कैसे बढ़े शिक्षा की गुणवत्‍ता : एक शिक्षक का दृष्टिकोण - डॉ मामराज पुंडीर ( विशेष कार्य अधिकारी शिक्षा मंत्री , हिमाचल सरकार)

शिक्षक समाज की सर्वाधिक संवदेनशील इकाई है। शिक्षको को समाज में जो इज्जत, मान सम्मान मिलती थी वह समय रहते बदलती गई।विश्व गुरु कहलाने वाला और गुरु नगरी कहलाने वाला हमारा यह देश जिसमे भगवान राम के गुरु वशिष्ठ, भगवान् कृष्णा के गुरु सांदीपनी, और द्रोणाचार्य और चाणक्य जेसे शिक्षको ने जन्म लिया था और विश्व  विख्यात विभुतियों को निखारा था। उस समय गुरुओं को गुरु का सम्मान और आदर मिलता था। गुरु भी गुरु की भूमिका  निभाते रहें थे। राजाओं ने भी अपने दरबार में गुरुओं के लिए उच्चित स्थान के साथ साथ उचित्त सम्मान की व्यवस्था होती थी। राजा के दरबार में अगर गुरु का आना हो जाएँ  तो राजा उसे  अपना सोभाग्य मानते थे । गुरुओं ने भी गुरुकुल में अपने शिष्य को निहारने का काम बखूभी निभाया।
आधुनिकता के इस युग में  समय ने ऐसी करवट ली और गुरु गुरु से अध्यापक, फिर शिक्षक और अब मास्टर हो गये। और सम्मान और गरिमा दोनों को खोता देख अध्यापको ने भी समाज से समझोता कर लिया।

समाज ने भी अध्यापको को कोसने और गरिमा गिराने का कोई भी मौका नही जाने दिया। जब भी मौका मिला, सभी ने चाहे वह अधिकारी हो या नेता ,चाहे वह कर्मचारी हो या क्लर्क, सभी ने सिर्फ मौके के हिसाब से गुरुजनों को कोसने का काम किया। हालात यह हो गये कि अपने सम्मान को बचाने में लगे गुरुओं को समाज ने अपने अपने तरीके से कोसना शुरू कर दिया । नेता और अधिकारी यह भूल गये कि शायद उनको यहाँ तक पहुचाने में कुछ योगदान उस अध्यापक का भी है जिसे कोसने मे उसे आनन्द आता है ।
देश के कई राज्यों मे तबादला निति लागु करके एतिहासिक फेसला लिया है । देश के बाकि राज्य जिसमे हिमाचल प्रदेश भी शामिल है इस दिशा में अग्रसर है ।तबादला कानून में हिमाचल कोई फेसला कर जाएँ इसकी सभावना कम ही लगती है।क्योकि राज नेता और अधिकारी इसको लागु करवाने के लिए उत्सुक नही, क्योकि अधिकारियो और नेताओं का कोई न कोई विभाग मे सेवाए दे रहा होता है। कुछ संगठनो के पदाधिकारी भी इसका विरोध करेंगे । वजय साफ़ है शहर से लगाओ उनको विरोध के लिए मजबूर करता है। और यह सिर्फ हिमाचल प्रदेश जैसे राज्य में दस प्रतिशत से ज्यादा नही। परन्तु मेरा यह मानना है कि अपने खोये हुए सम्मान के लिए सभी शिक्षको को इसका स्वागत करना होंगा और तबादला होने या करवाने में जलील होने से बचना होंगा ।
 
शिक्षक  अपना काम ठीक तरह से नहीं करते- यह आरोप तो सर्वत्र लगाया जाता है। लेकिन यह विचार कोई नहीं करता कि उसे पढ़ाने क्यों नहीं दिया जाता ? आए दिन गैर-शैक्षिक कार्यों में इस्तेमाल करता प्रशासन, शिक्षकों की शैक्षिक सोच को, शैक्षिक कार्यक्रमों को पूरी तरह ध्वस्त कर देता है। बच्चों को पढ़ाना-सिखाना सरल नहीं होता और न ही बच्चे फाईल होते हैं। प्रशासनिक कार्यालय और अधिकारीगण शिक्षा और शिक्षकों की लगातार उपेक्षा करते हैं। उन्हें काम भी नहीं करने देते। इसी कारण स्कूली शिक्षा में अपेक्षित सुधार सम्भव नहीं हो पा रहा है।

स्कूली शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए हमें स्कूलों के बारे में अपनी परम्परागत राय को बदलना होगा। अभी स्कूलों को कार्यालय समझकर, शिक्षकों को प्रतिदिन अनेक प्रकार की डाक बनाने और आँकड़े देने के लिए मजबूर किया जाता है। इससे बच्चों की पढ़ाई में व्यवधान होता रहता है। बच्चे अपने शिक्षकों से सतत् जुड़े रहना चाहते हैं, विशेषकर प्राथमिक स्तर पर। अत: स्कूलों को कार्यालयीन कामकाज से वास्तव में मुक्त कर सभी प्रदेशो में ज्यादा से ज्यादा प्रभावी शिक्षण संस्थान को  बनाया जाना चाहिए।
 
