विश्व शिक्षक दिवस

पुरे विश्वभर में 05 अक्टूबर को विश्व शिक्षक दिवस (World Teachers Day) मनाया जाता है. इसे अंतरराष्ट्रीय शिक्षक दिवस (International Teachers Day) के रूप में भी जाना जाता है. यह दिवस दुनिया में शिक्षकों की स्थिति में सुधार लाने के उद्देश्य से मनाया जाता है. यूनेस्को और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के बीच वर्ष 1966 में हुई बैठक में इसका निर्णय लिया गया था.


विश्व शिक्षक दिवस न केवल शिक्षकों के लिए बल्कि छात्रों के लिए भी एक विशेष दिन है. इस दिन, शिक्षकों और सेवानिवृत्त शिक्षकों को उनके विशेष योगदान के लिए सम्मानित किया जाता है. हरेक साल यूनिसेफ, यूएनडीपी, अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन और शिक्षा अंतरराष्ट्रीय द्वारा एक साथ मिलकर विश्व शिक्षक दिवस के कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है.

यूनेस्को और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन द्वारा साल 1966 में शिक्षकों के अधिकारों, जिम्मेदारियों, रोजगार और आगे की शिक्षा के साथ सभी गाइडलाइन बनाने की बात कही गई थी. बता दें कि संयुक्त राष्ट्र (UN) ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा के क्षेत्र में उपलब्धियों को जानने तथा उससे जुड़ी समस्याओं को पहचानने हेतु साल 2030 का लक्ष्य रखा है.

विश्व शिक्षक दिवस 2019 का थीम

विश्व शिक्षक दिवस 2019 की थीम 'Young Teachers: The future of the Profession' है. इस अवसर पर, यूनेस्को ने अपने ज्ञान को साझा करने हेतु स्कूल प्रिंसीपल, शिक्षक यूनियन, अभिभावक-शिक्षक संघ, शिक्षा अधिकारी, स्कूल प्रबंधन और प्रशिक्षकों को आमंत्रित किया है.

विश्व शिक्षक दिवस का इतिहास

विश्व शिक्षक दिवस 05 अक्टूबर को प्रत्येक साल पूरी दुनिया में मनाये जाने लगा है. विश्व शिक्षक दिवस की शुरुआत साल 1994 में हुई थी. संयुक्त राष्ट्र ने विश्व शिक्षक दिवस को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनाने हेतु साल 1994 में यूनेस्को की सिफारिश पर लगभग 100 देशों के समर्थन देने के बाद इस बिल को पारित किया था. विश्व शिक्षक दिवस इसके बाद 05 अक्टूबर को मनाये जाने की शुरुआत हो गई.

विश्व शिक्षक दिवस का महत्व

यूनेस्को और अंतरराष्ट्रीय शिक्षा (ईआई) विश्व शिक्षक दिवस मनाने हेतु प्रत्येक साल एक अभियान चलाता है जिससे की लोगों को शिक्षकों की बेहतर समझ तथा छात्रों और समाज के विकास में उनकी भूमिका निभाने में सहायता मिल सके.

