डूबा है किसी सोच में 
करने को कुछ काम नहीं 
नोजवान इस देश का 
हैरान है परेशान हैं 
सोचो कुछ संसद में बैठने वालों 
ये बेरोजगार है कोई नाकाम नहीं
नोजवान इस देश का 
हैरान हैं परेशान हैं 


यूँ तो देश अनेक प्रकार की समस्याओं से घिरा हुआ है लेकिन आज देश का देश का भविष्य कुछ परेशानी सी महसूस कर रहा है। युवाओं में फैलता ये असंतोष एक गंभीर समस्या है। देश के युवा वर्ग में बढ़ते असंतोष के अनेक कारक हैं । कुछ तो हमारे देश की वर्तमान परिस्थितियाँ इसके लिए उत्तरदायी हैं तो कुछ उत्तरदायित्व हमारी त्रुटिपूर्ण राष्ट्रीय नीतियों एवं दोषपूर्ण शिक्षा पद्‌धति का भी है । अनियंत्रित रूप से बढ़ती जनसंख्या के फलस्वरूप उत्पन्न प्रतिस्पर्धा से युवा वर्ग में असंतोष की भावना उत्पन्न होती है । जब युवाओं के हुनर का कोई राष्ट्र समुचित उपयोग नहीं कर पाता है तब युवा असंतोष मुखर से हो उठता है। 
हमारी शिक्षा पद्‌धति युवा वर्ग में असंतोष का सबसे प्रमुख कारण है । स्वतंत्रता के सात दशकों बाद भी हमारी शिक्षा पद्‌धति में कोई भी मूलभूत परिवर्तन नहीं आया है । हमारी शिक्षा का स्वरूप आज भी सैद्‌धांतिक अधिक तथा प्रयोगात्मक कम है जिससे कार्यक्षेत्र में शिक्षा का विशेष लाभ नहीं मिल पाता है ।
परिणामस्वरूप देश में बेकारी की समस्या दिनों-दिन बढ़ रही है । शिक्षा पूरी करने के बाद भी लाखों युवक रोजगार की तालाश में भटकते रहते हैं जिससे उनमें निराशा, हताशा, कुंठा एवं असंतोष बढ़ता चला जाता है । देश में व्याप्त भ्रष्टाचार से भी युवा वर्ग पीड़ित है ।
सभी विभागों, कार्यालयों आदि में रिश्वत, भाई-भतीजावाद आदि के चलते योग्य युवकों को अवसर मिल पाना अत्यंत दुष्कर हो गया है । ये नीतियाँ या तो दोषपूर्ण होती हैं या उनका कार्यान्वयन सुचारू रूप से नहीं होता है जिससे इसका वास्तविक लाभ युवा वर्ग को नहीं मिल पाता है ।
आज देश का युवा वर्ग कुंठा से ग्रसित है । सभी ओर निराशा एवं हताशा का वातावरण है । चारों ओर अव्यवस्था फैल रही है । दिनों-दिन हत्याएँ, लूटमार, आगजनी, चोरी आदि की घटनाओं में वृद्धि हो रही है । आए दिन हड़ताल की खबरें समाचार-पत्रों की सुर्खियों में होती हैं । कभी वकीलों की हड़ताल, तो कभी डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक आदि हड़ताल पर दिखाई देते हैं । छात्रगण कभी कक्षाओं का बहिष्कार करते हैं तो कभी परीक्षाओं का । ये समस्त घटनाएँ युवा वर्ग में बढ़ते असंतोष का ही परिणाम हैं।
देश के युवा वर्ग में बढ़ता असंतोष राष्ट्र के लिए चिंता का विषय है । इसे समाप्त करने के लिए आवश्यक है कि हमारे राजनीतिज्ञ व प्रमुख पदाधिकारी निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर देश के विकास की ओर ध्यान केंद्रित करें एवं सुदृढ़ नीतियाँ लागू करें । इस बात का विशेष ध्यान रखें कि उनका कार्यान्वयन नियमित रूप से हो रहा है या नहीं । देश भर में स्वच्छ एवं विकासशील वातावरण के लिए आवश्यक है कि सभी भर्तियाँ गुणवत्ता के आधार पर हों तथा उनमें भाई-तीजावाद आदि का कोई स्थान न हो । शिक्षा पद्‌धति में भी मूलभूत परिवर्तन की आवश्यकता है । हमारी शिक्षा का आधार व्यवसायिक एवं प्रयोगात्मक होना चाहिए जिससे युवा वर्ग को शिक्षा का संपूर्ण लाभ मिल सके ।
देश का युवा वर्ग स्वयं में एक अपूर्व शक्ति है । वह स्वयं एकजुट होकर अपनी समस्याओं का निदान कर सकता है यदि उसे राष्ट्र की ओर से थोडा-सा प्रोत्साहन एवं सहयोग प्राप्त हो जाए । युवाओं की नेतृत्व शक्ति कई बार सिद्‌ध की जा चुकी है । स्व. श्री राजीव गाँधी अपनी युवावस्था में ही भारत के प्रधानमंत्री बने थे । इन्होंने देश की युवा शक्ति को एकत्रित एवं विकसित करने में अग्रणी भूमिका निभाई थी ।आज बहुत से युवा ऐसे है जिन्होने विपरीत परिस्थितियों में भी, डॉ. इंजीनियर, नेता, किसान हर क्षेत्र में अपनी विसात बनाई है और युवाओं के लिए मिसाल पैदा की हैं।