विद्यालय बनाम सामुदायिक शिक्षण केन्द्र

हमारे शासकीय विद्यालय बाल शिक्षण (6-14 आयु वर्ग के बच्चों) के लिए कार्य कर रहे हैं। शिशु शिक्षण के लिए संचालित आँगनवाड़ी और प्रौढ़ शिक्षा के लिए कार्यरत सतत् शिक्षा केन्द्रों का सम्बंध विद्यालय से कहने भर को है। वास्तव में इन सभी के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है। यदि इन तीनों एजेंसियों को एकीकृत कर दिया जाए तो 3 से 50 वर्ष तक के लिए शिक्षण की बेहतर व्यवस्था सम्भव है|
यह भी जरूरी है कि आँगनवाड़ी कार्यकर्ता, शिक्षक और सतत शिक्षा केन्द्रों के प्रेरक को एक साथ मिल-बैठकर कार्य करने के लिए तैयार किया जाए। यदि तीनों एजेन्सी एकीकृत स्वरूप में कार्य करने लगे तो सम्भव है स्कूल की कार्यावधि 12 से 14 घण्टे प्रतिदिन तक हो जाए। साथ ही समुदाय के सभी वर्गों के लिए स्कूल में प्रवेश और सीखने के अवसर बढ़ सकते हैं।
अभी अधिकांश स्कूल अन्य सरकारी कार्यालयों की तर्ज पर  10 से 5 की अवधि में ही खुलते हैं। इस कारण से रोजगार में जुटे परिवारों के बच्चों के लिए वे अनुपयोगी सिध्द हो रहे हैं। स्कूल की समयावधि सरकारी नियंत्रण में होने के कारण बच्चों की उपस्थिति और सीखने का समय कमतर होता जा रहा है। स्कूली उम्र पार कर चुके किशोरों, युवाओं, महिलाओं और कामकाजी लोगों के लिए स्कूल के दरवाजे एक तरह से बन्द ही हैं। विद्यालय समाज की लघुतम इकाई के रूप में ''सामाजिक शिक्षण केन्द्र'' के रूप में कार्य कर सकते हैं। इस परिकल्पना को साकार करने की दिशा में पहल किए जाने का दायित्व स्थानीय ''पालक शिक्षक संघ'' पूरा कर सकते हैं। अगर समाज की जरूरत के चलते चिकित्सालय और थाने दिन-रात खुले रह सकते हैं, तो यह भी उतना ही आवश्यक है कि विद्यालय कम-से-कम 12-16 घण्टे जरूर खुलें।
 
शिक्षक-छात्र अनुपात ठीक हो
शैक्षणिक सुधार में शिक्षकों की भूमिका महत्वपूर्ण है। पाठयपुस्तकों और पाठयक्रम के अनुरूप प्रभावी शिक्षण, शिक्षकों की योग्यता, सक्रियता और पढ़ाने के कौशल पर निर्भर है। एक शिक्षक, एक साथ कितनी कक्षाओं के कितने बच्चों को भली-भाँति पढ़ा सकेगा, इस बारे में गम्भीरतापूर्वक विचार करने की जरूरत है।
आदर्श रूप में एक शिक्षक अधिकतम 20 बच्चों को ही ठीक प्रकार पढ़ा सकता है। वह भी तब, जब वे भी एक समान स्तर के हों। अभी व्यवस्था यह है कि एक शिक्षक 40 बच्चों को (और वे भी अलग-अलग स्तरों के हैं) पढ़ाएगा। अनेक स्कूलों में तो 70-80 से भी अधिक बच्चों को पढ़ाना पड़ रहा है। ऐसे में शिक्षक मात्र बच्चों को घेरकर ही रख पाते हैं पढ़ाई तो सम्भव ही नहीं। शिक्षक बच्चों को पढ़ा भी पाएँ, इस हेतु शिक्षक-छात्र अनुपात को व्यवहारिक बनाना होगा।
 
प्रशिक्षण, शिक्षण और परीक्षण
स्कूली शिक्षा में सुधार के लिए शिक्षण विधियों, प्रशिक्षण और परीक्षण की विधियों में भी सुधार करने की जरूरत है। अभी शिक्षण की विधियाँ राज्य स्तर से तय की जाती हैं। कक्षागत शिक्षण कौशलों को या तो नकार दिया जाता है या उन्हें परिस्थितिजन्य मान लिया जाता है।
अच्छे प्रशिक्षण के लिए प्रशिक्षण का दायित्व कर्तव्यनिष्ठ, योग्य और क्षमतावान प्रशिक्षकों को सौंपा जाना चाहिए। शिक्षकों के प्रशिक्षण को प्रभावी बनाने, शिक्षण में नवाचारी पध्दतियाँ विकसित करने सहित परीक्षण (मूल्यांकन) की व्यापक प्रविधियाँ तय कर उन्हें व्यवहारिक स्वरूप में लागू करने की दिशा में कारगर कदम उठाने की दृष्टि से यह आवश्यक है कि हर प्रदेश में एक ''शैक्षिक संदर्भ एवं स्त्रोत केन्द्र'' विकसित किया जाए।
 
शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार मूलक परियोजनाएँ
शिक्षा के क्षेत्र में अनेक संस्थाएँ कार्यरत हैं। रोजगार और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए भी शासकीय स्तर पर परियोजनाएँ और कार्यक्रम लागू किए गए हैं। मानव विकास के बुनियादी सूचकांक होते हुए भी इनमें तालमेल न होने के कारण इनकी गति अपेक्षित नहीं है। धन की गरीबी से ज्ञान की गरीबी का विशेष सम्बंध है। ग्रामीण दूरस्थ अँचलों में ज्ञान की गरीबी पसरी हुई है। जानकारी के अभाव में वे संसाधनों का उपयोग नहीं कर पाते। अनेक परियोजनाओं के बावजूद उनकी प्राथमिक शिक्षा, प्राथमिक चिकित्सा और बुनियादी रोजगार की प्रक्रियाएँ बाधित होती हैं। अब समय आ गया है कि शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के लिए लागू परियोजनाओं को समेकित ढ़ंग से किसी सुनिश्चित क्षेत्र में लागू कर परिणामों की समीक्षा की जाए। अच्छे परिणाम आने पर उन्हें पूरे देश भर में लागू किया जाए। इस प्रकार हम अपने संसाधनों और मानवीय क्षमताओं का बेहतर उपयोग कर सकेंगे जिससे शिक्षा के गुणात्मक विकास की संभावनाएँ बढ़ेंगीं।
 
पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तकें
अभी वास्तव में यह ठीक प्रकार तय ही नहीं है कि किस आयु वर्ग के बच्चों को कितना सिखाया जा सकता है और सिखाने के लिए न्यूनतम कितने साधनों और सुविधाओं की आवश्यकता होगी। नई शिक्षा नीति 1986 लागू होने के बाद न्यूनतम अधिगम स्तरों को आधार मानकर पाठ्यपुस्तकें और पाठ्यक्रम तो लगातार बदले गए हैं, लेकिन उनके अनुरूप सुविधाओं और साधनों की पूर्ति ठीक से नहीं की गई है। यह सोच भी बेहद खतरनाक है कि पाठ्यपुस्तकों के जरिए हम भाषायी एवं गणितीय कौशलों और पर्यावरणीय ज्ञान को ठीक प्रकार विकसित कर सकते हैं। यथार्थ में पाठ्यपुस्तकें पढ़ाई का एक छोटा साधन मात्र होती हैं साध्य नहीं। कक्षाओं पर केन्द्रित पाठयपुस्तकों और पाठ्यक्रम को श्रेणीबध्द रूप में निर्धारित करना भी खतरनाक है। बच्चों की सीखने की क्षमता पर उनके पारिवारिक और सामाजिक वातावरण का भी विशेष प्रभाव पड़ता है, अत: सभी क्षेत्रों में एक समान पाठ्यक्रम और एक जैसी पाठ्यपुस्तकें लागू करना बच्चों के साथ नाइन्साफी है।
 
शैक्षिक उद्देश्य
स्कूली शिक्षा में सुधार के लिए  हमें वर्तमान शैक्षिक उद्देश्यों को भी पुनरीक्षित करना होगा। शिक्षा, महज परीक्षा पास करने या नौकरी/रोजगार पाने का साधन नहीं है। शिक्षा विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास, अन्तर्निहित क्षमताओं के विकास करने और स्वथ्य जीवन निर्माण के लिए भी जरूरी है। शिक्षा प्रत्येक बच्चे को श्रेष्ठ इंसान बनने की ओर प्रवृत्त करे, तभी वह सार्थक सिध्द हो सकती है। कहा भी गया है ''सा विद्या या विमुक्तये''। अभी पढ़े-लिखे और गैर पढ़े-लिखे व्यक्ति के आचरण और चरित्र में कोई खास अन्तर दिखाई नहीं देता। उल्टे पढ़-लिख लेने के बाद तो व्यक्ति श्रम से जी चुराने लगता है और अनेक प्रकार के दुराचरणों में लिप्त हो जाता है। यह स्थिति एक तरह से हमारी वर्तमान शैक्षिक पध्दति की असफलता सिध्द करती है। अतः यह जरूरी है कि शिक्षा के उद्देश्यों को सामयिक रूप से परिभाषित कर पुनरीक्षित किया जाए।
 
शिक्षकों को ''शिक्षक'' के रूप में अवसर मिले
समान कार्य के लिए समान कार्य परिस्थितियाँ और समान वेतन की अनुशंसा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में और मानव अधिकार घोषणा पत्र के अनुच्छेद 21, 22, और 23 में वर्णित होते हुए भी नाना नामधारी शिक्षक मौजूद हैं। एक ही विद्यालय में अनेक प्रकार के शिक्षकों के पदस्थ रहते सभी के मन में घोषित-अघोषित तनावों के कारण पढ़ाई में व्यवधान हो रहा है। इस परिस्थिति को गम्भीरता से समझे बगैर और परिस्थितियों में सुधार किए बगैर भला शिक्षण में सुधार कैसे होगा? शासन को सभी शिक्षण संस्थाओं में कार्यरत शिक्षकों के लिए एक समान कार्यनीति, समान पदनाम, समान वेतनमान देने की नीति तय कर एक निश्चित कार्यावधि के बाद पदोन्नति देने का भी ऐलान करना चाहिए।
 

श्रेष्ठतम शैक्षिक कार्यकर्ता
शैक्षिक परिवर्तन के लिए शिक्षकों का मनोबल बनाए रखने और उत्साहपूर्वक कार्य करने की इच्छाशक्ति पैदा करने के लिए संगठित प्रयास करने होंगे। अभी शिक्षा व्यवस्था में बालकों और पालकों की भागीदारी न्यूनतम है, इसलिए सभी शैक्षिक कार्यक्रम सफल नहीं हो पाते हैं। स्कूलों में भी जिस प्रकार समर्पित स्वयंसेवकों की आवश्यकता है, वे नहीं हैं। अत: यह आवश्यक है कि श्रेष्ठतम शैक्षिक कार्यकर्ताओं की नियुक्ति की जानी चाहिए।
 
शिक्षकों का मनोबल बढ़ाया जाए
समूची दुनिया के सभी विकसित और विकासशील देशों में प्राथमिक शालाओं के शिक्षकों को आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक और प्रशासनिक दृष्टि से श्रेष्ठ माना जाता है। साथ ही ऐसी शिक्षा नीति बनाई जाती है जिसमें उनका मनोबल सदैव ऊँचा बना रहे। जब तक अनुभव जन्य ज्ञान, और कौशलों को महत्व नहीं दिया जाएगा तब तक ''बालकेन्द्रित शिक्षण'' की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकती है। बाल केन्द्रित शिक्षण के लिए कार्यरत शिक्षकों की दक्षता और मनोबल बढ़ाए जाने की आवश्यकता है।
यह आवश्यक है कि शिक्षकों को उनके व्यक्तित्व विकास की प्रक्रियाओं सहित ऐसे प्रशिक्षण संस्थानों में भेजा जाए जहाँ उन्हें अपने अन्दर झाँकने ,कुछ बेहतर कर गुजरने की प्रेरणा मिल सके। इस प्रशिक्षण उपरान्त उन्हें कार्यरत स्थलों पर ''ऑन द जॉब सपोर्ट'' के रूप में ऐसे सहयोगी दिए जाएँ जो उनकी वास्तविक मदद करें। किसी ऐसी संस्था को इस दिशा में काम करने की जरूरत है जो सामाजिक बदलाव के लिए व्यापक दूरदृष्टि और दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ काम करने के लिए सहमत हो और उसके पास स्वयं के संसाधन भी उपलब्ध हों।
आज जरूरत इस बात की है कि किसी प्रकार पढ़ने-लिखने की प्रक्रिया में परिवर्तन लाने के लिए विद्यालय प्रशासन, शिक्षकों और शैक्षिक कार्यक्रमों में तालमेल बनाया जाए। समुदाय की शैक्षिक आवश्यकताओं को पहचान कर उनकी जरूरतों के अनुरूप निर्णय लेते हुए ऐसा वातावरण बनाने की आवश्यकता है जिसमें व्यवसायिक योग्यता में वृध्दि सुनिश्चित हो। शिक्षा के प्रशासन एवं प्रबन्धन में उत्तरदायी भूमिका निभाने वाले संस्था प्रधानों की नियुक्ति और प्रशिक्षण हेतु शिक्षा विभाग एवं शिक्षा के क्षेत्र में कार्य कर रहे अन्य संगठनों को शीघ्र कारगर कदम उठाना चाहिए। संस्था प्रधानों की भूमिका को सशक्त बनाए बगैर शिक्षा में सुधार की सम्भावनाएँ अत्यन्त क्षीण रहेंगी। हिमाचल प्रदेश में अध्यापको को खास टूर से राजनितिक गलियारों में मास्टर शब्दों से संबोधन से अध्यापक को समाज हीन भावना से देखता है। इस प्रकार के प्रयोगों से राजनेताओं और अधिकारीयों को बचना होंगा।
कहते हेई जिस राज्य  में गुरु जनों का आदर नही होता वह राज्य  कभी उन्नत नही होता।
 