कहीं हम शास्त्रीजी को भूल न जाएं--- जगदीश बाली

हर वर्ष 2 अक्तूबर आता है और गांधी जयंति को मनाने के लिए विभिन्न विभागों को सरकारी आदेश आते हैं कि इस दिन को कैसे मनाया जाना है। इस गहमा गहमी के बीच अपने ही देश के एक और महान आदमी को हम या तो भूल जाते हैं या वे हाशिए पर चले जाते हैं। जब से मैं कुछ जानने वाला हुआ तब से कोई ऐसी सरकारी चिट्ठी मेरी नज़रों से नहीं गुज़री जिसमें हमारे पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी के जन्मदिन को मनाने का कोई जिक्र हुआ हो, आदेश तो दूर की बात है। क्या हम देश के इस महान आदर्श को भूल तो नहीं रहे हैं? ठीक वैसे ही जैसे तेंदूलकर या सहवाग के शतकों के सामने राहुल द्रविड़ का शतक कहीं नजर अंदाज हो जाता था। परन्तु इसके मायने ये नहीं कि द्रविड़ का शतक कम महत्व रखता था। खैर वो क्रिकेट है , एक खेल है जिसमें ऐसा होना कोई बड़ी बात नहीं। परन्तु 2 अक्तूबर को लाल बहादुर शास्त्री को भूल जाना या भूलते भूलते याद करना या औपचारिक बोझ समझ कर श्रद्धांजलि मात्र देना उनके प्रति हमारी उदासीनता का बड़ा उदाहरण है। इस बात में संदेह नहीं कि गांधीजी विश्व इतिहास के पटल पर बड़ा नाम व स्थान रखते हैं, परंतु हम भारतीयों के लिए तो शास्त्री जी किसी बड़े या महान पुरुष से कम नहीं है। बेशक गांधी जी का दायरा बड़ा हो सकता है, परन्तु अपने भारतीय दायरे में शास्त्री जी का योगदान भी कम महत्वपूर्ण नहीं। यहां बात तुलना की नहीं बल्कि अपने आदर्श पुरुषों को सम्मान देने की है। दोनों महान पुरुषों ने अपने देश को बनाने में योगदान दिया है। शास्त्री जी भी देश के प्रधानमंत्री थे और ऐसे प्रधानमंत्री थे जिन्होंने अपनी सादगी, उच्चचरित्र व स्वार्थहीनता की अनोखी मिसाल पेश की। जहां महात्मा गांधी ने 'करो या मरो' का नारा दिया, वहीं भारत-पाक युद्ध के विषम समय में समय शास्त्री जी ने  'जय जवान व जय किसान का नारा' दे कर देश के जवानों का हौसला बढ़ाया व किसानों को प्रेरित किया। जहां गांधी जी के संघर्ष से हम वाकिफ हैं, वहीं शास्त्री जी के सुकर्मो की गूंज भी कम नहीं। पैदल लंबा सफर चलने के बाद नदी को तैर कर पार करके जिस विद्यार्थि ने शिक्षा ग्रहण की हो और आगे चल कर देश का प्रधानमंत्री बना हो, उस महान पुरुष के आदर्श व्यक्तित्व के बारे में अंदाज़ा लगाया जा सकता है। 
विभिन्न मंत्री पदों पर रहते हुए भी उनमें मंत्रीपद की कोई ठसक नहीं थी, कोई अहंकार नहीं था। बनारस में इंटर कॉलेज में हाईस्कूल की पढ़ाई के दौरान जिस चपरासी ने उन्हें बीकर तोड़ने पर  जोरदार थप्पड़ जड़ दिया, उसी चपड़ासी को रेल मंत्री बनने के बाद एक कार्यक्रम में शास्त्री जी ने पहचान लिया, उसे मंच पर बुलाया और गले लगा लिया। ये इस बात की बानगी है कि शास्त्री जी मानवीय गुणों से कितने सम्पन्न थे। जब वे रेलवे मंत्री थे तो मा कहीं किसी की सिफारिश करने न आ जाए इसलिए उन्होंने उन्हें बताया था कि वे रेलवे में काम करते हैं। नैतिक रूप से वे इतने सबल थे कि 1956 में महबूबनगर रेल हादसे में 112 लोगों की मौत होने पर उन्होंने इस्तीफा दे दिया था।
प्रधानमंत्री के पद पर होने के बावजूद इस पद का दुरुपयोग अपने और अपने परिवार के लिए कभी नहीं किया। जब आवश्यक हो गया, तो उन्होंने निजी तौर पर 5000 का लोन ले कर कार खरीदी। शास्त्रीजी की अकस्मात मृत्यु के बाद उनकी पत्नी ने इस लोन पेंशन से चुकता किया। मृत्यु के समय शास्त्री जी के पास कुछ एक धोती कुर्ते और कुछ किताबें थी। इसमें शास्त्री जी का क्या कसूर की वे उसी दिन पैदा हुए जिस दिन गांधी जी। सादगी, देशभक्ति और ईमानदारी की मूर्त आदर्श पुरुष व भारत रत्न लाल बहादुर शास्त्री को नमन। क्यों न उनके जन्मदिन को भी तवज्जो दी जाए व गांधी जयंति की तरह जोश से मनाया जाए।

