सम्मान पा कर भी निराश ज़रूर होते हैं। कर वैसे तो एक आदर्श शिक्षक किसी इनाम का मोहताज़ नहीं होता क्योंकि उसकी शख्सियत की छवि शिष्यों के दिलोदिमाग पर छाई रहती है व वह अपने उत्कृष्ट शिक्षण से समाज में बिना इनाम के भी सम्मानित ही रहता है। परंतु उन्हें इनाम से नवाज़ना इस बात का द्योतक है कि समाज, सरकार व विभाग उनके उत्कृष्ठ कार्यों को तरज़ीह और सम्मान दे रहे हैं। इसीलिए हर वर्ष 5 सितंबर को शिक्षकों को इनाम दे कर सम्मानित करने की परिपाटी चली आ रही है। परिपाटी बुरी नहीं है और बनी रहनी चाहिए। परंतु पिछले कई वर्षों से प्रदेश में शिक्षक सम्मान विवादों में घिरता रहा है। कभी सामान्य छवि वाले सम्मानित हो गए, तो कोई उत्कृष्ट कार्य करने के बाद भी दरकिनार हो गया। किसी बेहतरीन शिक्षक के इनाम पाने की हसरत पूरी न हो सकी। कुछ वर्ष पहले तत्कालीन राज्यपाल व मुख्यमंत्री ने भी इनाम के लिए शिक्षकों के चुने जाने की प्रक्रिया पर पुरस्कार वितरण समारोह में ही नाराजगी जाहिर की थी। तब भी शिक्षक सम्मान के लिए अपनाई जा रही प्रक्रिया को बदलने की जोर-शोर से बातें हुई। हर वर्ष प्रक्रिया बदलने की बातें होती हैं, पर सिर्फ़ बातें होती है और बातों के अलावा कुछ नहीं होता। सिर्फ़ बातों से कुछ नहीं बदलता और शिक्षकों के इनाम के लिए चयन में कुछ खास नहीं बदला। नतीज़ा हर वर्ष इनामों को ले कर किच-किच हो ही जाती है। पिछले वर्ष भी विवाद हुआ, उससे पिछले वर्ष भी हुआ और इस वर्ष भी इन इनामों को ले कर किच-किच शुरु हो गई है।  धीरे-धीरे शिक्षक सम्मान की विश्वसनीयता भी कम होती जा रही है। विश्वसनीयता तो घटेगी ही जब चयन प्रक्रिया पारदर्शी नहीं होगी। यही कारण है कि बहुत से शिक्षक पात्र होते हुए भी इनाम के लिए आवेदन ही नहीं करते। उन्हें नहीं मालूम कि इनाम पाने के लिए सत्ता के किस दरवाजे को खटखटाना है। व्यवस्था ऐसी है कि सत्ता या विभाग की नज़र उनके उत्कृष्ट कार्यों को नहीं देख पाती है। या यूं कहिए कि वे नज़रअंदाज़ हो जाते है। देखने का चश्मा ही कुछ ऐसा है कि ऐसे शिक्षक सही सही दिखाई नहीं देते। उस चश्मे से जो दिखाई देते हैं उन्हें नवाज़ दिया जाता है। लिहाज़ा चश्मा बदलने की ज़रूरत है। वैसे ऐसे अध्यापकों को इस बात का कोई मलाल भी नहीं होता। वे तो इनामी शोरगुल से दूर ईमानदारी व कर्मठता से अपना कार्य कर रहे हैं। परन्तु इनाम पर होने वाले विवादों से इनामों की गरिमा को धक्का ज़रूर पहुंचता है। इस वर्ष कम शिक्षकों ने इनाम के लिए आवेदन किया था। अंतत: सम्मानित होने वाले शिक्षकों की संख्या 12 रह गई। बाकि मानकों पर खरे नहीं उतर पाए। जो खरे उतरे उनका भी मालूम नहीं कितने खरे उतरे और कैसे उतरे। उन्होंने इनाम के भवसागर को तैर कर पार किया या कोई कश्ती मिली कह नहीं सकते। 24 की जगह केवल 12 ही इनाम की विभागीय सीमा रेखा को पार कर पाए। पिछले वर्ष ये संख्या 16 थी। उधर राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए भी उपयुक्त दावेदार नहीं मिल पाए। केवल एक शिक्षक ही इस इनाम के भवसागर को पार कर पाया। सवाल ये भी उठता है कि क्या हमारे प्रदेश में इनाम योग्य अध्यापक ही नहीं है क्या? ज़रूर हैं , परंतु आवेदन कर इनाम पाने का तरीका कहीं न कहीं उन्हें रास नहीं आता। उधर विभाग के पास दूसरा कोई तरीका ही नहीं। सवाल ये भी है कि चयन समिति के सदस्य कितनी स्वायत्तता से चयन कर पाते हैं। सुना हैं शिक्षक दिवस पर सम्मानित होने वाले शिक्षकों की चयन समिति के सदस्यों पर 'ऊपर' का काफी दबाव रहता है। स्वतंत्र चयन करना मुश्किल हो जाता है। मेरा मकसद इनाम पाने वाले शिक्षकों की सेवाओं को कमतर आंकना नहीं। मैं ये भी नहीं कह रहा हूं कि जिसे इनाम मिला वो उपयुक्त चयन नहीं था। ये अध्यापक तो वास्तव में मुबारकबाद व सम्मान के हकदार हैं। मैं तो पारदर्शिता की बात कर रहा हूं। सम्मानित शिक्षकों के प्रोफ़ाइल उपलब्धियों सहित सार्वजनिक किए जाने चाहिए। एक तो इससे अन्य अध्यापक प्रेरित होंगे दूसरे पता भी चल जाएगा किसे किस कार्य के कितने अंक मिले। इनामों पर उठ रही उंगलियां भी कम हो जाएंगी और पारदर्शिता होने से विश्वसनीयता बढ़ेगी। हमें भी पता चले कि आखिर इनाम पाने की बला व कला क्या है। ये ज़रूरी नहीं कि शिक्षकों को इनाम के लिए आवेदन करना पड़े। विभाग को चाहिए कि कोई ऐसी प्रक्रिया अपनाई जाए जिससे इनाम के लिए उपयुक्त अध्यापकों  की खोज कर सके। इनाम की इच्छा रखने वाले शिक्षकों को भी चाहिए कि शौहरत व सेवा विस्तार के लालच में शिक्षक सम्मान की गरिमा को बनाए रखें। इनाम न मिले तो क्या, बेहतर शिक्षण भी अपने आप में बड़ा सम्मान है।