हौसले भी किसी हकीम से कम नहीं होते 
हर तकलिफ में ताकत की दवा देते हैं
होंसला रख कर हर कदम रखिये दोस्त 
होंसले भी सपनों को सच करने की हवा देते हैं

राजेश सारस्वत 
ठियोग, शिमला

कपड़े - सचिन ठाकुर

वट्स एप्प पर मैने शिक्षक नामक ग्रुप बनाया है ।इस ग्रुप में मेरे बेहतरीन प्राइमरी से लेकर विश्वविद्यालय के शिक्षक और जानकार प्रिंट ,वेब और टी वी पत्रकार मित्र शामिल हैं ।ग्रुप में आम तौर पर किसी न किसी ज्वलन्त विषय को लेकर सटीक विश्लेषण ,उम्दा बहस और कभी कभार भयंकर युद्ध जैसे हालात उतपन्न हो जाते हैं।
आज किसी शिक्षक मित्र ने शिक्षा विभाग द्वारा जारी शिक्षकों को साधारण कपड़ो में स्कूल आने की सलाह वाला पत्र इस ग्रुप में पोस्ट करा।मजेदार बात ये थी की जब मैंने इस पत्र को पढा उसी समय मैं अमेजॉन किंडल पर चम्पारण सत्याग्रह को पढ़ रहा था ।
चम्पारण सत्याग्रह निसन्देह मोहन दास कर्म चंद गांधी को राष्ट्र पिता महात्मा गांधी में परिवर्तित करने वाला पहला कदम था ।इस आंदोलन की खास बात बापू के कपड़े थे।इससे पहले वो अंग्रेजी पेंट और कमीज पहनते थे।इसी आंदोलन में उन्होंने अंग्रेजी कपड़े छोड़े और धोती ,कुर्ता और सर पर गमछा धारण कर गांव गांव जा जनता को जगाना शुरू करा।साधारण जन समूह में गांधी की छवि घर कर गई।अंग्रेजी सरकार की नीवं में दरार उतपन्न हुई।उनकी समस्या बमुश्किल 45 किलो,ठिगने और पतले शरीर वाले गांधी नहीं बल्कि उनकी महामानव बनने वाली छवि बन गई।मशहूर अखबार " पायनियर " के साथ मिल कर अंग्रेजी हुकूमत ने गांधी की छवि को बिगाड़ने का काम शुरू किया।हर दिन पायोनियर अखबार गांधी के विरुद्ध कोई न कोई लेख लिखता और हर लेख में गांधी के कपड़ो को निशाना बनाया जाता।बहुत वक्त तक गांधी ने इन लेखों पर चुप्पी साधे रखी परन्तु पानी सिर से ऊपर बह जाने के बाद गांधी ने पायोनियर अखबार को अपनी वेशभुसा के बारे में एक पत्र लिखा ।उसके आखिरी वाक्य ये थे "...... कपड़े आपकी सहूलियत के अनुसार होने चाहिए।धोती कुर्ता मुझे बेहद सहूलियत और आराम देते हैं, गमछा इसलिए सिर पर धारण करता हूँ क्योंकि ये भीषण गर्मी से बचाता है।कपड़ों को किसी धर्म ,सम्प्रदाय ,जाती या पूर्वी अथवा पश्चिमी सभ्यता में बांधना सबसे बड़ी मूर्खता होगी...... "
ये पत्र जब पायोनियर अखबार के मालिक और प्रधान संपादक के पास पहुंचा तो वो खुद गांधी से मिलने आये।उनसे माफी मांगी और ये पूरा पत्र अगले दिन के अखबार में माफी सहित छापा।
मुझे बिल्कुल नहीं पता कि मेरे विभाग के अधिकारियों का साधारण कपड़ो से अभिप्राय क्या है।कपड़ों का शिक्षा की गुणवत्ता से क्या लेना देना है, ये भी मुझे नहीं पता।अगर ये पत्र महिला अध्यापको के लिए है तो फिर पत्र जारी करने वाले अधिकारियों को तुरंत प्रभाव से अपना पद तय्याग देना चाहिए क्योंकि सामन्त वादी सोच के लोगों के लिए शिक्षण व्यवस्था में कोई जगह है ही नहीं।इस पत्र का क्या संदेश है ,इसके लिए तुरन्त एक वर्कशॉप विभाग को आयोजित करनी चाहिए जिसमें शिक्षक, न्याय विद ,फैशन डिज़ाइनर ,जनता के चुने हुए प्रतिनिधि और सबसे जरूरी " स्वतन्त्र और गणतांत्रिक देश " की असली परिभाषा समझने वाले बुद्धिमान व्यक्ति भी बुलाये जाने चाहिए।
याद रखिये " गन्दगी कपड़ो में नहीं होती , देखने वाले कि नजरों में होती है .... "
मैं फिर बापू के ऐतिहासिक पत्र की पंक्ति दोहरा दूं.... " कपड़े आपकी सहूलियत के अनुसार होने चाहिएं....... "
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता भौतिक शास्त्र,
राजकीय आदर्श विद्यालय सरकाघाट
ज़िला मंडी हिमाचल 