मलखान सिंह का दलित साहित्य --- डॉ राज कुमारी

मलखान सिंह दलित साहित्य ही नहीं सामाजिक परिवर्तन , अस्मिताओं के विमर्श का एक जाना माना नाम हैं ।जनवादी चेतना के वैचारिक कवि रहे हैं । अपने पहले काव्य संग्रह "सुनो ब्रह्मण "से चर्चित हुए इस कवि मल खान सिंह का जन्म 30सितम्बर 1948में उत्तर प्रदेश के हाथरस में हुआ उनका  देहत्याग अभी हाल ही में 9अगस्त 2019 में हुआ हैं । उनके द्वारा रचित दो ही काव्य संकलन उनको प्रतिष्ठित कवियों की श्रेणी में ले आते हैं । पौराणिक घिसी पिटी सभ्यता को धकेल नयी साहित्यिक परम्परा जो यथार्थवाद की समर्थक हैं , बहुजन समाज को चेताने का कार्य करती हैं ।सन 2012के हिन्दी साहित्य  सर्वेक्षणात्मक दलित  साहित्यकारों में अग्रणी माने जाते हैं । अपने काव्य संग्रह "सुनो ब्रह्मण "1996 में प्रकाशित होने के पश्चात ये चर्चित कवियों में आये और अपनी पृथक पहचान बना सके । उनका दूसरा बहुचर्चित काव्य संग्रह "ज्वालामुखी के मुहाने "2016में प्रकाशित हुआ । जिसमें मलखान सिंह जी के क्रांतिकारी , विद्रोही स्वर मुखरित होते हैं । इसी काव्य संग्रह की दो कविताओं की समीक्षा का प्रयास करने का प्रयास किया जा रहा हैं । पहली कविता "ज्वालामुखी के मुहाने " आतिशूद्रों के सामाजिक सीधेपन और ईश्वर के नाम पर बहकावे की पुष्टि करती हैं उसके पीछे शूद्रों एवं तमाम जातियों के लिए गढ़ दिये गये प्रपंचों को व्याख्यित करती हैं साथ ही एक जाति विशेष के एकाधिकारी होने का प्रमाण देती हैं । दलित वर्ग माने सभी वो लोग जो इस वर्णव्यवस्था के शिकार रहे बहुजन लोग जिनके माथे पर स्वर्ण जैसा टेग नहीं चिपका था । या ये कहूँ सभी बाहुबली भी इसी में आते हैं तो गलत ना होगा क्योँ कि ये रहस्यमयी चीज़े उनके लिए भी बंद किवडो के पीछे थी । खनखनाते अस्त्र -शस्त्र के दंभ ने कभी ईश्वरीय खोज या संवादो की विशेष शक्ति तक जाने नहीं दिया । जो भी परमात्मा ने फूंका एक ही जाति के कान में फूंका । भविष्यवाणी भी वहीं सुन पाये हालांकि कान सभी के थे। कितने भय मन की परतों में समाए थे कि कभी प्रश्न करने की जिज्ञासा हुई ही नहीं - 
   तुमने कहा -
मैं ईश्वर हूँ , 
हमारे सिर झुका दिये गये । अपनी सर्वोच्च होने के लिए कितने दुखों को उगा दिया तुमने । तुम्हारे कथन के अनुसार ब्रह्म सत्य , जगत मिथ्या सहज मान लिया हमने । बुत पूजाविधान की रूढ़ियों को ठोस रूप दे दिया हमने एवज़ में क्या दिया । जिसे पूजवाया उसके लिए भी शूद्र हो गये । उससे दूरी के फ़रमान हीन भावनाओं से ग्रस्त करने को देवालय से दूरी की हिदायतें जब कि पत्थर ही हैं इससे ज्यादा कुछ नहीं । तुम्हारा सच ही सच हैं क्योँ कि तस्वीर में तुम्हीं मुख से जन्मे हो ना । जबकि झूठ ही उगला तुमने , मूर्त पूजा , हमारे दास होने की कथाएँ । हमारी छाया से अशुद्ध होना , हमारी पैरों से पैदाइश सब फ़रेब लपेटे तुमने इस ब्रह्म की आड़ में और बना दिया समाज का गलित अंग । किस्सा ये भी कम नहीं कि गूंगा , बहरा , अंधा बना आधुनिकता में गटर में उतार दिया गया । हमारे हर कार्य का निर्धारण ऐसा किया कि हम सिर ऊँचा कर जी ना सके । अपवित्र कह कर रेखाएँ खींच दी गयी । ये जीतने भी षड़यंत्र रचे गये उनके पीछे एक ही मंशा का कर रही थी तुम्हारी पाखंडवाद की बेबुनियादी सत्ता के खुलासे ना हो जाये । इस कविता की अंतिम पंक्तियाँ -मदान्ध ब  र  ह म न 
            धरती को नरक बनाने से पहले 
            यह तो सोच ही लिया हॊता 
          कि ज्वालामुखी के मुहाने 
          कोई पाट सका हैं 
           जो तुम पाट पाते ! 