शिक्षक दिवस --- सचिन ठाकुर

पेशे से शिक्षक हो जाने का अर्थ शिक्षक हो जाना ही नहीं है। मैंने अपने आप को बहुत कम मौक़ों पर शिक्षक पाया है। ज़ियादहतर को-लर्नर की ही भूमिका रही। तब भी पद में शिक्षक होने के नाते इस बात पर विशेष मेहनत करता हूँ कि मेरे विद्यार्थी अपने उन बुजुर्गों के प्रभाव से बचे रहें जिनका मस्तिष्क एक बने-बनाए सुविधापूर्ण तंत्र का अभ्यस्त हो चला है।

मेरा स्वप्न है कि मेरे विद्यार्थी जब बड़े हों तब इनकी चेतना बाह्य-प्रभावों से मुक्त हो और वे आत्मानुशासित हों। उनके उद्देश्य और इरादे सुदृढ़ हों, पर निर्णय लचीले हों। महान लोगों के आदर्श उनके सामने हों, पर उनकी ग़लतियाँ मौलिक हों। आगे बढ़ने का अर्थ उनके लिए किसी अन्य से आगे बढ़ना न हो, स्वयं से आगे बढ़ जाना हो। जीवन के विभिन्न पक्षों पर चालाक चुप्पियाँ न हों, लेकिन एक गहरे मौन की जगह हमेशा बनी रहे। नकारात्मक क़िस्म की ऊर्जा के बीच पञ्चम सुर में गीत गाने का कौशल विकसित करें। आलोचना का स्पष्टीकरण कभी न दें। कम-अज़-कम एक वाद्य-यंत्र को बजाने या सुनने में उनकी रूचि पैदा हो। सारे विद्यार्थियों में संगीत की  बुनियादी समझ का होना अनिवार्य हो। दूसरों के जीवन पर जजमेंटल अप्रोच से बचें। समाज में समानता के अवसरों के लिए संघर्ष करें। विविधता को स्वीकार करें। आत्मपीड़क-आत्महंता कलाकारों-लेखकों में नायकत्व न तलाशें।

दो-चार बार दिल टूट जाने पर प्रेम करने से भयभीत न हों। 
अकेलेपन से भयभीत होकर प्रेम न करें। 

हालाँकि इन बातों के लिए परीक्षा में कोई नम्बर नहीं हैं, पर जीवन की मार्कशीट ठीकठाक बनेगी, निजी अनुभव से इतना तो कहा ही जा सकता है।