एक जैसा परिधान यानि ड्रेस कोड -- सचिन ठाकुर

कई लोग अपने कपड़ों से पहचाने जाते हैं। जैसे पुलिस, वर्दी में होते हैं तो आम जनता इनके पास संरक्षण, शिकायत या मदद के लिए जा सकती है। (मिलगी कितनी भले ही ये सोचनीय है) वर्दी पर अपराधी हमला नही कर सकते। सेना, इनके लिए वर्दी सुरक्षा व सुविधा है। दमकल कर्मी अग्नि व ऊष्मा से बचाव के लिए उपयोगी कपड़े पहनते हैं। पोस्टमैन अपने कपड़ों से पहचाना जाता है। 
     इस तरह के पेशों में संगठन , अनुशासन और एकरूपता की कदाचित जरूरत है। इन कामों के प्रकृति में स्वयतत्ता के लिए जगह ही नही है। 
        स्कूल जैसी किसी चीज का ताल्लुक बच्चों और शिक्षकों से होता है। यहाँ बात दर्शन, स्वतंत्र चिंतन, स्वायत्तता औऱ सृजनात्मकता की होती है। शिक्षक बच्चों के मस्तिष्कों को एक जैसे सांचे में ढालने के लिए नहीं बल्कि इन साँचों को तोड़ने के लिए होते हैं। शिक्षक स्वयं उन साँचों में नहीं आ सकते। यहां जरूरत स्वतंत्र चिंतन की होती है । अब एक से कपड़े पहनने से ये कैसे प्रभावित हो जाएगी? सवाल स्वाभाविक और जायज है। हिंदी और फीजिक्स का टीचर एक से रंग और बनावट के कपड़े पहने तो उनके शिक्षण में क्या अंतर आ जायेगा? तो भाई जब कपड़ों से कोई अंतर नही आता तो काहे ड्रेस पहनाने पर तुले हो? विविध रूप, रंग, बनावट, पहनावे को विद्यालय ही नही पचा सकेंगे तो समाज कैसे स्वीकार करेगा? सारे शिक्षक सिकन्दर के एक जैसे सिपाहियों की फौज है क्या, दाएँ मुड़ेगा दायें मुड़ कहा , मुड़ गए, बैठ जा, उठ जा, ..... सा विद्या या विमुक्तये।  विद्या जकड़ती नहीं जकड़ने तोड़ती है। उसे इस लायक बनाना और बनाये रखना सरकार का काम है। शिक्षा में बदलाव के लिए कुछ भी नया करते जाना सुधार नहीं होता। बदहाल शिक्षा के लिए कुछ करते हुए दिखना  एक ढोंग है। स्कूलों को भवन, पुस्तकालय, पुस्तकें, लैब, लैब उपकरण और शिक्षक चाहिए ड्रेस नहीं। रविन्द्र नाथ ठाकुर ने एक स्कूल की नौकरी इसलिए स्वीकार नही की कि वहाँ ड्रेस पहननी थी। आजाद खयालातों के दम घोटू माहौल में स्कूल नहीं चलते। 