प्रस्तुत पंक्तियाँ साररूप में कह रही हैं कि ईश्वरीय रूप को आधार बना जो विद्रूपताये , असमानताएँ , व्यवस्था के नाम पर दुत्कार इन सभी का अंत कभी तो होगा । जिस प्रकार भू गर्भ में अत्याधिक गर्मी बढ़ जाने पर ज्वालामुखी फटते हैं ठीक उसी प्रकार इन यातनाओं की अति कभी तो विद्रोही स्वर के ज्वालामुखी रूप को प्राप्त होगी। उसे रोकना असम्भव हैं । अपनी आज़ादी वे हासिल करेंगे ही । तुम्हारे द्वारा संचालित दोगली सत्ता उन्हें अब स्वीकार नहीं हैं । ना ही अब उन्हें किसी ईश्वरीय शक्ति का झांसा दे वरगला सकते हो । ईश्वर के मर जाने की घोषणा करती बेबाकी से लिखी गई कविता "ईश्वर उसी दिन मर गया " इस कविता में दलितों के इतिहास की अनंत पीड़ाओं को उकेरा गया हैं उकेरा क्या जिया गया हैं । लेखक का स्वानुभूति पक्ष खूब मुखरित हो उठा हैं अपना आधिपत्य जमा लेने वाली जातियों के दंभ एवं सदियो से शोषित समाज के उत्पीड़न की दासता को मर्मज्ञता से स्वर दिया गया हैं । मनुष्य जो माँ के गर्भ से सहज जन्म लेते रहे हैं उसकी ब्रह्म के अंगो से अकल्पनीय उतपत्ति का धोखा अब समाप्त हो चुका हैं कविवर कहते हैं दोनों का जन्म समान रूप से हुआ एक ही मार्ग माँ की कोख किंतु देखिये तो सहोदर होते हुए भी एक साथ बचपन बीतने पर भी ज़मीन आसमान के अंतर पाट दिये गये हैं ईश्वर जो अदृश्य हैं , आसमानी , अप्रत्यक्षित हैं , चमत्कारी हैं , हिंसको को वशीकरण करता हैं जो एकदम में समुन्द्र नाप लेता , तमाम कलाबाजियों से परिपूर्ण ईश्वर हैं उसी विशेष की पीठ ठोंकता शाबाशी देते हुए हर गलत कार्य करने पर , आदम की ही पीठ सहलाता हैं अपने वजूद का एहसास कराता हैं । स्वप्न में भी उसी के आता , आशीर्वाद , दिलासा , दर्शन भी उसी विशेष को देता । आदि मानव खोजी प्रवृति लिए पत्थर के पेट से आग निकालता हैं गोलाई से पहिया बनाता हैं , धरती सीने से अन्न उगता , और जन्मता समुदायिक , प्रेम सौहार्द पूर्ण जीवन का रूप । डर जो रक्षा हेतु खोज लाया लकड़ी पत्थर के नुकीले घाव देने वाले हथियार भयभीत होने लगे सहज विचरते हिंसक जानवर खौफनाक महौल बनाया मानव ने अपने इर्द -गिर्द । मनुष्य की प्रत्येक खोज आदिकाल से अपनी ही रही ।प्राकृतिक आपदाओं का नियन्त्रण भी उसने खुद ही सीखा । ऐसे में जो चीज़ शूल बनी जिसका अफ़सोस कवि ने जताया कि आज भी खुद को उनका वंशज बताने वाले ईश्वर सत्ता को पुकार रहे । अस्तित्वहीन सत्ता को आदिमानव की खोजों का श्रेय दे रहे । ईश्वर के मृत होने की घोषणा करते हुए सिद्ध करते हैं कि ईश्वर उसी दिन मर गया था -"जिस दिन कि आदम ने 
                    यह जाना कि 
                सृष्टि का जनक , पालक , संहारक 
              ईश्वर नामधारी कोई 
             स्त्री पुरुष नहीं 
            धरती के गर्भ में छूपा 
      सतत परिवर्तन का नियम हैं 
        जो कार्य कारण की अटूट 
        शृंखला में गुंथी 
      अतुल्य ऊर्जा से संचालित हैं 
       यही सत्य हैं , 
       यही नित्य हैं 
      यही सार्वभौम हैं।  गंभीरतापूर्वक भावों , दर्द की खोह ,  संधर्ष की अनगिनत कथाएँ मिलती हैं ।  यथार्थ अभिव्यक्ति  के  पक्षधरों में अपनी अनूठी पहचान बनाने वाले सच्चे मायनों में साहित्य सेवी थे।  मलखान सिंह जी ने आधुनिक विमर्श के विषयों को जिनमें दलित , बहुजन विमर्श , स्त्री विमर्श ,  को अपनी कविताओं को कथानक बनाया । सहज शब्दयोजना , नये उपमान , पत्थरों के सीने , आग की पोटली , घुप्प अंधरे आदि रूपकों का गठन शिल्प को भिन्न पहचान देता हैं । 
डॉ .राजकुमारी