और आख़िरी बात, एक सुंदर-शांतिपूर्ण जीवन जीने पर अपराध-बोध न महसूस करें।

शिक्षक दिवस की हार्दिक बधाई " वो पुरस्कार ही कैसे जो मांगना पड़े- राजेश वर्मा

शिक्षक दिवस उन गुरुओं के सम्मान में देश भर में मनाया जाता है जो अपने शिष्यों का भविष्य संवारने के लिए अपना सबकुछ अर्पित कर देते हैं। आजाद भारत के पहले उपराष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्‍णनन ने अपने स्टूडेंट्स से अपना जन्मदिन मनाने की बजाए इसे शिक्षक दिवस के रूप में मनाने का आग्रह सभी शिक्षकों को सम्मानित करने के उद्देश्य से किया था। बदलते दौर में शिक्षक दिवस तो वही रहा लेकिन सम्मानित होने का पैमाना बदल गया, अब शिक्षक दिवस पर कुछेक शिक्षकों को राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत किया जाता है और इन पुरस्कृत शिक्षकों को ही सभी शिक्षकों का सम्मान समझ लिया जाता है। प्रदेश व देश में हर वर्ष 5 सितंबर को कुछेक शिक्षकों को पुरस्कृत करने की प्रथा पिछले कई वर्षों से चली आ रही है। लेकिन इन पुरस्कारों के पैमाने को लेकर हर बार सवाल खड़ा होता है? सवाल यह भी है कि क्या यह पुरस्कार व पुरस्कृत होने वाले इस सम्मान से न्याय कर पाते हैं? डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्‍णनन ने भी कभी नहीं सोचा होगा की शिक्षक दिवस पर पुरस्कार से सम्मानित करने के लिए एक तरह की प्रतियोगिता आयोजित होगी। क्या अजीब सा नहीं लगता की,  जब किसी शिक्षक को कोई कहे की आपको पुरस्कार दिया जाएगा परंतु इसके लिए आपको अपनी तारीफ और आपके द्वारा किए गए अच्छे कार्यों के सर्टीफिकेट लाने होंगे भले ही वह फ्राड क्यों न हो? 
सर्वप्रथम तो हैरानी इस बात पर होती है की इन पुरस्कारों के लिए शिक्षक को खुद का नामांकन खुद ही करना पड़ता है अर्थात मेरे व मेरे कार्य के बारे में मैं ही मुल्यांकन करके विभाग को बताऊं की मैं बहुत अच्छा शिक्षक हूं मैंने फलां-फलां काम किए हैं । कोई भी स्वाभिमानी इंसान यह कभी नहीं चाहेगा  कि कोई पुरस्कार पाने के लिए उसे प्रचार प्रसार व सिफारिश जैसे हथकंडे अपनाने पड़ें। इन पुरस्कारों के लिए जून 2017 में बनाई गई पालिसी के अनुसार शिक्षकों के पास नामांकन करने के लिए कम से कम 15 वर्ष का शैक्षणिक अनुभव होना चाहिए । क्या 15 वर्ष का अध्यापन करने बाद ही कोई शिक्षक पुरस्कार के योग्य समझा जाएगा ? हो सकता है कुछेक शिक्षकों का कार्य एक वर्ष बाद भी इतना प्रशंसनीय रहा हो जितना 15 वर्ष का अनुभव रखने वालों का न हो। 
परिणाम का पैमाना भी इसमें एक नियम है यह अच्छी बात है की अच्छा परिणाम देने वाले शिक्षकों को सम्मानित किया जाए लेकिन परीक्षा परिणाम तो बहुत से शिक्षकों का अच्छा रहता है। इसके अतिरिक्त स्कूल प्रबंधन समिति या अन्य स्थानीय संस्थाओं द्वारा प्रशंसा व पुरस्कृत होना, एसीआर अर्थात वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट का आधार,  अन्य गतिविधियों जैसी एनसीसी, एनएसएस, स्काउट गाइड, विज्ञान मेला, आपदा प्रबंधन, लेखन, आदि जैसी अन्य सामजिक गतिविधियों में सहभागिता के लिए भी अतिरिक्त अंक हैं। यह सब कार्य केवल पुरस्कार के लिए नामांकन करने वाले शिक्षकों द्वारा ही नहीं किए जाते सैकड़ों शिक्षक हैं जो यह सब कार्य करते हैं बस फर्क इतना है वह न तो पुरस्कार की फाईल बना पाते हैं, न ही इसे आगे बढ़ा पाते हैं। हर वर्ष जब भी पुरस्कारों की घोषणा होती है तो बहुत सी आवाज़ें इन पुरस्कारों को लेकर भी उठती हैं, कोई कहता है कि राजनीतिक पहुंच वाले शिक्षक पुरस्कृत हो गए तो किसी पर शिक्षण के अलावा चौधर-चारी करने के आरोप लगते रहे हैं। यह आरोप यूं ही नहीं लगते इसके पीछे भी बहुत सी वजहें हैं वैसे भी 'जो दिखता है वह बिकता है' की धारणा को बहुत से शिक्षकों ने अपनाया है। ऐसे बहुत से शिक्षकों को देखा जा सकता है जो शिक्षण की बजाए अन्य गतिविधियों में लिप्त रहते हैं कुछेक को अखबारों की सुर्खियों में बने रहने के लिए कुछेक बच्चें के साथ गतिविधियां करते देखा जा सकता है लेकिन सभी बच्चों के साथ क्यों नहीं? पुरस्कार मिलने के बाद एक बार उन स्कूलों में जाकर देखा जाना चाहिए कि क्या अब भी वह अपने कार्य को उसी तन्मयता से कर रहे हैं जैसा कि पुरस्कार मिलने से पहले कर रहे थे? क्या अब भी वहां के बच्चों का लर्निंग लेवल वही है जो पहले था? क्या पुरस्कार के बाद भी उस विद्यालय में एनरोलमेंट बढ़ा? आदि प्रश्न भी तो जांच का विषय हैं। 
सरकार व विभाग को शिक्षक पुरस्कार के लिए शिक्षकों से खुद नामांकन भेजने की बजाए एक ऐसी पारदर्शी नीति बनानी चाहिए जिससे इन पुरस्कारों की गरिमा व सभी शिक्षकों का सम्मान बना रहे। एक शिक्षक के कार्य का निष्पक्ष विश्लेषण उसके विद्यार्थियों के सिवा कोई और नहीं कर सकता लेकिन वर्तमान में अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने वाले शिक्षक को ही पुरस्कृत किया जा रहा है। शिक्षक का व्यवहार, उसका चरित्र, उसकी सोच व अन्य गुण भी उसके शिक्षार्थियों पर प्रभाव डालते हैं। पढ़ने लिखने के अलावा एक बेहतर नागरिक व इंसान बनाने के पीछे भी शिक्षक की ही अहम भूमिका रहती है। कोई बच्चा भले ही किसी कक्षा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण न हो पाए लेकिन यदि वह ऐसा नागरिक बनता है जिससे देश व समाज लाभान्वित हो तो वह शिक्षा परीक्षा परिणामों से भी कहीं बेहतर है। 