        ड्रेस समर्थक ये भी तर्क लाते हैं कि बच्चों के लिये क्यों ड्रेस तय करते हो? सवाल ये है कि किस शिक्षाविद ने कहा कि बच्चों की ड्रेस तय करो। दुनियां के तमाम सफल स्कूलों में से किसमें ड्रेस थी? तोतोचान के टोमोये में तो बाकायदा कहा जाता था कि बच्चों को नए कपड़े पहनाकर मत भेजिए ताकि वे कपड़ों की चिंता किये बिना आजादी से अपने काम कर सकें। भारत के तमाम शिक्षाविदों ने अपने सफल स्कूल बिना ड्रेस के चलाये हैं। यही स्कूलों की स्वायत्तता है। बोलने, पहनने, खाने, सोचने पर पहरे लगाने वाले कौन हो सकते हैं, सोचनीय है। 
      बच्चों की ड्रेस के पक्ष में एक और तर्क जीभ की नोक पर विराजमान रहता है। अमीर और गरीब एक जैसे कपड़े पहन के आएगे तो गरीब कुंठित नही होगा। अब्बल तो इन दोनों वर्गो के स्कूल एक हैं ही नहीं। हैं भी तो अमीरी गरीबी को जबरन एक जैसे कपड़े पहना कर ढकने के बजाय इस असमानता को मिटाने की जरूरत है। यह भी एक तर्क है कि एक जैसे पहनावे से भेदभाव नहीं होगा। इसके लिए जाति और धर्म के कठोर विभाजन को खत्म करना होगा। सांस्कृतिक पहचान की इस विविधता को स्वीकारना ओर सम्मान करना स्कूलों में सिखाना होगा।
          खैर, बात शिक्षकों को एक जैसे खोल में डालने की हो रही है। माध्यमिक शिक्षा आयोग की एक टिप्पणी है- 'कोई भी समाज अपने शिक्षकों से बेहतर नही हो सकता।' शिक्षक एक प्रबुद्घ वर्ग होता है उसे जितना दयनीय बनाओगे समाज उतना ही अवनति की ओर जाएगा। स्वायत्तता दो, सम्मान दो, सुविधा दो, जिम्मेदारी दो। एक देश, एक संस्क्रति, एक धर्म , एक भाषा, एक टेक्स के आगे सबको एक जैसी शिक्षा और स्वास्थ्य भी तो बोलो।
         पहनना, खाना, सोचना, बोलना , आदमी की निजता है। आदम समाज की बोल व सोच पर काम करने वालों को भी जकड़ना किन इरादों की अभिव्यक्ति है , इसे   समझना होगा।
       शिक्षक संगठनों ने विरोध को कुछ मांगों की शर्त के साथ जोड़कर एक किस्म से ड्रेस को कुबूल कर लिया है। शिक्षक दिवस तक सरकार एकाध मांगे मान ले तो शिक्षक स्वायत्तता घेंघे के सींग की तरह ड्रेस के खोल में छुप जाएगी। ड्रेस के पक्षधर इससे पहले कुछ सवालों के जवाब जरूर ढूंढें, दुनियां में कहाँ-कहाँ शिक्षक ड्रेस पहनते हैं? किन शिक्षाविदों ने इसकी सिफारिश की है? इससे क्या लाभ हुए हैं? हिमाचल के शिक्षक ड्रेस पहनेंगे तो इससे शिक्षा में किस प्रकार सुधार होंगे? 
      कसम वर्दी की सवाल ही समाज को आगे ले जाते हैं। शिक्षक पूछेंगे तो बच्चे भी पूछना सीखेंगे।
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता भौतिक शास्त्र ,
राजकीय आदर्श विद्यालय सरकाघाट 
ज़िला मंडी हिमाचल प्रदेश 