सचिन ठाकुर

हिमाचल के पर्यावरण को लेकर हिमाचली सियासतदान इतने "चिंतित" हैं कि स्टोन क्रशर के लिए मापदंड तक हमारी न्यायपालिका को तय करने की नौबत आन पड़ी है| जब नीति निर्धारण भी न्यायधीशों की पंचायत को करना पड़े तो हमें सरकार चुनने की क्या जरूरत है और यह स्थिति इसलिए नहीं आई कि अदालत ने जबरन इस पुनीत कार्य को हथियाया हो बल्कि इसलिए हुआ क्योंकि आजकल की सरकारों को इन मूलभूत लेकिन अहम विषयों पर मंथन करने का वक्त ही नहीं है| सरकारें तो बदला, बदली, ठेका, टेंडर, सप्लाई, लीज के खेल में ही इतनी व्यस्त हैं कि नीति निर्धारण उनकी प्राथमिकता ही नहीं है| जिस तेजी और लापरवाही के साथ हमारे हुकुमरान जनहित के मामलों पर कोई तर्कसंगत नीति इजाद करने से बच रहे है उसी अनुपात में कचहरी का हस्ताक्षेप बढ़ना लाजिमी है| नेता लोग लुटेरे गिरोहों का दरबार कायम करके वीच-वचाव वाले सामंती किस्म के निर्णय करने के आदी हो गए है जिसमें फैसला सिर्फ यही होता है कि किसको कितनी रेवड़ी हिस्से में आएगी| जब अपने-अपने हिस्से की बंदर वांट करते-करते भी अराजकता का आलम हो जाता है तो फिर सारी वला हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के सर पर डालकर ये लोग चिल्लाना शुरू कर देते है कि मामला न्यायालय के विचाराधीन है इसलिए पूर्व यथास्थिति कायम रख कर ही लूट-पाट को अंजाम दिया जाए| कार्यपालिका की जनहित के मुद्दों पर इस निर्णयहीनता के लिए हमारा विधि सामाज भी जिम्मेदार है क्योंकि वकील भी अपने रोजगार की गरज से ज्यादातर मामलों को अदालत की ही चौखट पर ले जाने का शातिराना सुझाव देने लग पड़े हैं| अंत में इस शून्य को आखिरकार जज ही भरने को मजबूर हैं जिसके चलते उन पर काम का बोझ इतना है कि सम्पूर्ण निष्पक्षता की उनसे उम्मीद करना भी वेमानी है| हमारी न्यायपालिका जैसी "पतिव्रता" संस्था को भी जब सियासती दोस्त हर दिन हमारे प्राकृतिक संसाधनों की लूट-खसोट का मुजरा दिखाने लग जाएँ तो फिर उसका न्यायिक "कौमार्य" भी कितने दिन तक कायम रहेगा| और सबसे अहम सवाल यह कि जब विजली पानी और सड़क बनाने का फैसला भी हमारी अदालत को ही करना पड़े तो नेताओं को वेतन या पेंशन ही क्यों दी जाए? 
पर्यावरण बचाव सबके लिए आवश्यक है।क्या नेता,क्या जज,क्या वकील और क्या आमजन ।सांस सभी को इसी हवा से लेनी है।
सोचिये जरा!
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता,भौतिक शास्त्र,
राजकीय कन्या वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला पालमपुर 