प्रशासनिक एवं प्रबन्धकीय व्यवस्थागत सुधार
शिक्षा प्रशासन की यह नियति बन गई है कि इसमें उच्च शिक्षा स्तर पर भी स्थायित्व नहीं है। राष्ट्रीय स्तर पर लागू राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 और कार्ययोजना 1992 में स्वीकृत अखिल भारतीय शिक्षा सेवा की स्थापना आज तक नहीं हो पाई है। लगभग हर स्तर पर निर्णायक पदों पर नियुक्त प्रशासनिक सेवा के अधिकारी शिक्षा क्षेत्र में आ रही गिरावट और असफलता के लिए उत्तरदायी नहीं माने जाते। हाँ, किसी छोटी-सी सफलता का श्रेय अवश्य हासिल करते नजर आते हैं। शिक्षा में सुधार के लिए कार्यरत शिक्षकों को समर्थन देने की दृष्टि से यह अत्यंत आवश्यक है कि शिक्षा के प्रबन्धन और प्रशासन को सुधारा जाए। म.प्र. शासन द्वारा वर्ष 2003 में गठित ''स्पेशल टास्क फोर्स'' की अनुशंसाओं को लागू किए जाने की भी आज महती आवश्यकता है जो एक दस्तावेज में सिमट कर रह गई हैं। म.प्र. देशभर में सर्वप्रथम जन शिक्षा अधिनियम तैयार कर लागू करने वाले प्रदेश के रूप में है। क्रियान्वयन के स्तर पर जरूर अनेक कार्य अभी शेष हैं जिसमें प्रमुख कार्य सभी स्तरों पर कार्यरत शिक्षा केन्द्रों के संचालन हेतु मैनुअल (संचालन मार्गदर्शिकाओं) का सृजन और उन्हें लागू करना है, ताकि कार्यरत स्टाफ बेहतर प्रदर्शन कर सके। प्रदेश के सभी जनशिक्षा केन्द्रों को प्रबन्धन और प्रशासन के प्रति उत्तरदायी भूमिका सौंपते हुए जनशिक्षा केन्द्र प्रभारी को आहरण वितरण अधिकार दिए जाने चाहिए। यह अत्यंत आवश्यक है कि समग्रत: शिक्षा व्यवस्था को नियंत्रित किए जाने हेतु राज्य की शिक्षा नीति तैयार की जानी चाहिए। कार्यरत शिक्षकों की दक्षता का सम्मान और उनकी कार्यदक्षता का उपयोग किए जाने की दृष्टि से विभागीय दक्षता परीक्षा का आयोजन कर सभी को प्रन्नोत किया जाना चाहिए। अंतत: शैक्षिक सुधार के लिए अब हमें विचार करने की बजाय कर्तव्य की ओर बढ़ना होगा।  
आज शिक्षा के क्षेत्र में वास्तविक सुधार की दृष्टि से शीघ्र सार्थक कदम उठाते हुए हमें ऐसी शिक्षण पध्दति और कार्यक्रम विकसित करने होंगे जो बच्चों के मन में श्रम के प्रति निष्ठा पैदा करें। समग्रत: एक ऐसा प्रभावी शैक्षिक कार्यक्रम बनाना होगा जिसमें –
1. पाठ्यक्रम लचीला और गतिविधि आधारित हो, साथ ही बच्चों की ग्रहण क्षमता के अनुरूप भी।
2. कक्षागत पाठ्य योजनाएँ, स्वयं शिक्षकों द्वारा तैयार की जाएँ और उन्हें पूरा किया जाए।
3. राज्य की शिक्षा नीति निर्धारण में शिक्षाविदों और कार्यरत शिक्षकों को वास्तव में सहभागी बना कर सभी के विचारों को महत्वपूर्ण स्थान दिया जाए।
4. जन भागीदारी समितियाँ (पालक शिक्षक संघ) प्रबन्धन का दायित्व स्वीकारें - शैक्षिक प्रशासन तंत्र भी शालाओं में अनावश्यक हस्तक्षेप न करें। शिक्षण का अधिकार शिक्षकों को वास्तव में सौंपा जाए।
5. शिक्षण विधियों में परिवर्तन करने का अधिकार शिक्षकों को हो, प्रशासनिक अधिकारियों को नहीं।
6. कक्षाओं में शिक्षक-छात्र अनुपात ठीक किया जाए, साथ ही पर्याप्त मात्रा में शैक्षिक सामग्री की पूर्ति और शिक्षकों की भर्ती की जाए।
7. पाठ्यपुस्तकों की रचना स्थापित रचनाकारों की बजाय शिक्षकों और शिक्षा विशेषज्ञों के माध्यम से की जानी चाहिए, जो शैक्षिक दृष्टि से उपयुक्त हो।
8. शैक्षिक सुधारों को लागू करने में संस्था प्रधानों और शिक्षकों की भूमिका को महत्वपूर्ण माना जाए।
9. शिक्षकों के सहयोग हेतु ''राज्य शिक्षक सन्दर्भ और स्त्रोत केन्द्र'' स्थापित किए जाएँ।
10.  विद्यालयों को सामुदायिक शिक्षण के लिए उत्तरदायी बनाया जाए।
11. सभी राज्यों में तबादला निति को लागु करना चाहिए।

       विचारो से हो सकता है कोई सहमत नही होंगा, परन्तु मेरे निजी विचारो को स्वीकार करे ।