अध्यापक के परम कर्तव्य

एक अध्यापक का परम कर्तव्य है कि वह सबसे पहले एक अच्छा ज्ञानवान गुरु बने और अपने विद्यार्थियों में ज्ञान ऊर्जा को विकसित करें क्योंकि जब तक अध्यापक में ही ज्ञान ऊर्जा नहीं होगी वह अपने छात्रों में ज्ञान को कभी भी विकसित नहीं कर सकता और दूसरा महत्वपूर्ण उसका कर्म है कि वह अपने विद्यार्थियों का एक अच्छा मित्र बने तो जो विद्यार्थी अपने हर कर्म को सांझा करे और अपनी कमियों और गुणों को बहुत आसानी से अपने अध्यापकों को बता सकें। क्योंकि जब तक हम यह नहीं जानेंगे कि हमारे विद्यार्थियों के अंदर क्या गुण है और क्या कमियां है तब तक हम अपने विद्यार्थियों को समझ ही नहीं सकते जब हम किसी भी इंसान को या किसी भी बच्चे को समझ नहीं पाते तब हम उस पर अपना दायित्व नहीं सौंप सकते। तीसरा अध्यापक का परम कर्तव्य है कि वह अपने गुणों को अपने छात्रों में भी विकसित करें अगर उसके पास कुछ अच्छे गुण है या अच्छी आदतें हैं तो उन आदतों को अपने छात्रों में डालने की कोशिश करें क्योंकि तभी हम नव भारत का निर्माण कर सकेंगे। अध्यापक का चौथा महत्वपूर्ण कर्म है कि बच्चों में रचनात्मकता का उदय करें बच्चों को कुछ नया करने के लिए उत्साहित क्योंकि बाल उम्र ऐसी आयु है जिसमें बच्चे नई चीजें करने में सक्षम होते हैं और उन्हें करने के लिए उत्साहित भी होते हैं। अध्यापक का पांचवा महत्वपूर्ण कर्तव्य है कि वह बच्चों में सकारात्मकता का उदय करें वह क्योंकि जब बच्चे  सकारात्मकता सोचते हैं तो वह कभी भी जीवन में निराश नहीं होते और कभी भी वह गलत कदम नहीं उठाते हैं और न ही जीवन के गलत पथ पर जाते हैं। अध्यापक का छठा कर्तव्य है कि वह बच्चों में एकात्मकता उजागर करें उन्हें मिल जुल कर रहना सिखाएं,मिलजुल कर पढ़ने लिखने के लिए उत्साहित करें क्योंकि जब वह मिलजुलकर हर कार्य करेंगे तो उन में जाति पाति का भेदभाव कभी भी नहीं पनप नहीं सकेगा। अंत में मैं बस यही कहना चाहूंगा कि अगर अध्यापक अपने कर्तव्य का पूर्ण तौर पर निर्वाह करें तो वह बच्चों में नई उर्जा में रचनात्मकता  कलात्मकताओं का विकास कर सकते हैं


राजीव डोगरा
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश
(भाषा अध्यापक)
गवर्नमेंट हाई स्कूल,ठाकुरद्वारा।
पिन कोड 176029
9876777233