शिक्षा और शिक्षित--- राजेश सारस्वत

शिक्षा का अभिप्राय महज़ नौकरी पाना अथवा अच्छे अंक प्राप्त करके आसपास और समाचार पत्रों की सुर्खियों में छाए रहना नहीं है। शिक्षा का वास्तविक अर्थ एक बेहतर नागरिक जागरूक नागरिक बनना होता है। आज हम जिधर भी नज़र दौड़ाते हैं हर तरफ़ केवल मात्र अंको को पढ़ाई के लिए मापदंड रखा गया है। घर जाते ही की माता पिता पूछते हैं कि फलां विषय में कितने अंक मिले हैं और कितने पर्सेंट बन रहे हैं। एक अच्छे अंको को प्राप्त करने वाला छात्र अगर एक अच्छा इन्सान न बन सका तो क्या आप उस पढ़ाई को बेहतर तालीम कहेंगे? फेल होने वाला विद्यार्थी अगर समाज में कोई बेहतर काम करता है समाज और परिवार की बेहतरी के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहता है तो क्या वह शिक्षित नहीं है? आज हमने शिक्षा के वास्तविक स्वरूप को पीछे छोड़ दिया है और अंको की मारामारी की इस अंधी दौड़ में कहीँ न कहीँ नैतिकता, इन्सानियत और सामाजिकता को नज़र अंदाज़ किया है, जो भविष्य के लिए अच्छा संदेश नहीं है। आज अगर विद्यालयों में जाकर निरीक्षण किया जाए तो नबे प्रतिशत छात्र आपको ऐसे मिलेंगे जो कि सर्वशिक्षा अभियान के कारण अच्छे अंको को प्राप्त करने में असफल है। सर्वशि‍क्षा अभियान एक ऐसी बीमारी आई जिसके चलते विद्यार्थी बिना कुछ पढ़े ही अग्रिम कक्षा में बैठता गया और नौवीं कक्षा में पहुंच गया।इसके बाद उसको ऐसे ब्रेक लगती गयी जिसका उसको आभास भी न था।भाषायी ज्ञान तथा गणित विषय की मूलभूत जानकारी न होने के कारण बच्चा आगे नहीं बढ़ पाता।एक अध्यापक उस बच्चे के भविष्य की चिंता लिए भरसक प्रयास करता है लेकिन सफल न होने पर उसको एक अच्छा नागरिक बनाने का प्रयास करता है। क्या ऐसे विद्यार्थियों को जो पढ़ाई में  कमजोर है उनको एक बेहतर इंसान बनाकर उनकी जिंदगी को बेहतर बनाकर उसकोशिक्षित कहना गलत है ? जिन अध्यापकों ने उस बच्चे को अच्छी तालीम दी है जो विषय विशेष में तो अच्छे अंक प्राप्त न कर सका लेकिन उसके अंदर जो अन्य गुण थे उनको बाहर निकाल कर उसकी जिंदगी को आसान बनाया, भविष्य को सँवारा उन अध्यापकों की भी पास फेल के आधार पर ही सम्मान और आलोचना सही है।अच्छे अंक प्राप्त करके अभद्रता का व्यवहार करने वाला बेहतर है या फेल और कम अंको वाला एक सुसंस्कारित अच्छा व्यवहार करने वाला छात्र बेहतर है? इस तरह की बहुत सारी बातें ऐसी हैं जिसको हम हमारा परिवेश गलत नज़रिए से देखता है। 

राजेश सारस्वत 
ठियोग, शिमला