Dr Mam Raj Pundir
C/O Correstophen estate set No 35
Nera IGMC Shimla
9418890000
अभिभावकों के योगदान के बिना बच्चों का सर्वांगीण विकास होना असंभव है। एक तरफ देश में बच्चों की शिक्षा-दिक्षा के साथ-साथ उसके सर्वांगीण विकास के लिए शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत प्रत्येक विद्यालय में स्कूल प्रबंधन समिति के गठन का प्रावधान और नियम के अनुपालन, अनुश्रवण व संस्तुति को अनिवार्य किया गया है वहीं पर अभिभावक अपने बच्चों को भार समझ कर विद्यालय में अध्यापक के हवाले कर के अपने आप को ऐसे हल्का महसूस करते हैं जैसे कोई मुसीबत अपने सिर से टाल कर भविष्य में सुख शांति का कोई प्रावधान कर दिया हो। 
      पाठशाला में होने वाली बैठकों में अभिभावकों की बमुश्किल बीस प्रतिशत उपस्थिति दर्ज की जाती है जिसके चलते न तो अध्यापक बच्चों के विषय में अभिभावकों से विचार विमर्श कर सकते हैं और न ही अभिभावकों द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में कुछ जरूरी बदलाव के लिए कोई सलाह मश्विरा मिल पाता है। अभिभावकों की अपने बच्चों के प्रति इस दिशा में बेरुख़ी होना जहाँ पर उसकी पढ़ाई को बाधित करता है साथ में बच्चों के अन्दर अन्य गुणों के ऊपर भी आवरण लगा लेता है। अगर अभिभावकों और अध्यापकों के बीच सही सामंजस्य बैठ जाए और सयम समय पर बच्चों की कमियाँ और उसके अन्दर छिपे गणों को सही दिशा सही मंच मिल जाए तो बेहतरीन परीणाम देखने को मिल सकते हैं। आवश्यक है कि स्कूल प्रबंधन समिति की बैठक अभिभावकों की हाजिरी सुनिश्चित की जाए और वहाँ की कमियों का निराकरण कर सर्वांगीण विकास में अपनी भूमिका निभाई जाए। 