क्यों नहीं ऐसी व्यवस्था बनाई जाती जिसमें विभाग द्वारा प्रत्येक विद्यालय में किसी सामजिक संस्था के माध्यम से एक प्रश्नोत्तरी भेजी जाए जो विद्यालय के प्रत्येक छात्र को आवंटित की जाए जिसमें बच्चों के बौद्धिक स्तर का आकलन करने की चीजें शामिल हों, शिक्षक के व्यवहार से जुड़े प्रश्न हो, उसके शिक्षण से जुड़े प्रश्न हो अर्थात विद्यार्थियों को शिक्षक के पढ़ाने के तौर-तरीके कैसे लगते हैं , इसके अलावा शिक्षक विद्यालय में सामाजिक सहभागिता के कार्यों को क्रियान्वित करता है या नहीं? यह भी देखा जाए की कक्षा में पढ़ने वाले ज्यादातर बच्चों की राय एक जैसी है या कुछेक की ही? वह कौन-कौन से विद्यालय से संबंधित कार्यों का निर्वहन कर रहा है। इन बिंदुओं पर जांच निष्पक्ष तरीके से किसी अन्य ऐजसीं से हो न कि शिक्षक द्वारा खुद ही। आज भी ऐसे सैकड़ों शिक्षक है जिन्होंने अपने शिक्षण से विद्यार्थियों के मन में ऐसी जगह बनाई है जिसे वह जीवन भर एक पूंजी की तरह संचित करके रखते हैं और जीवन के हर मुकाम पर उन शिक्षकों को याद करना नहीं भूलते लेकिन दुर्भाग्य है वह शिक्षक कभी भी न तो किसी पुरस्कार के लिए चयनित होते हैं न ही वह आगे बढ़कर खुद आवेदन कर पाते हैं। लेकिन राज्य स्तरीय पुरस्कार से सम्मानित होने वाले शिक्षक का एक ही ध्येय रह जाता है की अब उसे जैसे तैसे राष्ट्रीय पुरस्कार मिल जाए चाहिए, फिर इसके लिए चाहे कोई भी प्रोपगंडा क्यों न करना पड़े। एक इमानदार शिक्षक कभी ढिंढोरा नहीं पीटता की वह इमानदार है। शिक्षक दिवस पर शिक्षक को पुरस्कृत करने की नीति बननी चाहिए न कि अपनी ब्रांडिंग करने का माध्यम। 

राजेश वर्मा (मंडी)