तो बन्द करो ना परीक्षा का बेहूदा ड्रामा ... सचिन ठाकुर

ना,ना,ना प्रचंड गरमी और लू मेरे सर पर नहीं चडी है।ना मैंने पी है,,इस जन्म में तो चखी भी नहीं।
बस ऐसे ही ,दो महीने के भीतर बदलते समीकरणों को निहार रहा हूं।
मार्च में परीक्षाएं थी।क्या सख्ती,क्या कैमरे की तिरछी नजर,क्या धांसू सुप्रीटेंडेंट ,क्या खूंखार उड़नदस्तों का अमला।
अखबारों की करतनो में नकलचियों को पकड़ने का शोर, मामूली गलती होने पर भी प्रधानाचार्य समेत बाकी शिक्षकों के सस्पेंड होने का गला फाड़ भोंपू।हर पेपर की वीडियो रिकार्डिंग ना होने पर पूरे सेंटर को तम्बू समेत उखाड़ फेंकने की शिक्षा बोर्ड के अधिकारियों की हुंकार।
भई वाह!! मजा आ गया।
रिज़ल्ट भी आ लिया।कैमरे लगे थे ।जिनमें पहली बार लगे थे वो उनसे पार पाने के नुस्खे सीखने में लगे थे ,जिनमें पहले के लगे हुए थे ,वो पिछले साल सीखे नुस्खों को आजमा गए।किसी स्कूल में कम रिज़ल्ट का हाहाकार तो किसी स्कूल में कैमरे लगने के बावजूद शत प्रतिशत रिज़ल्ट देने के नगाड़े।किसी अध्यापक पर कम रिज़ल्ट के इंक्रीमेंट बन्द करने का सरकारी चाबुक तो किसी को स्थानांतरण का काला पानी।
अब दो महीने बाद फिर से परीक्षाएं चल रही। एस ओ एस के नाम से।भाई वाह।जो अमला मार्च में मुट्ठियां भींचे ,भृकुटियां ताने युद्धभूमि का योद्धा दिखता था ,वही आजकल ग्राम सेवक के अवतार में है।नकल दबा के हो रही।सुप्रीटेंडेंट जो मार्च में महर्षि दुर्वासा समान थे दो महीने बाद धृतराष्ट्र में परिवर्तित हो लिए हैं।कई गांधारी के चरित्र में डुबकी लगा लिए हैं।
देखना ,दो महीने पहले जो एक दो अंक लिए फेल हुए थे ,दो महीने बाद 90-95 अंक ले के अध्यापकों को गाली देते हुए अपने असाधारण होने का लोहा पीटते नजर आएंगे।
जो बेचारे यहां भी कुछ नहीं कर पाए वो निराश ना हों।अभी शिक्षा का असल जनांजा निकालने वाली एन आई ओ एस की महा भ्रष्ट परीक्षाएं है ना।
बस परीक्षा केंद्र के लिए चड़ती तैयार रखिए।हर पेपर का दाम है।चुका दिया तो फिर पेपर किसी और से ही दिला लीजिए।पेपर आपके होटल के कमरे में ही आ जाएगा।
कुछ भी चड़ति चडा डालिए।मुद्रा,सोम रस,कोई मंहगा उपहार  या फिर गरीब लाचार महिला हो तोआपका शरीर भी चलेगा।
बस उफ्फ मत कीजियेगा।शरीर,चेतना,चरित्र और आत्मा , सब पर कागज का एक टुकड़ा ,जिसपे आपके हासिल किए अंक लिखे हैं,भारी है।
साहब,
बन्द करिए ना ये परीक्षाओं का ड्रामा।जब 11 महीने मुज्जरा  हो रहा तो नजराना मार्च  महीने का ही क्यूं ?
बेडा तो गरक पहले ही हो लिया है आपकी आठवीं तक फेल ना करने की अनोखी जिद से। नविं में मुख्याध्यापक फेल नहीं करने देते।तो दसवीं में अध्यापक का ,छात्र का, माता पिता का ,यहां तक कि सारे समाज का भोंपू काहे ब्जवा रहे।
वैसे भी सरकारी स्कूल के सुदामायों और निजी स्कूल के अंबनियों को काहे एक ही रेस में उतारते हो।जिनके परिवेश में ही सात समन्दर गहरा भेद है उनको एक ही आरम्भिक बिंदु पर पटकने में किसका भला है।
ओ साहब,
मेरी बात सुन लो ना।बन्द करो ना ये ड्रामा।कुछ और करते हैं। बच्चों को कुछ और सिखाते हैं।ऐसा कुछ जो उनको पैरो पर खड़ा होने की वज़ह और जरूरत दोनों समझाए।अग्नि परीक्षा रावन की लंका में रही  सीता ही क्यूं दे।राजा राम भी तो जंगल में अकेले भटके थे।
वो बात है ना साहब ,के व्यवस्था बुरी है अगर ये मन को कचोटती है।व्यवस्था अपराधी है अगर वो बुद्धि पर डाका डालती है और व्यवस्था घृणित है अगर ये चरित्र पर चोट करती है।
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता भौतिक विज्ञान,
राजकीय आदर्श वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला ,सरकाघाट ,मंडी
हिमाचल प्रदेश की फेसबुक वाल से साभार।