राजेश सारस्वत

असम्भव है इन्क्लूसिव एजुकेशन --- सचिन ठाकुर

शिक्षक हूं साहब।परिस्थितियों को समझना ,उनका विश्लेषण करना ,स्वतंत्र चिंतन करना मेरे शिक्षक होने का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू है।
मैं हमेशा लिखता रहता हूं कि शिक्षण कोई व्यवसाय नहीं है,ये जुनून है, तप है और मानवता की सबसे महत्वपूर्ण सेवा है।इसलिए शिक्षण वायवस्था को पूरी तरह शिक्षा विदों के हवाले किया जाना चाहिए । शिक्षण व्यवस्था को बेहद अन प्रोफेशनल लोग चला रहे हैं जिनको जमीनी स्तर की कोई जानकारी नहीं है।
2008 में हाई कोर्ट के चाबुक से शिक्षा विभाग ने आनन फानन में पीपल विध डिसएबिलिटी एक्ट 1995 को लागू करने हेतु शिक्षकों को स्पेशल चिल्ड्रन को पढ़ाने हेतु सेंसेताइज़ करने के लिए एक हफ़्ते की विशेष कक्षाएं एस सी ई आर टी सोलन और जिला डाइट में आयोजित की । मैं इस कार्यक्रम का राष्ट्रीय स्त्रोत व्यक्ति था।मुझे इसके लिए सोलन और देहरादून में प्रशिक्षित किया गया था।दो साल चले इस कार्यक्रम में मैंने लगभग 36 हज़ार शिक्षकों को प्रशिक्षित किया।मैंने खुद इसके लिए प्रभाव शाली पॉवर प्वाइंट प्रेजेंटेशन बनाई और इंटरनेट से बेहद दिलचस्प डाटा और ज्ञान इक्कठ्ठा किया।
आप में से बहुत शिक्षक जो इस प्रशिक्षण का हिस्सा रहें है वो गवाही से सकते की वो कक्षाएं प्रभावी थी।
परन्तु इस प्रशिक्षण के 10 साल बाद मुझे आपको ये बताते हुए तनिक भी संकोच नहीं हो रहा कि जो कुछ मैं उस प्रशिक्षण में आपको बता रहा था,जो कुछ मुझे राष्ट्रीय कार्यशाला में समझाया गया था,जिन तरीकों से मुझे टेकनाईज किया गया था वो सब पूर्णतः बकवास और गैर सतही था।
आजकल धरमशाला बाल विद्यालय में कार्यरत हूं।मेरे स्कूल में स्पेशल चिल्ड्रन हेतु आई डी विंग का विद्यालय भी समाहित है।आजकल स्पेशल चिल्ड्रन हेतु विशेष प्रशिक्षण शिविर विद्यालय में चल रहा है। एस एस ए के माध्यम से चल रहे इस शिविर के इंचार्ज मेरे घनिष्ठ मित्र बी आर सी संजय निरूला जी हैं।उनके आमंत्रण पर मैं शिविर में विशेष बच्चों से मिलने गया। बच्चों के साथ बैठा।उनके जीवन के संघर्ष को बेहद नजदीक से देखने का मौका मिला।उनकी सीखने की कूवत,छोटी छोटी चीजों को सीख उसे कर दिखाने का उल्लास मेरी पलकों को गीला कर गया।उनकी विकलांगता मुझे अंदर तक हिला देने के लिए काफी थी।कुछ बच्चे बोलने में अक्षम थे,कुछ देखने में,कइयों के हाथ पांव टेढ़े तो कई  सलो लेर्नर।कोई मेंटली रेतार्डेड बच्चा तो कोई किसी व्याधि से ग्रस्त।
मैं निसंदेह नास्तिक हूं परन्तु किसी भी मानव को इस कदर बेसहारा और दयनीय स्थिति में देख भावुकता में मैं आसमान कि तरफ देख कर एक दो गाली जरूर दे देता हूं।ऐसा इस बार भी हुआ।मैंने बच्चों कि कुछ तस्वीरें ली,जो इस पोस्ट के साथ शेयर कर रहा हूं,उनको शाबाशी दी।मेरा स्नेह पाकर वो विभोर भी हुए।
परंतु मानवीय स्तर पर दयावश आप इन बच्चों को भाग्य के सहारे नहीं छोड़ सकते।मैंने महसूस किया कि आज से दस साल पहले मैंने जो कुछ प्रशिक्षण के दौरान सीखा था और हज़ारों शिक्षकों को सीखाया था वो एक दम बेईमानी था।आप इन बच्चों को आम बच्चों के साथ रख बेहद अमानवीय कार्य कर रहे हैं।एक्सक्लूसिव एजुकेशन की अवधारणा सही थी।विशेष बच्चों हेतु विशेष विद्यालय ही सही है।आम बच्चों के साथ बैठ वो ना तो उस रफ्तार से कुछ सीख सकते  ना ही आम अध्यापक विशेष बच्चों को कुछ सीखा सकता है।
ये असम्भव है।
एक सप्ताह के प्रशिक्षण के बाद आम अध्यापक से आशा करना की को विशेष बच्चों को पढ़ाने लायक हो गया बिल्कुल वैसा है जैसे धरमशाला से अण्डमान निकोबार पैदल जाना।
इन्क्लूसिव एजुकेशन का मूल कारक डिसेबल चिल्ड्रन को आम बच्चों के साथ बीठा उनमें आत्मीयता पैदा करना था।आप हैरान होंगे कि मेरे विद्यालय की कक्षा सात में सभी बच्चे स्पेशल हैं।कोई भी आम बच्चा इस कक्षा में है ही नहीं।सामान्य बच्चों के अभिभावकों ने अपने बच्चे विद्यालय से हटा लिए।तो आत्मीयता पैदा हुई के नहीं इस पर शोधार्थियों को शोध कर सरकार और न्याय पालिका तक पहुंचाना चाहिए,परंतु एक पूरी कक्षा से सामान्य बच्चे गायब हो गए ये मैं बता देता हूं।सामान्य बच्चों के अभिभावक गलत नहीं है।सामान्य बच्चों के लिए प्रतियोगिता निर्बाध गति से दिन पर दिन कठिन होती जा रही।वो अपने बच्चों को विशेष बच्चों के साथ बिठा जोखिम नहीं ले सकते।शिक्षक भी कतई खुश नहीं हैं।अलबत्ता तो वो विशेष बच्चों  को सीखाने के योग्य है नहीं है दूसरा उनको अपना सिलेबस पूरा करना है और रिजल्ट के चाबुक से भी पार पाना है।ये दोनों काम आपकी कक्षा में स्पेशल चिल्ड्रन होते हुए संभव नहीं है।
इसलिए जरूरी है कि इन्क्लूसिव एजुकेशन पर नए सिरे से बहस हो।प्रकृति पहले ही इन मानव पुत्रों पर जुल्म ढा चुकी है,हम इन पर इतनी बेरहमी नहीं दिखा सकते।
कोई भी जो शिक्षण व्यवस्था के निर्णय लेने वाली संस्थाओं से जुड़ा हो इस लेख पर गौर फरमाए।कोई भी वकील मित्र कोर्ट में इस बारे पी आई एल दायर करे।मेरी नजर में ये मानवता की महान सेवा होगी। मैं विश्व विद्यालयों को भी इन्क्लूसिव एजुकेशन के विपरीत प्रभावों पर गहन शोध करने हेतु आमंत्रित करता हूं। पीपल विद्घ डिसएबिलिटी एक्ट 1995 के वास्तविक ध्येय और हासिल के अध्ययन हेतु में मानव संसाधन मंत्रालय और यू जी सी को भी आमंत्रित करता हूं।
मैंने स्पेशल एजुकेटर्स से भी बात की।उनमें से एक भी इन्क्लूसिव एजुकेशन के पक्ष में नहीं था।उनमें से हर किसी का मानना था कि सामान्य बच्चों के साथ स्पेशल चिल्ड्रन का उठना बैठना ,खेलना और खाना तक हो सकता,लेकिन सीखना नहीं।उनको एक ही कक्षा में बैठाना सनक है, अमानवीय है।स्पेशल स्कूल्स में   शायद ही उनको पता चले कि प्रकृति ने उनके साथ कठोर अन्याय किया है ,सामान्य स्कूल में तो हर सेकंड उनको महसूस होता की वो विकलांग है।उनकी हीन भावना घटती नहीं बल्कि कई गुना मल्टीप्लायी हो रही है।
स्पेशल बच्चों के साथ काम करना बेहद कठिन और जटिल है।आप दो मिनट में ही विचलित और फ्रस्टेट हो सकते।सोचिए स्पेशल एजुकेटर्स जो पूरा दिन इन बच्चों के साथ गुजारते हैं।वो उन बच्चों को सीखा रहे जिनके सीखने की अलबत्ता क्षमता है ही नहीं और अगर है भी तो बेहद धीमी।
मुझे लगा इतना सिर खपायू और विचलित करने वाला काम करने  वाले शिक्षकों को बेहद सम्मानजनक और आम शिक्षक से कोई 50 गुना ज्यादा वेतन मिलता होगा।
कोतुहल वश मैंने पूछ भी लिया।सामने बैठी स्पेशल एजुकेटर्स विकलांग बच्चों को सिखाते वक्त,एक ही चीज को बीस बीस बार रिपीट कर इतनी असेहज नहीं थी जितनी इस सवाल को सुन कर हुई।आंखों में नमी लिए एक महिला साथी स्पेशल एजुकेटर ने जवाब दिया," पीछले बीस सालों से सेवा ही के रहे सचिन सर।।9000 ₹ से शुरू किया था।ना रेगूलर हुए ना वेतन में वृद्धि हुई।अब भी नौ हज़ार रुपए ही देती है सरकार..... "
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता भौतिक शास्त्र,

छात्र राजनीति से राजनीति में आये हिमाचल प्रदेश के शिक्षा मंत्री एक सादर स्वभाव के व्यक्तित्व है। हिमाचल प्रदेश में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के संगठन मंत्री रहे आदरणीय सुरेश भारद्वाज का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ और उनका बचपन हिमाचल के पूर्व मुख्यमंत्री आदरणीय वीरभद्र जी के प्रागण मे गुजरा। हिमाचल प्रदेश के सरकारी विद्यालय राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला छोटा शिमला से अपने शिक्षा की शुरुआत करने वाले और रोहड़ू के दूरदराज़ क्षेत्र  राजकीय उच्च पाठशाला पेखा में अपनी पढ़ाई करने वाले और  जब राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला घुमारवीं अपनी विज्ञान की पढ़ाई कर रहे थे तो उनका परिचय राष्ट्रीय स्वंसेवक  संघ से हुआ और बाद उन्होंने वह प्रचारक निकल गए। संगठन की रूप रेखा को बखूबी समझने वाले सुरेश जी को हिमाचल प्रदेश में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के संगठन मंत्री का दायित्व दिया। उसके बाद सुरेश जी ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में राष्ट्रीय महामंत्री के दायित्व को बखूबी निभाया और हिमाचल प्रदेश में जनता दल के युवा मोर्चा के अध्यक्ष बने। जब भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष कलराज मिश्र जी थे तो सुरेश भारद्वाज जी को हिमाचल प्रदेश के युवा मोर्चा के अध्यक्ष के दायित्व दिया गया। देश की पूर्व प्रधानमंत्री आदरणीय इंदिरा गांधी की दमनकारी नीतियों और देश मे 1975 में थोपी गई आपातकाल के दौरान आदरणीय सुरेश भारद्वाज जी काफी समय तक भूमिगत रहे और बाद में जब उन्हें पकड़ लिया गया तो काफी समय तक जेल में रहे। कठोर कारावास की सजा दी। इनकी लग्न और कर्मठता को देखते हुए जब जनसंघ का विलय जनता पार्टी में हुआ तो इन्हें 1977 में  जनता युवा मोर्चा के प्रांत अध्यक्ष बना दिया। छात्र राजनीति से राजनीति में आने वाले भारद्वाज जी को शिमला बीजेपी मण्डल का 1988 में  अध्यक्ष  बनाया और साथ मे भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष का दायित्व दिया जिसमें देश के उपराष्ट्रपति आदरणीय वेंकैया नायडू जी उस समय अध्यक्ष थे। युवा मोर्चा अध्यक्ष रहते उन्हें 1990 में शिमला से भारतीय जनता पार्टी का टिकट दिया अरब37 वर्ष की उम्र में शिमला से सुरेश भारद्वाज 5800 मतों से जीतकर विधायक बने। परन्तु ढाई वर्ष तक विधायक रहने के बाद केंद्र की कांग्रेस सरकार ने हिमाचल में बनी शांता कुमार की सरकार को बर्खास्त कर दिया और जब 1993 में दोबारा चुनाव हुए तो सुरेश भारद्वाज चुनाव हार गए।  प्रदेश की राजनीति में अपनी अलग पहचान बना चुके आदरणीय सुरेश भारद्वाज जी को 2002 से 2007 तक राज्यसभा के लिए मनोनीत किया और साथ ही जब देश के प्रधानमंत्री आदरणीय नरेंद्र मोदी जी प्रदेश के प्रभारी थे तब उन्हें 2003 मे पार्टी के प्रदेश भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष का दायित्व दिया। राज्यसभा के सांसद रहते आदरणीय सुरेश जी chief whip यानी मुख्यसचेतक भी रहे।  प्रदेश के अध्यक्ष रहते उन्होंने संगठन की मजबूती के लिए दिन रात काम किया और उसके बाद वर्तमान में प्रदेश के मुख्यमंत्री आदरणीय जय राम ठाकुर जी ने बीजेपी के अध्यक्ष का पद ग्रहण किया और हिमाचल में बीजेपी की सरकार बनाई। 2007 से लगातार  तीन बार  शिमला का प्रतिनितित्व करने वाले भारद्वाज जी दो बार लगातार पार्टी के मुख्यसचेतक यानी चीफ व्हिप भी रहे।
शिमला के विधायक माननीय सुरेश भारद्वाज जी को पहली बार मंत्री बनकर अपनी प्रतिभा को दिखाने का मौका सरकार में मिला वैसे विधायक रहते भी उन्होने अनेकों बार अपनी बुद्धि और तजुर्बे से विधानसभा व विधानसभा के बहार अपनी बात का लोहा मनवाया है।

हिमाचल प्रदेश के शिक्षामंत्री एक कुशल वक्ता के साथ साथ एक ईमानदार नेता के रूप में देश और प्रदेश में पहचाने जाते है। हिमाचल प्रदेश का सबसे बड़ा विभाग शिक्षाविभाग का दायित्व आदरणीय सुरेश भारद्वाज जी को जो पद प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा आज नवाजा गया है वह उसके हकदार बहुत पहले से थे  परंतु राजनीति में सब जायज है ऐसा मेरा मानना है और जो उस पर खरा उतर जाए वो राजनीति का असली हीरा है।

हिमाचल प्रदेश में जब से नई सरकार आदरणीय जय राम जी के नेतृत्व में बनी है, हिमाचल के शिक्षा मंत्री प्रदेश को नई ऊंचाइयों तक ले जाने में प्रयासरत है।
पिछले दो साल से लगातार हाल ही में मीडिया का सबसे बड़ा समूह इंडिया टुडे द्वारा हिमाचल को शिक्षा के क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ राज्य घोषित कर इन्होंने अपने दृष्टिकोण की शुरूआत कर दी है। हिमाचल प्रदेश को शिक्षा में शिखर पर पहुचाने के लिए दिन रात काम कर रहे है।
देश के बड़े राज्यो को लगातार दूसरी बार पछाड़ते हुए शिक्षा के क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ राज्य घोषित होना हिमाचल के लिए गर्व की बात है।

इनके द्वारा शुरू की गई योजना  1.
1.
अखण्डशिक्षाज्योतिमेरेस्कूलसेनिकलेमोती# आने वाले कुछ वर्षों में हिमाचल के सरकारी विद्यालयों की दशा में परिवर्तन करेगा।
2.
अटल आदर्श आवासीय विद्या केंद्र हिमाचल के शिक्षा मंत्री का एक सपना है जिसे पूरा करने का स्कल्प इनकी कर्मठता को दर्शाता है।
3.
हिमाचल प्रदेश में संस्कृत को द्वितीय भाषा घोषित करना और दूसरी कक्षा से शुरू करना हिमाचल प्रदेश में एक नई पहल है
4.
पिछले दो सालों में हिमाचल प्रदेश के स्कूलों में शिक्षकों के खाली पदों को भरने का काम हिमाचल प्रदेश के शिक्षा मंत्री बखूबी से निभा रहे है। शिक्षा मंत्री ने दस हजार से ज्यादा नियुक्तियां दो वर्षों में कर दी है और 5000 से ज्यादा नियुक्तियां इस वर्ष होनी है।

5. आज हिमाचल प्रदेश के ज्यादा तर जिलो में कोई पद खाली नही है जिसका श्रय हिमाचल की सरकार को जाता है।
6. हिमाचल प्रदेश में भाषा लेब, विसुअल क्लासरूम जैसे फैसले लेकर नई शुरुआत की है।
7. हिमाचल प्रदेश के सरकारी विधायकों में काम करने वाले पीटीए, पैरा और SMC अध्यापको को वित्तीय लाभ देकर हजारों बिरोजगारो को आर्थिक लाभ देना एक बहुत बड़ी उपलब्धि है जिनका शोषण कांग्रेस सरकार पिछले 15 वर्षों से कर रही थी।

हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री आदरणीय जय राम ठाकुर जी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करने वाले भारद्वाज जी को जो भी दायित्व हिमाचल के मुख्यमंत्री और संगठन ने दिया, उसके लिए सुरेश भारद्वाज ने दिन रात एक किया। मुझे याद है जब शिमला के कुसुम्पटी विधानसभा से सम्बंधित वार्ड सांगठी में पार्षद के उपचुनाव होने थे। यह चुनाव हिमाचल सरकार की पहली परीक्षा थी। दिन रात काम करने वाले भारद्वाज जी, जब कुछ नेता सिर्फ नजर लगाए बैठे थे भारद्वाज जी ने घर घर जाकर प्रचार किया और हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री के आदेशों का पालन किया।
पच्छाद उप चुनाव में भारद्वाज जी को जो क्षेत्र चुनाव में दिया गया था उस क्षेत्र में कभी बीजेपी को लीड नही मिलती थी। राजगढ़ बाजार  बीजेपी के साथ लोकसभा में भी नही होता था। परन्तु भारद्वाज जी की सादगी और कठिन परिश्रम से भाजपा को पहली बार लीड मिली।

हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री के साथ हमेशा सच्चे सारथी  और सच्चे दोस्त की भूमिका में रहने वाले भारद्वाज जी हमेशा कड़े फैसले लेने के लिए जाने जाते है। आदरणीय जय राम ठाकुर जी के साथ लक्ष्मण और हनुमान की भूमिका निभाने वाले भारद्वाज जी एक कर्मठ कार्यकर्ता के साथ साथ कुशल राजनीतिज्ञ  और ईमानदार व्यक्ति है जो आज की राजनीति में बहुत कम देखने को मिलता है ।
डॉ मामराज पुंडीर की कलम से

विश्व शिक्षक दिवस

पुरे विश्वभर में 05 अक्टूबर को विश्व शिक्षक दिवस (World Teachers Day) मनाया जाता है. इसे अंतरराष्ट्रीय शिक्षक दिवस (International Teachers Day) के रूप में भी जाना जाता है. यह दिवस दुनिया में शिक्षकों की स्थिति में सुधार लाने के उद्देश्य से मनाया जाता है. यूनेस्को और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के बीच वर्ष 1966 में हुई बैठक में इसका निर्णय लिया गया था.


विश्व शिक्षक दिवस न केवल शिक्षकों के लिए बल्कि छात्रों के लिए भी एक विशेष दिन है. इस दिन, शिक्षकों और सेवानिवृत्त शिक्षकों को उनके विशेष योगदान के लिए सम्मानित किया जाता है. हरेक साल यूनिसेफ, यूएनडीपी, अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन और शिक्षा अंतरराष्ट्रीय द्वारा एक साथ मिलकर विश्व शिक्षक दिवस के कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है.

यूनेस्को और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन द्वारा साल 1966 में शिक्षकों के अधिकारों, जिम्मेदारियों, रोजगार और आगे की शिक्षा के साथ सभी गाइडलाइन बनाने की बात कही गई थी. बता दें कि संयुक्त राष्ट्र (UN) ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा के क्षेत्र में उपलब्धियों को जानने तथा उससे जुड़ी समस्याओं को पहचानने हेतु साल 2030 का लक्ष्य रखा है.

विश्व शिक्षक दिवस 2019 का थीम

विश्व शिक्षक दिवस 2019 की थीम 'Young Teachers: The future of the Profession' है. इस अवसर पर, यूनेस्को ने अपने ज्ञान को साझा करने हेतु स्कूल प्रिंसीपल, शिक्षक यूनियन, अभिभावक-शिक्षक संघ, शिक्षा अधिकारी, स्कूल प्रबंधन और प्रशिक्षकों को आमंत्रित किया है.

विश्व शिक्षक दिवस का इतिहास

विश्व शिक्षक दिवस 05 अक्टूबर को प्रत्येक साल पूरी दुनिया में मनाये जाने लगा है. विश्व शिक्षक दिवस की शुरुआत साल 1994 में हुई थी. संयुक्त राष्ट्र ने विश्व शिक्षक दिवस को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनाने हेतु साल 1994 में यूनेस्को की सिफारिश पर लगभग 100 देशों के समर्थन देने के बाद इस बिल को पारित किया था. विश्व शिक्षक दिवस इसके बाद 05 अक्टूबर को मनाये जाने की शुरुआत हो गई.

विश्व शिक्षक दिवस का महत्व

यूनेस्को और अंतरराष्ट्रीय शिक्षा (ईआई) विश्व शिक्षक दिवस मनाने हेतु प्रत्येक साल एक अभियान चलाता है जिससे की लोगों को शिक्षकों की बेहतर समझ तथा छात्रों और समाज के विकास में उनकी भूमिका निभाने में सहायता मिल सके.